केजरीवाल, जयप्रकाश नारायण का लेटेस्ट संस्करण है./डॉ.रंजन ज़ैदी

गर मैं यह कहूँ कि अरविंद केजरीवाल जयप्रकाश नारायण का लेटेस्ट संस्करण है यानि शक्तिशाली
भारत का भावी स्वप्न, जिसे एक बड़ी वैचारिक-राजनीतिक क्रांति की ज़रुरत है, तो गलत नहीं होगा, लेकिन उनमें भी कुछ कमियां हैं. वे ऐसे लोगों से घिरे हैं जो उनके प्रति भी वफादार नहीं हैं. अनुभवहीन, बड़बोले, स्वार्थी और आरएसएस की शाखाओं से निकले अवसरवादी सलाहकारों के मोह में ग्रस्त लोगों से घिरे हैं. उनके पास अच्छे राजनीतिक सलाहकार नहीं हैं। जो हैं, वे दूरी बनाकर नज़र बनाये रखते हैं. 
ऐसे लोगों को केजरीवाल की नीयत पर संदेह नहीं है लेकिन वे उनके कॉकस को खतरनाक मानते हैं. इमर्जेंसी से पहले श्रीमती इंदिरा गांधी इसी तरह के कॉकस का शिकार हो गई थीं. 
यही कॉकस अरविंद केजरीवाल को आने वाले समय में सत्ता से बाहर करने में मददगार साबित होगा।
' आदमी पार्टी' सही गति से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रही थी कि अचानक उसे देखते ही देखते लकवा मार गया. दिल्ली का मुख्य मंत्री अप्रत्याशित ढंग से अपने समर्थकों के साथ अचानक दिल्ली स्थित रेल भवन के सामने धरने पर बैठ गया. इतिहास में यह एक अदूरदर्शी कदम माना जायेगा। इस कदम में इतिहास उन सिपहसालारों की भूमिका की भी अनदेखी नहीं करेगा जिन्होंने अरविन्द केजरीवाल को उक्त राजनीतिक अग्निकुंड में कूदने पर विवश किया या उकसाया, इसमें चाहे प्रशांत भूषण और गोपाल राय हों या प्रोफ़ेसर आनंद कुमार, संजय सिंह हों या योगेन्द्र यादव जैसे अन्य सलाहकार।
कारण यह है कि यह समय धरने-प्रदर्शन का नहीं, काम करने का था. पार्टी, तलवार की धार पर चल रही थी. हवा के राजनीतिक झोंकों ने पहले भी झकझोरा था. पहला सर्द झोंका पार्टी के एक वरिष्ठ सदस्य कानूनविद के माध्यम से कश्मीर की निजी स्वायत्तता के इशू को लेकर आया तो सारा देश बिफर गया. इस पर पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को सफाई देनी पड़ी
समस्या सुलझी भी नहीं थी कि दूसरा सर्द झोंका हिंदी के मंचीय कवि कुमार विश्वास की ओर से आ गया. जिन पर पहले ही घूसखोरी को लेकर स्टिंग किया चुका है. पार्टी ने इसे भी जैसे-तैसे रफा-दफा कर दिया लेकिन कुमार विश्वास ने जनवादी बनने की होड़ में हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियां कर स्वतः ही हवा के झोंके की एक और खिड़की खोल दी.  
इसका नतीजा यह हुआ कि लखनऊ और बरेली में उनके विरुद्ध मुकददमें दायर कर दिए गए. इलज़ाम लगा कि कभी उन्होंने महान पुरुष हज़रत इमाम हुसैन (अलै.) जैसे मुस्लिम धर्म-नायक पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की थीं। फेस बुक पर इसके वीडियो-क्लिप्स भी प्रसारित किये गए. इससे अमेठी में चुनाव-प्रचार के दौरान उनका विरोध पहले से अधिक बढ़ गया. 
