प्रदेश का दुर्भाग्य / रंजन जैदी

अब उत्तर प्रदेश की जानता को आत्म-मंथन करना होगा. उत्तर प्रदेश का अपराधी माफिया राजनीति से निष्कासित किया जा चुका है (इसका अर्थ यह नहीं है कि उत्तर प्रदेश के क्राईम-रेट का पारा नीचे आ गया है). नयी पीढ़ी अपने प्रदेश का विकास चाहती है. उसके पास सुसंस्कृत भाषा, महान संस्कृति, परम्पराएँ, इतिहास, अद्भुत भूगोल और सोना उगलती धरती है. हर क्षेत्र में उसका महान योगदान रहा है लेकिन विगत वर्षों की अवसरवादी राजनीति, सांप्रदायिक और कबीलाई सोच, आयातित क्षेत्रीय चरमपंथिवाद तथा वैयक्तिक और जातीय संघर्ष तथा  राज्य के भ्रष्ट अक्षम नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश को काफ़ी पीछे धकेल दिया है. इसे  प्रदेश का दुर्भाग्य कहा जा सकता है. लेकिन इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के विकास की मीटर गेज-ट्रेन का सफ़र जारी रहा.आज़ादी के बाद से लेकर मायावती के शासनकाल तक उत्तर प्रदेश ने बहुत कुछ देखा है, बहुत कुछ सहा भी है. अब विकास के नाम प़र पार्कवाद के विस्तार की आंधी चल रही है. राज्य की अनेक महत्वपूर्ण समस्याएं ठंडे बस्ते में दाब दी गयी हैं. अपराध और भ्रष्टाचार चरम प़र है. मायावती लगाम कसना चाहती हैं, लेकिन उनमें बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार  जैसी इच्छाशक्ति नहीं दिखाई देती है. हालाँकि मायावती में वह सब है जो नितीश में है. इसके बावजूद मायावती बहुत कुछ नहीं कर पा रही हैं. वह चाहें तो भू-माफिया, अपराध, भ्रष्टाचार और बेकारी व बेरोज़गारी प़र आसानी से अंकुश लगा सकती हैं और विकास को गति भी दे सकती हैं, जैसा कि बिहार में नितीश के शासनकाल में हुआ है. लेकिन उनमें इच्छाशक्ति का अभाव है. हालाँकि मेरा मानना यह है कि मायावती आने वाले समय में शायद कुछ महत्वपूर्ण क़दम उठाने की योजना बना सकती  हैं. यदि ऐसा होता है तो यह उनके लिये भावी राजनीति को एक नया आसमान मुहय्या कराएगा. जहाँ तक राज्य में युवाओं को जागरूक करने और उनमें राजनीतिक इच्छाशक्ति जाग्रत करने की राजनीति है तो यहाँ यह बात अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि युवाओं के लिये चुनाव का महत्व स्टुडेंट्स-यूनियन के चुनाव से अधिक महत्त्व नहीं रखता है, और ऐसे चुनाव का महत्त्व सामयिक और अल्पकालिक होता है जो अपनी निर्णायक भूमिका प़र सवालिया निशान लगा देता है. चुनाव के नतीजों का गडित अलग होता है जिसका भावनाओं से सम्बन्ध नहीं होता है. इसलिए यदि २०१४ के चुनाव में कांग्रेस कि ओर से प्रियंका गाँधी मैदान में नहीं उतरती हैं तो उसके नतीजे बेहद निराशाजनक हो सकते है.इसे कांग्रेस को याद रखना होगा.       

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