जहालत का कोई मज़हब या फ़िरक़ा नहीं होता है.

'सियासत में मज़हब का ज़िक्र नहीं आना चाहिए।'
डॉ. रंजन ज़ैदी        
लोक-सभा के चुनाव की गहमा-गहमी में मुस्लिम उलेमाओं ने भी अपनी उपस्थिति अथवा उपेक्षा की कीमत वसूलने में देरी नहीं की. लखनऊ की राजनीतिक स्थिति पर जब स्थानीय इस्लामिक मदरसा मदरसा-ए-नाज़मीया के संस्थापक-प्रिंसिपल अल्लामा सैय्यद हमीदुल हसन से  alps t-politics के वरिष्ठ संपादक ने पूछा कि क्या लखनऊ की सियासत का ध्रुवीकरण होना निश्चित है? जवाब था, 'सियासत में मज़हब का ज़िक्र नहीं आना चाहिए।' उन्होंने कहा,'लोग बिना मज़हबो मिल्लत के मुल्क कि लोकतान्त्रिक ताक़तों को मज़बूत बनाने में आगे आयें क्योंकि हम सभी लोग मिलकर एक अच्छी संसद बनाने जा रहे हैं.' जब उनसे दिल्ली में मौलाना सैय्यद कल्बे-जव्वाद नक़वी के प्रदर्शन का ज़िक्र किया गया तो उनका कहना था कि, 'इस समय इस तरह के मामलों में नहीं पड़ना चाहिए था.'  
          सुन्नी दर्सगाह के एक प्रबुद्ध बुद्धिजीवी  (नाम न दिए जाने की शर्त पर) ने कहा कि 'सियासी मुद्दे से
लखनऊ में शिया-सुन्नी के बीच बहुत मज़बूत रिश्ते हैं.
जुड़े प्रदर्शन में शिया युवाओं का मातम करना, नारे-हैदरी के नारे लगाना, सड़कें जाम करना पूरी कौम को बदनाम करने और अपनी जिहालत का सबूत देंने जैसा है. जहालत का कोई मज़हब या फ़िरक़ा नहीं होता है. लखनऊ में शिया-सुन्नी के बीच बहुत मज़बूत रिश्ते हैं, नतीजे इसका सबूत दे देंगे। अब इनमें कोई दरार नहीं डाल पायेगा।'      

