साम्यवाद भ्रम, प्रकृतिवाद प्रकृति का यथार्थ /रंजन ज़ैदी

मंदिर 
छात्र-जीवन में समयवादी मित्र मुझे अपने खेमे में आने के लिए प्रेरित
चर्च 
करते थे और मैं उनसे प्रश्न पूछता रहता था कि साम्यवाद में 'साम्य' जैसा क्या है? यह तो अप्राकृतिक व्यवस्था की अव्यवस्थित जीवन-पद्धति है.
          प्रकृति में कोई वस्तु समान नहीं है. फूलों में सुगंध है किन्तु हर फूल में सुगंध नहीं होती। फूलों में सौंदर्य है, किन्तु हर फूल  में नहीं। वृक्षों में कोई बहुत ऊंचा तो कोई बहुत छोटा घास के रूप में. कोई फलदार तो कोई बिना फलवाला। कोई मीठा तो कोई कडुवा, कसैला, फीका। गोल धरती पर भी कहीं पहाड़ों का बोझ तो कहीं पहाड़ों पर बर्फ। कोई पहाड़ वनस्पतियों से मालामाल तो कहीं सूखे पर्वतों की श्रृंखलाएं जो बूँद-बूँद पानी को तरसती हैं. कहीं पठार तो कहीं बड़े हिम-खंड। कहीं विशाल रेत  के महासागर तो कहीं खारे पानी के उन्मत्त सागर। सागर में भी असमानता। कहीं बर्फीली धाराएं तो कहीं गर्म पानी की नदियां। समानता यह कि उन्हें एकसाथ बहते रहने की प्रकृति ने व्यवस्थित अनुमति दे रखी है.
          मैदानी क्षेत्र में देखें तो हम पाएंगे कि कहीं धरती सोना उगलती है तो उसी धरती के किसी भाग में कहीं सूखा पड़ रहा होता है. कहीं मीठे पानी से भरी नदिया हैं तो कहीं सूखी नदियों के बाँझ सरीखे निशान, दलदल।
धरती के गर्भ में कहीं सोना है तो कहीं पीतल। कहीं लोहा है तो कहीं दूसरे बहुमूल्य खनिज। कहीं मीठे पानी के स्रोत हैं तो कहीं पानी खारी है. कहीं ऐसा भी नहीं है.
रंजन ज़ैदी : बैंकाक (थाईलैंड) के  बौद्ध मंदिर में।
मानव समाज में पहले दास-प्रथा थी. किसी के पास बहुत से गुलाम होते थे तो कोई खुद गुलाम होता था. जंगल से पशु पकड़कर उन्हें गुलाम बना लिया जाता था. दुधारी पशुओं को पालकर उनसे उनका दूध हासिल कर लेना और उसके बच्चों को दूध से वंचित कर देना शक्ति का सूचक था. जब तक दूध मिलता, पशु प्रिय माना जाता, बाद में उसे मारकर खा लिया जाता। कारण कि पशु पर मनुष्य का अधिपत्य है, इसलिए दासत्व से बंधा है . गुलाम की भूमिका भी समान थी.
          पशुओं  में भी असमानता का संसार देखा गया. जो बलिष्ठ है, वह कमज़ोर को अपनी भूख मिटाने का साधन मानता है. यह सिलसिला करोड़ों वर्षों से पृथ्वी नामक ग्रह पर नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे तक प्रकृति के हर जानदार के बीच व्यवस्थित ढंग से निरंतर चलता आ रहा है. कहीं समानता नहीं है.
मस्जिद 
मानव-समाज में स्त्री भी अपनी संतान को जन्म देने के उद्देश्य से उसी पुरुष को अपने शारीर तक आने की अनुमति देती है जो शारीरिक रूप से सक्षम होता है. बलात्कार इसी प्राकृतिक व्यवस्था से निकली अव्यवस्था का सूचक है. बलात्कार और समलैंगिक यौनाचार की अप्राकृतिक मानसिकता पशुओं में भी विद्यमान है. जलचरों और पक्षियों में भी समानता नहीं है. वहाँ भी जो शक्तिशाली है, वह कमज़ोर को खाता है. वहाँ भी सौंदर्य है किन्तु ऊसमें भी कुरूपता है, निर्दयता और निर्ममता है. समानता उनमें भी नहीं। उनमें भी विभाजन है, कुरूपता है, निर्दयता और निर्ममता है.
          फिर हम मानव-समाज में 'साम्य 'की  बात क्यों करते हैं ?
