यह महज मोदी के 'उदय' और आडवानी के ‘अस्त’ होने का संघर्ष नहीं है,,,,,,,/श्रीराम तिवारी*
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| एलके अडवाणी, नमो और बीजेपी के अध्यक्ष |
इंदिरा युग में कुछ कालखंड के लिये एक दुष्प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा था। ये तब की बात है जब 'इंदिरा इज इंडिया' का उद्घोष चल रहा था। हालाँकि 1971 में पाकिस्तान पर भारत की विजय ने इंदिरा जी को ‘दुर्गा अवतार’ घोषित कर दिया था। यह उपाधि तब 'अटल बिहारी वाजपायी' ने इंदिराजी को प्रदान की थी। वे इतनी आत्ममुग्ध हो गयीं कि अपने सारे व्यक्तिगत फैसले देश पर लादने लगीं। दिखावे मात्र के लिये देश की लोकतान्त्रिक संस्थाओं को सिर्फ मुहर लगवाने तक ही सीमित कर दिया गया। बाद में दुनिया ने जाना कि उन्हें ‘प्रभुता पाय काहि मद नाहीं‘ से भी आगे आपातकाल का कलंक धारक होना पड़ा। जेल भी जाना पडा। संघ परिवार के सर्वेसर्वा भी अब उसी रास्ते पर चल रहे हैं।
सब कुछ पहले से नागपुर में तय हो जाता है। दिखावे के लिये भाजपा संसदीय बोर्ड या केन्द्रीय कार्य कारिणी की आम सहमति का ढोंग किया जाता है। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार छह बजे घोषित किया जाता है जबकि सारे देश में शाम 5 बजे ही भाजपा कार्यालयों में जश्न मनाने का अग्रिम फरमान जारी हो जाता है।आम कार्यकर्ता भी वाकिफ है कि फैसला तो संघ ने पहले ही कर रखा है केवल रस्म अदायगी शेष है। उसमें भी कोई लालकृष्ण आडवानी जैसा 'न नुकर' करे तो उसे धकियाकर मोदी की ताजपोशी की जाये। ये ताजपोशी भी बेहद अगम्भीर और प्रहसन-पूर्ण है।सब जानते हैं कि भारत में प्रधानमंत्री का चुनाव डायरेक्ट जनता नहीं करती। आम चुनावो में जिस दल या ‘गठबंधन’ का बहुमत होगा उसका संसदीय बोर्ड फैसला करेगा कि देश का प्रधानमंत्री कौन होगा ? भाजपा, संघ परिवार और दक्षिणपंथी मीडिया यदि मोदी को प्रधानमंत्री जैसा ही ट्रीट कर रहा है तो ये ‘नाटक-नौटंकी’ नहीं तो और क्या है ?
जो लोग किसी खास शुचिता के लिये समर्पित हों, जो नैतिक मूल्यों के हामी हों, जिनको अपने चाल-चरित्र और चेहरे पर नाज हो, जो स्वयम्भू ‘राष्ट्रवादी और राजनैतिक दल के रूप में 'पार्टी विद डिफ़रेंस' हों ऐसे लोगों को यह कदापि शोभनीय नहीं है कि प्रजातांत्रिक प्रक्रिया का दिखावा करें। आप यह भी नहीं कह सकते कि ये तो संघ परिवार या भाजपा का अंदरूनी मामला है। देश के प्रमुख विपक्षी दल में क्या हो रहा है या क्या चल रहा है, यह देश के भविष्य को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक है।इतना ही नहीं ग्लोब्लाइजेशन के दौर में तो दुनिया में कहीं भी कुछ भला-बुरा होता है तो एक-दूसरे पर असर पड़ता है। अमेरिका में मंदी आती है तो दुनिया काँपने लगती है। ईराक पर हमला होता है तो भारत में पेट्रोल के भाव बढ़ जाते हैं। सोवियत क्रांति असफल होती है तो सारी दुनिया के मेहनतकशों का शोषण फिर से होने लगता है। नाटो देश सीरिया पर हमले की धमकी देते हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था थर-थर काँपने लगती है। जब दुनिया का अन्योंन्याश्रित सिद्धान्त ये है तो देश के अन्दर भाजपा और संघ ने देश का भावी प्रधानमंत्री किसे प्रत्याशित किया? यह सारे देश को प्रभावित करने वाला विमर्श तो अवश्य ही है।
यहाँ सिर्फ मोदी का समर्थन या विरोध महत्वपूर्ण नहीं है। लालकृष्ण आडवाणी का समर्थन या विरोध भी महत्वपूर्ण नहीं है। यहाँ राष्ट्र-हित के लिये क्या है और राष्ट्र हित में क्या नहीं है, यह महत्वपूर्ण है। यदि आडवाणी जी भाजपा के लिये चिन्तित हैं तो और भी लोग देश के लिये चिन्तित हैं. दोनों ही सूरत में उनके अभिमत को नज़र अंदाज करना कतई विवेकपूर्ण नहीं हैं।