          सवाल स्थानीय अधिवक्ता दया शंकर  मिश्र से जब बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह के राजनीतिक भविष्य को लेकर  पूछा जाता है, तो वह इधर-उधर देखने लग जाते हैं. रहस्य पर से पर्दा उठाते हुए बताते हैं, कोई हवा नहीं है. पता नहीं मीडिया हवा क्यों बनाये हुए है.यहाँ लखनऊ में ठाकुर राजनाथ सिंह के राजनीतिक गणित को लखनऊ के लगभग ३ लाख से अधिक ब्राह्मण वोटों ने बीजेपी के नाराज़ लालजी टंडन को टिकट न देने के कारण गड़बड़ा दिया है. इससे नई स्थिति यह पैदा हो गई है कि अब ब्राह्मण वोट मायावती और मुलायम सिंह यादव की पार्टियों की ओर तकने लगा है.
            बीजेपी के अमित शाह वाले भड़काऊ बयान ने लखनऊ में शिया-सुन्नी वोटों को गोलबंद कर दिया है. इससे बीजेपी के कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ी बेचैनी को साफ़ देखा जा सकता है. ऐसे में समाजवादी पार्टी के अभिषेक मिश्रा के पौ-बारह होते नज़र आ रहे हैं. मिश्रा बताते हैं, 'स्थानीय लोगों का मानना है कि राजनाथ सिंह के लिए अब लखनऊ लोकसभा की सीट निकाल ले जाना आसान नहीं रहा है.'
            उधर उलेमाओं ने कांग्रेस के विरुद्ध अकारण दिल्ली में मोर्चा खोल रखा है. गत दो दिनों से लखनऊ सैय्यद कल्बे-जव्वाद नक़वी ने अपने १५० से अधिक समर्थकों के साथ प्रदर्शन में व्यस्त है. उन्होंने अपने प्रदर्शन में कांग्रेस विरोधी नारे भी लगाये। संपर्क करने पर पूछे गए सवाल के जवाब में बताते हैं कि,'शिया समुदाय का वोट कांग्रेस के ताबूत का कील बनेगा।' उनका सन्देश था कि
सोनिया गांधी और अहमद पटेल ने धोखा दिया है.' 
निवासी शिया समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मौलाना
           स्थानीय मंडावली पुलिस स्टेशन में जब उनसे पूछा गया कि क्या चुनावी वातावरण में उनके नेतृत्व में किया जा रहा शियाओं का प्रदर्शन और उनकी विशेष मांग सामयिक या उचित है? जवाब था,'सोनिया गांधी और अहमद पटेल ने उन्हें धोखा दिया है.'
          उनके अनुसार '८ अप्रैल तक कर्बला नर्सरी विवाद समाप्त हो जाना चाहिए था. आरोप के साथ उनका सवाल था कि तय डेड-लाइन पर कर्बला नर्सरी विवाद को नहीं सुलझाया गया, क्यों?
          इस संवेदनशील समस्या पर जब मुम्बई-लखनऊ से प्रकाशित उर्दू दैनिक सहाफत के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार अमान अब्बास से बात हुई तो उनका कहना था कि मौलाना सैय्यद कल्बे-जव्वाद नक़वी के इस प्रदर्शन का समय समीचीन नहीं था. वैसे भी सम्बंधित विवाद न्यायालय के विचाराधीन है.' उन्होंने कहा कि 'यह समस्या सियासी नहीं है. शीयों की कर्बला शाहे-मरदां की  ढाई एकड़ में फैली नर्सरी के अधिकरण का मामला है.' 
          ज्ञातव्य हो कि ढाई एकड़ में फैली कर्बला नर्सरी की देखभाल करते रहने वाले माली मुईद खां की अगली पीढ़ी इस समय वसीम खां की देख-रेख में इस समय दिल्ली की हाईटेक मानी जाने वाली नर्सरी के बहुमूल्य फूल हाईटेक एरिये में रहने वाले अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तियों और सदनों में सप्लाई किये जाते हैं.
          दैनिक सहाफत के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार अमान अब्बास बताते हैं कि  मौलाना कल्बे-जव्वाद नक़वी को दिल्ली में किये जाने वाले प्रदर्शन से पहले अपनी कौम को विश्वास में लेने की ज़रुरत थी. उनके सामने उस सवाल का विकल्प भी होना चाहिए कि नर्सरी की ज़मीन-अधिकरण के बाद उसके उपयोग को ध्यान में रखते हुए उनके पास क्या वैकल्पिक परिकल्पना है जिससे सम्बंधित संस्था 'अंजुमने-हैदरी' के अध्यक्ष व सम्बंधित-सदस्यों सहित समुदाय के सभी लोग एकसाथ सहमत होंगे और उनकी प्रस्तावित योजना सर्वमान्य होगी?' उनके अनुसार यदि ऐसा नहीं है तो यह मानने में संकोच नहीं किया जा सकता कि यह मात्र सियासी तमाशे से अधिक और कुछ  नहीं है.' (जारी/-2)
Next : पढ़िये, शिया पॉइंट के संयोजक और जुझारू पत्रकार ज़हीर ज़ैदी से पूछे गए तीखे सवालों  के जवाब कि क्या धार्मिक गुरुओं को अपने स्वार्थ के लिए राजनीति का इस्तेमाल करना चाहिए?   
www.samagravichar.in, alpsankhyaktimes94gzb.com, http://ranjanzaidi786@yahoo.com/+91 9350 934 635

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पुस्तक : इतिहास के झरोखे से ( 3 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी

महाभारत युद्ध नहीं, एक युग था./ रंजन ज़ैदी

ज़मीं खा गयी आसमान कैसे-कैसे/रंजन ज़ैदी