तख़्त सजा है आ जाने दो/रंजन ज़ैदी
मेरे विचार से इस बार केंद्र में कांग्रेस की सरकार शायद ही बन पाये. भारतीय राजनीति का भी यह एक
टर्निंग पॉइंट होगा। कारण यह है कि इस बार कांग्रेस के पास इंदिरा गांधी जैसी नेता नही है. सोनिया गांधी कांग्रेस के लिए मात्र संयोग थीं जिन्होंने राजीव गांधी के रास्ते उनके बाद नेहरू खानदान की विरासत को सहेजे रखा जबकि न तो वह राजनेता थीं, न उन्हें राजनीति में कोई दिलचस्पी थी. अपने बच्चों के भविष्य और नेहरू-एम्पायर को छोड़कर उस देश में भी नहीं लौट सकती थीं जहाँ का मायका इस उम्र तक पहुँचते-पहुँचते अजनबी बन चुका था। बेटियां शादी के बाद हर मुल्क में मायके के लिए पहले जैसी नहीं रह जाती हैं. उन्हें ससुराल का सुख और आतंक सहना ही पड़ता है. राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी ने वे सारी यातनाएं सहीं, शब्दों के बाण झेले, अपनों के आतंक सहे, रिश्तों की साज़िशों का मुक़ाबला किया, डार्क-रूम में फूट-फूटकर रोई कि खुदा ने उसे इतनी बड़ी सजा क्यों दी? लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कांग्रेस के इतिहास में सोनिया गांधी हमेशा इज़्ज़त की नज़र से देखी जाती रहेंगीं।
सामने बच्चे थे, बच्चों का भविष्य था, कांग्रेस की राजनीतिक विरासत सामने थी. 10 जनपथ कालांतर में सोनिया गांधी का
मुक़द्दर बन गया. राजीव की समाधि और दिल में बसी उनकी मुहब्बत की तस्वीर ने सोनिया के बिखरे वजूद को संजोया, संवारा, बच्चों को स्कूल से कालेज तक भेजा और कांग्रेस पार्टी की कमान अपने हाथ में ली.
करीबी तजुर्बेकार सियासी सलाहकारों ने रस्ते दिखाए, पहले कुर्सी पाने के, फिर कुर्सी नहलाने के. धीरे-धीरे सोनिया की कुर्सी शहद की बन गई. चींटियाँ स्वतः ही बारीक से बारीक सूराख तलाशकर 10 जनपथ तक पहंचने लगीं। ऐसे ही राबर्ट वाड्रा ने अवसर पाकर मुहब्बत की सुरंग से होकर बारीक सूराख तलाशा था. प्रिंयंका रेलबेल की तरह पास के दरख़्त से लिपट गई. रेल-बेल तो अपनी प्रकृति से मजबूर होती है. कभी मेनका गांधी ने भी यही रास्ता अपनाया था और संजय गांधी उनके हो गए थे. शुरू में देखें तो इंदिरा प्रियदर्शिनी ने भी फ़िरोज़ गांधी से इश्क़ किया लेकिन वह इश्क़ शारीरिक कम 'इंटेलेक्ट' अधिक था.
सोनिया गांधी के जीवन में अवसर आया लेकिन वह प्रधान मंत्री नहीं बनीं। उद्देश्य था. बेटे को विरासत सौंपना. मनमोहन सिंह को गद्दी पर बिठा दिया। कुशल राजनीति की विजय का यह पहला पत्ता था.
बेटी ने अपनी माँ और दादी की तरह अपना रास्ता खुद चुन लिया था. यहीं से कांग्रेस के भावी संभावनाओं के सूरज को ग्रहण लगना शुरू हो जाता है. अनुभवी कांग्रेसी जान गए कि प्रियंका अब राबर्ट वाड्रा की ओर से मुक्त नहीं हो पायेगी। कई बार ऐसे अवसर आये भी जब देश ने प्रियंका में अपनी इंदिरा प्रियदर्शिनी की झलक देखी. उसका राहुल पर कभी विश्वास नहीं रहा था. राजीव पर भी नहीं था, लेकिन राजीव ने परिस्थितियों पर काबू पा लिया था शायद उनकी हत्या भी इसी कारण से हुयी थी. क्योंकि उनका भावी राजनीतिक जीवन लम्बा था. अवं को राहुल में ऐसी जिजिविषा भी नहीं दिखाई दी.
इंदिरा जी अटल बिहारी बाजपेयी की भी दुर्गा रहीं हैं. प्रियंका में इंदिरा जी की ढेर सारी प्रतिभा थी लेकिन उसने अपने राजनीतिक अवसर गँवा दिए. समय गुज़रते ही अब चाहकर भी अमेठी का चुनाव प्रियंका अपने भाई को आसानी से नहीं जिता पाएंगीं। राहुल गांधी के व्यक्तित्व और डीएनए में देश पर हुकूमत करने का माद्दा ठीक उसी तरह नहीं है जैसे सोनिया गांधी में नहीं रहा है.
पिछले 10 साल तक यूपीए1 और-२ के घटक इसी कमज़ोरी का लाभ उठाते रहे, स्कैम होते रहे, जिससे कांग्रेस जर्जर होकर रह गई. इसमें उन नेताओं का महत्वपूर्ण हाथ कहा जा सकता है जो सत्ता के करीब रहना चाहते थे और यूपीए के घातक थे.