वास्तविकता यह है कि चन्द जोशीले युवाओं या मीडिया की गफलतपूर्ण लफ्फाजी से न तो मोदी को राज्यसत्ता मिलने जा रही है और न ही आडवाणी जी को कोई व्यक्तिगत घाटा होने जा रहा है। जो भी अच्छा बुरा होना है, वो देश का ही होना है। इसलिये संघ परिवार की आन्तरिक वैयक्तिक महात्वाकाँक्षा संघर्ष के इस विमर्श को देश की जनता नजरअंदाज नहीं कर सकती।
जो लोग नरेन्द्र मोदी के 'उदय' और लालकृष्ण आडवानी के ‘अस्त' को दो व्यक्तियों के संघर्ष के रूप में देखते हैं, वे अपने विवेक और बुद्धि-कौशल का पूरा-पूरा उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। शायद नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने की उतनी उत्कंठा नहीं होगी जितनी व्यग्रता ‘आरएसएस’ को उन्हें इस पद पर देखने की है। संघ ने एक ओर तो अपनी इस व्यग्रता को नरेन्द्र मोदी के रूप में राजनैतिक पटल पर शिद्दत से उकेरने का काम किया है, दूसरी ओर स्वामी रामदेव व अन्य धार्मिक गुरुओं, साधुओं-सन्यासियों, विश्व हिन्दू परिषद् तथा तमाम हिन्दुत्ववादियों को अपने-अपने ‘काम’ पर लगा दिया है। मोहन भगवत की अगुवाई में ‘संघ’ ने जितनी राजनैतिक सक्रियता दिखाई है, उतनी संघ के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गयी।
संघ की इस सक्रियता से कट्टरपंथी हिन्दू भले ही पुलकित होते हों किन्तु ‘देशभक्त-धर्मनिरपेक्ष’ जनता की चिंताएँ बढ़ना लाजमी है। हालाँकि संघ ने अपना हिन्दुत्ववादी एजेण्डा लागू करने के लिये जिस तरह मोदी को आगे बढ़ाया है, आडवाणी को उतनी ही शिद्दत से उखाड़ने में भी इस्तेमाल किया है। ऐसा ही कृत्य कभी अटलजी को परेशान करने और वैसा ही एजेण्डा लागू करने के लिये आडवानी का भी इस्तेमाल किया गया था।
अटलजी ने संघ को सत्ता और संविधान से ऊपर नहीं माना। उम्मीद है कि एक बार सत्ता मिल जाने पर नरेन्द्र मोदी भी संघ का एजेण्डा भूल जायेंगे कितु खतरा ये है कि वे कहीं संघ की निरँकुश तानाशाही ‘एक्चाल्कानुवार्त्तिव’ पर न चल पड़ें। वैसे भी मोदी में लोकतांत्रिकता का घोर आभाव है। इन सभी बातों के मद्देनजर देश की जनता को सावधान किया जाना जरुरी है। धर्मनिरपेक्ष-लोकतान्त्रिक्तावादी व्यक्तियों और समूहों की जिम्मेदारी है कि ‘बाइब्रेंट गुजरात’ के मिथ से जनता को सावधान करें और बताएं कि गुजरात के गाँवों में हालत सबसे बदतर है।
चन्द शहरों में चन्द अमीरों की संपदा को देखकर झूंठी चकाचौंध में न पड़ें। अब जब कि मोदी का विजूका राजनीति के खेत में गाड़ा जा चुका है तो कोई भी उनके निकट आने वाला नहीं है। नीतीश या जदयू का उदाहरण तो भारतीय राजनैतिक हाँडी का एक मामूली चावल मात्र है। देश के छह राष्ट्रीय और 48 क्षेत्रीय दल धर्मनिरपेक्षतावादी हैं और सभी का अपना-अपना स्थाई वोट बेंक है। एक-दो प्रतिशत की घटत-बढ़त से राज्य सरकारें आती जाती रहतीं हैं। भाजपा, शिवसेना, अकाली दल के अलावा राजग में अभी तो फिलहाल कोई नहीं है और जिन मोदी ने अपने ही वरिष्ठों का ‘राजनैतिक वध’ किया हो, उनसे वही जुड़ना चाहेगा जिसे राजनैतिक हाराकिरी का शौक होगा।
राजग और संघ परिवार के सदस्य ज्यों-ज्यों ‘नमो राग‘ का आलाप का रहे हैं, त्यों-त्यों देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज होती जा रही है। दक्षिण भारत और पूर्वी भारत में तो वैसे भी राजग या भाजपा का कोई नाम लेने वाला नहीं हैं किन्तु यूपी से पर्याप्त समर्थन की आस भी धूमिल होती जा रही है। संघ परिवार, मोदी, अमित शाह, अशोक सिंघल चाहे लाख जतन कर लें किन्तु वे यूपी के जातिवादी समाज को साम्प्रदायिकता में ध्रुवीकृत नहीं कर सकेंगे।
