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साम्यवाद भ्रम, प्रकृतिवाद प्रकृति का यथार्थ /रंजन ज़ैदी
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मंदिर छा त्र-जीवन में समयवादी मित्र मुझे अपने खेमे में आने के लिए प्रेरित चर्च करते थे और मैं उनसे प्रश्न पूछता रहता था कि साम्यवाद में 'साम्य' जैसा क्या है? यह तो अप्राकृतिक व्यवस्था की अव्यवस्थित जीवन-पद्धति है. प्रकृति में कोई वस्तु समान नहीं है. फूलों में सुगंध है किन्तु हर फूल में सुगंध नहीं होती। फूलों में सौंदर्य है, किन्तु हर फूल में नहीं। वृक्षों में कोई बहुत ऊंचा तो कोई बहुत छोटा घास के रूप में. कोई फलदार तो कोई बिना फलवाला। कोई मीठा तो कोई कडुवा, कसैला, फीका। गोल धरती पर भी कहीं पहाड़ों का बोझ तो कहीं पहाड़ों पर बर्फ। कोई पहाड़ वनस्पतियों से मालामाल तो कहीं सूखे पर्वतों की श्रृंखलाएं जो बूँद-बूँद पानी को तरसती हैं. कहीं पठार तो कहीं बड़े हिम-खंड। कहीं विशाल रेत के महासागर तो कहीं खारे पानी के उन्मत्त सागर। सागर में भी असमानता। कहीं बर्फीली धाराएं तो कहीं गर्म पानी की नदियां। समानता यह कि उन्हें एकसाथ बहते रहने की प्रकृति ने व्यवस्थित अनुमति दे रखी है. मैदानी क्षेत्र में देखें...
अंतर्राष्ट्रीय साहित्य/मिस्र के प्राचीन साहित्य पर सुधारवादी विचारधारा का प्रभाव अधिक था.
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डॉ. रंजन ज़ैदी अं तर्राष्ट्रीय साहित्य में रुचि रखने वाले पाठक जानते हैं कि मिस्र के प्राचीन साहित्य पर सुधारवादी सुधारवादी विचारधारा का प्रभाव विचारधारा का प्रभाव अधिक था. 1930 के बाद से जब वहां के नए साहित्य से रोमैंटिक-कविता की विदाई हुई और 'नई आलोचना' के आंदोलन की ज़मीन हमवार हुई तभी से सामाजिक यथार्थवाद को वहां के साहित्य में स्थान मिलने लगा. 'नई आलोचना' के आंदोलन को बढ़ावा देने में अली महमूद तहा, इब्राहीम नाजी और अहमद ज़ौक़ी जैसे साहित्यकार बढ़-चढ़कर नज़र आते हैं, कारणथा वहां की शैक्षिक क्रांति का उदय और देश भर में मुफ्त शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना. शैक्षिक क्रांति का धुआं उठा तो आधुनिक मिस्री थिएटर के जनक युसूफ इदरीस को धुएं की बुनियाद में ब्रिटिश-साम्राज्य के विरुद्ध धधकते अंगारों के रूप में सुलगती हुई नफरत की आग भी दिखाई देने लगी जिसने कालांतर में गुलामी से निजात की आवाज़ बुलन्दकर वहां के साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की और नजीब महफूज़ जैसे उपन्यासकार को 'दी मेराज' जैसा उपन्यास लिखन...