          जहाँ साम्यवाद है या रहा है, वहाँ का जनजीवन क्या अनुकरणीय कहा जा सकता है? वर्षों से साम्यवाद हमें हमारे प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाया है. उस व्यवस्था में  'माऊ ज़े तुंग' ने रेड-रेवल्यूशन के दौरान हज़ारों कमज़ोर चीनी नागरिकों को मार दिया, तिब्बतियों को देश  से निकाल दिया। 'चाऊ एन लाई' की सेना ने भारत पर भी आक्रमण कर सैकड़ों भारतीय सैनिकों को अकारण शहीद कर भारत के एक बड़े भूभाग पर कब्ज़ा कर लिया.  हम आजतक उससे अपनी ही ज़मीन वापस नहीं ले पाये हैं.
गुरुद्वारा 
पीछे जाएँ तो कार्थेज का इतिहास सामने आजाता है. दो-दो विश्व महायुद्ध  पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं , हेरोशमा, नागासाकी से लेकर वेतनाम की बर्बादी का इतिहास सामने घूमने लगता है. स्वार्थ-लोलुपतावश शक्तिशाली यूरोपीय देशों ने मिलकर अफगानिस्तान, मिस्र, इराक़, और लीबिया को तबाह कर दिया और अब सीरिया जैसे कई दूसरे कमज़ोर देश निशाने पर है. रूस की सेनाएं एक नए महायुद्ध के कगार पर हैं.
यह सब 'शक्ति प्रदर्शन' का उदघोष है जो कभी मंदिरों में पनाह लेता है तो कभी गिरजों में। कभी बौद्ध-मठों में तो कभी मस्जिदों में. कभी हुजरों-खानकाहों में तो कभी गुरुद्वारों में. हर जगह एक शक्ति का 'आराध्य' वहाँ उपलब्ध है जिसके आगे हम सिर झुका लेते हैं. यहीं पर झुकाने वाली शक्ति देवता का रूप भर लेती है और झुक जाने  वाली कमज़ोर रीढ़ दासत्व  को स्वीकार कर लेती है. यह प्रकृति का चक्र नहीं, अप्राकृतिक व्यवस्था का 'स्टिग्मा' है . हम निजी स्वार्थवश इसमें परिवर्तन लाते रहते हैं। परिवर्तन लाने के बाद अपने  शरीरों  को लोहे के सुरक्षा-कवचों से  ढक लेते हैं। साम्यवादी फुटपाथ से चलकर महंगे बंगलों तक जा पहुँचता है. वहाँ से वह परदे की ओट में पूंजीवाद की राजनीति शुरू कर देता है
          मैंने किसी भी साम्यवादी को नहीं देखा कि वह अवसर आने पर शक्तिशाली न बना हो, किसी कमज़ोर समुदाय कि आर्थिक मदद की हो, उसे बराबर बिठाया हो, उसे रहने के लिए अपना गेराज दे दिया हो.
इस सान्दर्भिक-प्रकरण  में हमें प्रकृति को स्वीकार कर उसके संगीत को सुनना चाहिए, गीता-ज्ञान के सागर-मंथन के बीच अपने को पहचानना चाहिए, बुद्ध के उस त्याग में निहित उस चिंतन को तलाशना चाहिए जिसने प्रकृति की परतें उकेरकर भीतर के अंधकार में प्रकाश का दर्शन कराया।
          ईसा के सलीब पर पाई जाने वाली खून की हर बूंद में उस ब्रह्महान्ड को खोजना चाहिए जिसमें  मानवता के होने का विश्वास पनप रहा है. उस सन्देश को भी सुनना चाहिए जो ईसा के सलीब से निकला था, वेटिकन चर्च के गुम्बदों से नही, न ही कालांतर में  साम्यवाद की संहिताओं के फड़फड़ाते पन्नों के भीतर से.
इससे इतर भी मुक़द्दस कुरआन की आयतों में अल्लाह के होने की ग़ैबी आवाज़ महसूस करनी चाहिए और जानना चाहिए कि अल्लाह ने प्रकृति में सबको जीने, निश्चित अवधि तक दुनिया में रहने का अधिकार क्यों दिया है.
          वाहे गुरु के होने का अर्थ तलाशना चाहिये जिसने मानवता की  रक्षा के लिए खुद को बलिदान कर दिया। विचार-मंथन  के लिए बहुत है. बहस के लिए कुछ भी नहीं।
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