उधर अखिलेश यादव के राज में सम्पन्न सौ से ज्यादा साम्प्रदायिक दंगों के चलते हिन्दू वोट भले ही भाजपा की ओर ज्यादा पोलोराईज्ड होते रहें किन्तु मुस्लिम वोट अब मुलायम को नहीं, कांग्रेस को ही मिलेंगे। चुनाव उपरान्त जब राजग को पर्याप्त संख्या में सांसदों की जरुरत पड़ेगी तब गैर कांग्रेस और गैर भाजपा के लोग यानी तीसरा मोर्चे-क्षेत्रीय दल और वाम-दल महती भूमिका में होंगे। वे मोदी का समर्थन नहीं करेंग। यह बात लालकृष्ण आडवानी बखूबी जानते हैं और इसीलिये मोदी को नेता नहीं मानने की बात कर वे राजग का भला ही कर रहे हैं।
शनैः शनैः भाजपा और उसकी ‘परामर्शदात्री’ मात्र संस्था यानी ‘आरएसएस ‘ के आंतरिक द्वंद्व की भनक सभी को लग चुकी है। भाजपाई भले ही कभी अपने आपको ‘पार्टी विद डिफ़रेंस‘ के निर्माता-निर्देशक कहा करते थे किन्तु उसके जन्म से ही आन्तरिक वैचारिक संघर्ष की मरोड़ निरन्तर महसूस की जाती रही है। संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के वरिष्ठ सदस्य, बाहर भले ही किसी खास विषय पर एकमत से एक स्वर में अपने को अभिव्यक्त करते देखे-सुने जाते हों, किन्तु अन्दर का घमासान किसी से भी छुपा हुआ नहीं है।
संजय जोशी से पूर्व गोविन्दाचार्य और उनसे भी पूर्व कई वरिष्ठ बौद्धिक प्रचारक-संगठक सिर्फ इसलिये गुमनामी के अँधेरे में धकेले जाते रहे हैं क्योंकि आतंरिक-द्वंद्व के संघर्ष की अवस्था में उन के पास पर्याप्त ‘जन-समर्थन’ नहीं था। उनका राजसत्तात्मक वर्चस्व कमजोर था या नैतिकता का पक्ष कमजोर था। संघ की आनुषांगिक राजनैतिक शाखा ‘भाजपा’ में और उसके पूर्ववर्ती स्वरूप ‘जनसंघ’ में भी यही सिद्धान्त लागू किया जाता रहा है।
दीन दयाल उपाध्याय, बलराज मधोक, नानाजी देशमुख, मदनलाल खुराना, केशुभाई उमा भारती, येदुरप्पा, तपन सिकदार और राम जेठमलानी के साथ क्या व्यवहार किया गया, ये भाजपा के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय तो नहीं कहा जा सकता। इस अध्याय में एक और क्षेपक जुड़ जाने की सम्भावना है, किन्तु इसमें संघ के कर्ता-धर्ताओं को शायद ही सफलता मिल पायेगी। लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में एक सशक्त ग्रुप संघ की दादागिरी को चुनौती देने की ओर अग्रसर हो रहा है। यह सर्वविदित है कि अब लालकृष्ण आडवानी किसी व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि राजनैतिक ध्रुव का नाम है जो भारतीय राजनीति में खास मुकाम रखता है।
संघ और भाजपा में सार वस्तु का कोई भेद भले ही न हो किन्तु रूप और आकार में जमीन आसमान का फर्क है। संघ अपने विराट रूप और आकार की कीमत पर सत्ता की जिम्मेदारी से दूर रहते हुये भी दुनिया के तमाम स्वार्थ सिद्ध करने के लिये जाना जाता है। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये उसने ‘भाजपा’ रूपी राजनैतिक दल का सृजन अवश्य किया है किन्तु इस राजनैतिक पार्टी को ताकतवर बनाने में जिन लोगों ने अपनी जिन्दगी खपा दी उनमें ‘लालकृष्ण आडवानी का नाम सबसे ऊपर है। अतएव मोदी बनाम आडवानी के लिये नहीं बल्कि कट्टरवाद बनाम बहुलतावाद के लिये यह संघर्ष भविष्य में याद क्या जाता रहेगा। (*श्रीराम तिवारी , *लेखक जनवादी कवि और चिन्तक हैं)
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