अंतर्राष्ट्रीय साहित्य/मिस्र के प्राचीन साहित्य पर सुधारवादी विचारधारा का प्रभाव अधिक था.

डॉ. रंजन ज़ैदी
      अंतर्राष्ट्रीय साहित्य में रुचि रखने वाले पाठक जानते हैं कि मिस्र के प्राचीन साहित्य पर सुधारवादी
 सुधारवादी विचारधारा का प्रभाव 
विचारधारा का प्रभाव अधिक था. 1930 के बाद से जब वहां के नए साहित्य से रोमैंटिक-कविता की विदाई हुई और 'नई आलोचना' के आंदोलन की ज़मीन हमवार हुई तभी से सामाजिक यथार्थवाद को वहां के साहित्य में स्थान मिलने लगा.
       'नई आलोचना' के आंदोलन को बढ़ावा देने में अली महमूद तहा, इब्राहीम नाजी और अहमद ज़ौक़ी जैसे साहित्यकार बढ़-चढ़कर नज़र आते हैं, कारणथा वहां की शैक्षिक क्रांति का उदय और देश भर में मुफ्त शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना.
       शैक्षिक क्रांति का धुआं उठा तो आधुनिक मिस्री थिएटर के जनक युसूफ इदरीस को धुएं की बुनियाद में  ब्रिटिश-साम्राज्य के विरुद्ध धधकते अंगारों के रूप में सुलगती हुई नफरत की आग भी दिखाई देने लगी जिसने कालांतर में गुलामी से निजात की आवाज़ बुलन्दकर वहां के साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की और नजीब महफूज़ जैसे उपन्यासकार को 'दी मेराज' जैसा उपन्यास लिखने पर मजबूर होना पड़ा. हालांकि यह उपन्यास 'फ्राइड' के दार्शनिक दृष्टिकोण और उसके वैयक्तिक चिंतन से भी प्रभावित नज़र आता है, लेकिन यह भी पूरी तरह से सच है कि इस उपन्यास ने मिस्री अदब की दिशा का संकेत अवश्य दिया जिससे वहां के साहित्य को सच बोलने, समाज, देश और वहां की राजनीति को आईना दिखाने का साहस जन्मा और 'साहसे-रायगाँ' उपन्यास की महिला लेखिका डॉ. नवाल-उल-असदावी को जेल जाना पड़ा.
     डॉ. नवाल-उल-असदावी पर मुक़दमे चले, उनकी पुस्तकों को आग लगाई गई. प्रताड़नाकी मिसाल यहां तक कि उन्हें पागलखाने तक भेजने की तैयारी कर दी गई लेकिन संयोग से उन्हें भेजा नहीं गया.

      डॉ.नवाल-उल-असदावी ने 45 वर्षों तक अरबी साहित्य की सेवा करते हुए 30 महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की जिनका विश्व भर की लगभग 20 भाषाओँ में अनुवाद किया किया गया.
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