नतीजा यह निकला कि इस तरह के नेताओं के कारण धार्मिक, बुद्धिजीवी अल्पसंख्यक समुदाय जिसमें (शिया-सुन्नी मुसलमान शामिल हैं, इलियास आज़मी, शज़िआ इल्मी और इरफानुल्लाह जैसे कोर-कमिटी के सुन्नी मुस्लिम सदस्यों को छोड़कर) पार्टी से छिटकते देखे जाने लगे लेकिन अरविन्द केजरीवाल को कोई अंतर नहीं हुआ, लेकिन अरविन्द केजरीवाल में कोई अंतर नहीं देखा गया.
अगला झोंका मीडिया से निकले पत्रकार आशुतोष सिंह की खिड़की के रास्ते से आया. तमाशा तब बना जब आशुतोष का महिमामंडन हाईकमान के स्तर पर ऐसे हुआ मानो पार्टी को कोई महापुरुष मिल गया हो.  इस महिमामंडन से देश का बौद्धिक-वर्ग और समूचा मीडिया हत्प्रभ रह गया
यही नहीं  सोने में सुहागा तब हुआ जब उन्हें पार्टी नियमावली की उपेक्षा कर तुरंत राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बना दिया गया. इससे देश भर में पार्टी से जुड़े असंख्य प्रबुद्ध सदस्य व कार्यकर्ता खुद को अपमानित महसूस करने लगे. 
हवा के झोंके थे कि  आंधी बनते ही जा रहे थे. इसी बीच नीग्रो-इस्क्वायर (खिड़की) के क्षेत्र की चंद विदेशी नीग्रो महिलाओं का मामला प्रकाश में आ गया. इस बवंडर में कानून मंत्री सोमनाथ भारती तिनके की तरह उड़ते नज़र आये लेकिन इस तिनके को भी केजरीवाल का सहारा मिल गया.

बीजेपी को यहाँ भी तमाम कोशिशों के बावजूद शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा.यदि प्रयास किया जाता तो कानून मंत्री उस समय अपनी योग्यता और अनुभव के सहारे मामले से स्वयं निबट सकते थे कि तभी दिल्ली के मुख्य मंत्री ने इसे एजिटेशन का मुद्दा बना दिया जो कूटनीति की ग्रामर से भिन्न थी. यह अकारण हस्तक्षेप राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के चुने हुए महत्वपूर्ण मुख्यमंत्री के पद की गरिमा के अनुकूल नहीं था. यह राजनीतिक अदूरदर्शिता गहरी चोट पहुँचाने जैसी थी जिसने कहीं तक चोट पहुचाई भी. देश तब हतप्रभ रह गया जब लड़ाई मूछ का बाल बनी और दिल्ली का मुख्य-मंत्री साधारण से पुलिस अधिकारियों से अंततः येड़ा बनकर पराजित हो गया.   
दुखद स्थिति तब आई जब भारत के गृह-मंत्री ने  दिल्ली के चुने हुए मुख्य-मंत्री को बीजेपी के सुर में सुर मिलाकर उन्हें येड़ा (पागल) तक कह दिया। वह यह भूल गए कि यह पागल उनसे अधिक पढ़ा-लिखा, बुद्धिजीवी, पूर्व आईआरएस, मैग्सेसे पुरस्कार विजेता, सोशल एक्टिविस्ट और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का चुना हुआ सम्मानित सांविदिक मुख्यमंत्री है
कांग्रेस दिल्ली सहित देश के कई अन्य राज्यों में फ़िलहाल कहीं तक अपना राजनीतिक आधार खो चुकी है लेकिन उसकी भावी अपार संभावनाओं से इंकार नहीं किया जाना चाहिए वह एक राष्ट्रीय और ऐतिहासिक पार्टी है. 'आप' को समर्थन देना उसकी अपनी मजबूरी हो सकती  है क्योंकि दिल्ली की राजनीतिक गतिविधियों में उसका सक्रिय और चर्चित रहना अभी भी ज़रूरी है. उसे मालूम है कि २०१४ का चुनाव जीतना आसान नहीं होगा, बीजेपी अपने अलाइंस के साथ सरकार बनाने की कवायद में जीतोड़ मशक्क़त करेगी. इससे देश के लोकतांत्रिक ढांचे को भी बहुत लाभ नहीं पहुंचेगा। फंडामेंटलिस्ट मज़बूत होंगे जिससे देश का राजनीतिक मैथ्स आखरी लाइन पर बिगड़ जायेगा। 
'आप' को दिए जाने वाले समर्थन के पीछे कांग्रेस का एक बड़ा उद्देश्य यह भी है कि दिल्ली के सिंहासन को आरएसएस के षड़यंत्र से दूर रखा जाये। इसमें जो कांग्रेस के नेता बढ़-चढ़कर बवाल मचा रहे हैं, वे अदूरदर्शी और अवसरवादी नेता हैं जिनकी कांग्रेस पृष्ठभूमि में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं है.
