अब ईरान की बारी है : (3) / रंजन जैदी

इमाम आयतुल्लाह खमैनी
ईरान की क्रांति से पूर्व शहंशाह रज़ा शाह पहलवी की बादशाहत के कार्यकाल में ईरान (१९७९ से पहले तक) एक तरह से अमेरिकन कोलोनी की सी हैसियत रखता था. यहाँ तक कि जून १९६३ में लागू  Capitulation Accord अनुबंध पर हस्ताक्षर किये जाने के उपरांत विशेषाधिकार के अंतर्गत वहां रहने वाले अमेरिकी नागरिकों पर मुक़दमा चलाये जाने की भी अनुमति नहीं रही थी. यह एक ऐसा अनुबंध था जो आम ईरानी नागरिकों के अधिकारों को शर्मसार करता था और यह एहसास कराता  था कि  ईरानी अवाम अमेरिकी गुलाम हैं. जनवरी १९७९ में 'मर्ग बर शाह' के नारे ने तेहरान  में खलभली मचा दी और सियासी हवाओं के थपेड़ों ने रफ्ता-रफ्ता समूचे ईरान को अपनी गिरफ़्त में जकड़ लिया. यह इन्कलाब-ईरान का वैसा नारा नहीं था जैसा कभी आयतुल्लाह शीराज़ी ने तम्बाकू आन्दोलन को लेकर बुलंद किया था. लेकिन सन १९०६ में जो सामूहिक जन-आन्दोलन  सफलता के चरम पर पहुंचा तो शाही  निज़ाम को सियासी तौर पर अवाम के सामने  कहीं तक झुकना पड़ा लेकिन शीघ्र ही वह क्रांति दुर्भाग्यवश सशक्त नेतृत्व और सम्पूर्ण जन-सहयोग  के अभाव के कारण अंततः असफल हो गई.इस असफलता का बादशाह ने लाभ उठाया और तेहरान की सड़कों पर उसकी सेना ने अपने टैंक उतारकर बर्बर अत्याचार की वह दास्तान लिखनी शुरू की कि तारीखे-इंसानियत कांप-कांप उठी. आकाश से हेलीकाप्टरों द्वारा बमों की बारिश और सड़कों पर टैंकों का बर्बर नृत्य. अल्लामा इमाम खुमैनी ने शाह-इ-ईरान के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की तो मदरस-इ-फैज़िया को टैंकों ने अपने घेरे में ले लिया और रात के अँधेरे में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. सामने शाहे-ईरान की शर्त आई कि या तो मुंह बंद रखो या ईरान की सरहदों को हमेशा के लिए छोड़ने के लिए तैयार हो जाओ. ऐसे अवसर पर मज़बूत इरादों वाले कायद ने ज़ुल्म के खिलाफ सिर झुकाने से साफ इनकार कर दिया. इस इनकार ने हताश और निराश खुद्दार ईरानियन अवाम को जैसे अदृश्य शक्ति सी प्रदान कर दी. इमाम खुमैनी को बड़े ही रहस्यमई ढंग से रातोंरात ईरानी सरहद के पार निकाल दिया गया जहाँ से अल्लामा खुमैनी इस्लामी इन्कलाब का ख्वाब आँखों में लिए तुर्की के रास्ते  इराक के शहर नजफ़-अशरफ में जा पहुंचे. किस्सा यहीं पर समाप्त नहीं हुआ था.उनके ईरान छोड़ने के बाद उन्हें उनके बड़े सुपुत्र मुहब्बतुल इस्लाम मुस्तफा खुमैनी को शाहे-ईरान के सैनिकों ने शहीद कर दिया. यह एक बहुत बड़ा हादसा था.  पत्रकारों द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में अल्लामा खुमैनी ने कहा कि मुहब्बतुल इस्लाम मुस्तफा खुमैनी मेरे बेटे की शक्ल में नेमते-इलाही थे और वह अपने खालिक की बारगाह में वापस चले गए. इस घटना के बाद भी १४ वर्षों तक अल्लामा खुमैनी इराक के इमामबाड़ों और मस्जिदों से इस्लामी क्रांति के कमांड्स निरंतर प्रसारित करते रहे. हालाँकि शाहे-ईरान का अल्लामा खुमैनी के विरुद्ध प्रोपेगंडा  निरंतर जारी था और वह इस हद तक अपनी लिजलिजी सूंडों  को अवाम के सीनों में पेवस्त कर चुका था कि अवाम का दम सा घुटने लगा और वह एकाएक मुक्ति की तलाश में तेहरान की सड़कों पर उतर आई. यह सही मानों में इन्क़लाबी इस्लामी आन्दोलन था जिसने सर्वप्रथम शाहे-सफवी के तख़्त के पाए हिलाकर रख दिए थे और फिर  सन १९८९ में उसने शाह का तख्ता पलट दिया. नतीजे के तौर पर इधर शाहे-ईरान को मुल्क छोड़ना पड़ा तो उधर एक फरवरी १९७९ को अल्लामा खुमैनी को फ़्रांस छोड़कर तेहरान लौटना पड़ा. यह उनकी जिलावतनी का अंतिम अध्याय था. नतीजा यह हुआ कि मेहराबाद का हवाई अड्डा आजाद तेहरान और ईरानियों  के सम्मान का हमेशा के लिए गवाह बन गया. यह इन्कलाब-इ-इस्लाम दरअसल शाह-इ-ईरान की तारीख के जनाज़े की आखरी कील थी. अल्लामा खुमैनी  तेहरान  लौट आये. उन्होंने आते ही सर्वप्रथम बहिश्ते-ज़हरा कब्रिस्तान पहुँचने की इच्छा व्यक्त की क्योंकि इसी कब्रिस्तान में अन्य शहीदों के साथ उनके बेटे को भी यहीं  दफन किया गया था. कब्रिस्तान पहुंचकर अल्लामा ने सर्वप्रथम वहीं से शाहे-ईरान के अंत की घोषणा की. इस घोषणा का नतीजा यह निकला कि शाही दौर-हुकूमत के बर्खास्त प्रधान मंत्री शाहपुर बख्तियार को रातों रात ईरान से भागना पड़ गया. सूत्र बताते हैं कि उनके भागने में अमेरिकी सीअइए.की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी  और वह खज़ाना भी जिसेआगे चलकर अमेरिकी बैंकों में रखा गया और अब खबर है कि उसे अमेरिकी सर्कार ने ज़ब्त कर लिया है....(जारी-४)   alpsankhyaktimes94gzb.com  Mob:0-9350934635

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