यह तय है कि २०१४ के चुनाव से पहले ही बीजेपी साम, दाम, दंड-भेद का इस्तेमाल कर  'आम आदमी पार्टी' को सत्ता से उतार कर ही दम लेगी क्योंकि वह मात्र सत्ता ही चाहती है. इस पार्टी को वह सत्ता में नहीं रहने देगी क्योंकि अब वह 'आप' के किले को कहीं तक भेद चुकी है. सच्चाई यह है कि 'आप' में आरएसएस पहले से पैठ बनाये हुए थी. 
सूत्र बताते हैं कि जल्द ही दिल्ली की राजनीति में एक नए गठबंधन का  नया सिनेरियो सामने आने वाला है. समझौते की राजनीति अपनी पृष्ठभूमि में फ़िलहाल उचित समय का इंतज़ार करेगी। बागी नेताओं ने अपनी भूमिका तय कर ली है और नेतृत्व अरुण जेटली व नरेंद्र मोदी ने संभाल लिया है. मामला  न दिखाई देने वाली मूंछों के बालों का आ गया है. अब यह लड़ाई मात्र दिल्ली के सिंहासन  की ही  बल्कि केंद्र के सिंहासन की शुरू हो गई है.
राजनीति में कोई किसी का दोस्त नहीं होता है. कल का दोस्त आज का दुश्मन बन जाता है. बीजेपी अरविन्द केजरीवाल के हर दोस्त पर अपनी मुहर लगाने लगी है. वह राजनीतिक गेम खेलना जानती है  और पूरा भ्रष्ट्र-तंत्र व माफिया उसके पास और उसके पीछे है. उसके पास हर तरह के खिलाडी हैं, जबकि सीएम अरविन्द केजरीवाल अपने नौकरशाहों तक को अभी भी '---साहब' कहकर सम्बोधित करते हैं. पार्टी संयोजक के रूप में भी अरविन्द केजरीवाल अभी तक अच्छे राजनीतिक-धावक नहीं बन पाये हैं. वः जानते हुए भी यह बात जानना नहीं चाहते कि राजनीति की पटरियों पर दौड़ती हर सुपरफास्ट को अपने स्टेशन से पैसेंजर उठाने ही पड़ते हैं और यह कि तेज़ दौड़ने वाला हर धावक जीत हासिल कर ले, ज़रूरी नहीं है.
वास्तविकता यह है कि ६५ वर्षों की राजनीति में विचारहीन लोकतंत्र अपनी टोपियां  बदलता आ रहा है. जब-जब उसने टोपियां बदलीं, सत्ता के गलियारों में उसके रंगों का असर दिखाई दिया। राजनीति के पंडितों ने माना कि  हर  टोपी  के नीचे लोकतान्त्रिक समाजवाद के कलफ में अवसरवाद का डैंड्रफ छुपा हुआ है जिसे दुर्भाग्य से इस देश का 'आम आदमी' ठीक से कभी नहीं देख पाया. देख पाता तो 'आम आदमी पार्टी' को जन्म लेने की ज़रुरत नहीं पड़ती।  
इन सब के बावजूद हो सकता है कोहरे में ओस से भीगे केले के पत्ते पर 'आम आदमी पार्टी' के संयोजक अरविन्द केजरीवाल अपनी उंगली से भावी विकसित भारत का मानचित्र बना रहे हों, किसी को यह जूनून लग सकता है, मुझे उकी यह दीवानगी पसंद है. 
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