लोगों में आशा है कि कांग्रेस फिर से नया जन्म लेगी। इंदिरा जी के समय में भी ऐसा बुरा समय आया था. मेरा मानना है कि तब राजनीती आज की जैसी नहीं थी, ओछी, गिरी हुई, मूल्यहीन और अभद्र। तब लोगों में राजनीति और मूल्यों की समझ थी. संसद में अंगूठाटेक थे तो विद्वान भी थे. आज की स्थितियां बदली हुई हैं. समय भी अब बदल चुका है. नई और रातोंरात अमीर बनने की चाहत रखने और मूल्यों से खाली नस्ल के नए छत्रप जवान हो चुके हैं, राबर्ट वढेरा जैसे युवक ज़मीन से उठकर अरब-ख़रब पति बन चुके हैं, ब्यूरोक्रेट्स को खरीद सकते हैं, ज़रुरत पड़ने पर उन्हें तबाह भी कर सकते हैं. .नई राजनीती में नए उद्योगपतियों और डेवलपरों का एक ऐसा माफिया सक्रिय हो चुका है जो देश की लोकतान्त्रिक अस्मिता को कालांतर में गहरे ज़ख्म देने वाला है, मीडिया चूंकि इस चुनाव में पूरी तरह से बेनक़ाब हो चुका है. इसलिए देश के बुद्धिजीवियों को अभी से सावधान हो जाना होगा।
वैसे भी संघर्ष अब आसान नहीं रहा है. चुनावों में जीत भी अब आसान नहीं रही है. कांग्रेस भले ही अजायबघर की तरह रहे लेकिन नेहरू परिवार इतिहास के पन्नों में अब गुम होने वाला है. आने वाली नस्लों को इतिहास यह ज़रूर बताएगा कि किस तरह से नेहरू परिवार में सेंध लगाकर एक मैलवोलियो ने नेहरू-मोनार्की के युग को समाप्त करवा दिया और वह खुद हाउस ऑफ़ लार्ड्स का एक ताक़तवर मेंबर बन गया है। उसके साथ ही देश में नए छत्रपों का साम्राज्य छा गया है.
सवाल उठता है कि क्या केंद्र में बीजेपी सरकार बनाने में सफल हो
जाएगी? शायद हो भी जाये। शायद नहीं भी हो ।हर स्थिति में नरेंद्र मोदी के लिए यह परीक्षा की घडी होगी। राज्य सरकार चलाने और केंद्र की गद्दी पर बैठकर देश चलाने में अंतर होता है. कमज़ोर केंद्र विदेशी ताकतों की साज़िशों की प्रयोगशाला बन जाता है. भावी एनडीए सरकार यदि अपनी एनर्जी 'टेम्पिल इंडस्ट्रियल माफिया' के हाथों में पड़ी रही और बीजेपी की कथित निजी सेनाएं मुसलमानों को नेस्तनाबूद करने में ही व्यस्त रहीं तो देश बहुत जल्द गृहयुद्ध का शिकार हो जायेगा। हालाँकि फ़िलहाल मुझे इसकी सम्भावना कमज़ोर जान पड़ती है. लेकिन अमित शाह जैसे व्यक्तियों के षड्यंत्रों की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती है. हालाँकि कांग्रेस और बीजेपी सिक्के के दो पहलू हैं. बीजेपी के डीएनए में भी वे ही सारे तत्त्व मिश्रित हैं जो कांग्रेस में रहे हैं. यदि एनडीए की सरकार बन जाती है तो कुछेक वर्षों में एनडीए सरकार के भी भ्रष्टाचार सामने उजागर होने लगेगे. विशेष परिवर्तन उस सरकार में भी नहीं आने वाला है. यह धरना कि मोदी मुसलमानों को समाप्त कर देंगे, अवचेतन में काई की तरह जमी मानसिक ग्रंथि तो हो सकती है, यथार्थ में संभव नहीं है. शायद कुछ नया होता दिखाई दे. शायद परस्पर संवाद से दो समुदायों के बीच की कडुवाहट दूरहो जाये। शायद हम जिन्हें बहुत गलत समझ रहे हैं, सत्ता पाकर वे वैसे न रहें।
यहां मैं अपने ही शेर की प्रस्तुति को समीचीन मानूंगा--
तख़्त सजा है आ जाने दो, बर्फ का ताज पिन्हाऊँगा।
पिघलेगा जब सिंहासन तो अद्ल की राह दिखाऊंगा।
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| सूरज आजा पास हमारे, ढेर से ज़ख्म दिखाऊंगा। |
सामने बच्चे थे, बच्चों का भविष्य था, कांग्रेस की राजनीतिक विरासत सामने थी. 10 जनपथ कालांतर में सोनिया गांधी का
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| बड़ी कठिन है डगर पनघट की |
करीबी तजुर्बेकार सियासी सलाहकारों ने रस्ते दिखाए, पहले कुर्सी पाने के, फिर कुर्सी नहलाने के. धीरे-धीरे सोनिया की कुर्सी शहद की बन गई. चींटियाँ स्वतः ही बारीक से बारीक सूराख तलाशकर 10 जनपथ तक पहंचने लगीं। ऐसे ही राबर्ट वाड्रा ने अवसर पाकर मुहब्बत की सुरंग से होकर बारीक सूराख तलाशा था. प्रिंयंका रेलबेल की तरह पास के दरख़्त से लिपट गई. रेल-बेल तो अपनी प्रकृति से मजबूर होती है. कभी मेनका गांधी ने भी यही रास्ता अपनाया था और संजय गांधी उनके हो गए थे. शुरू में देखें तो इंदिरा प्रियदर्शिनी ने भी फ़िरोज़ गांधी से इश्क़ किया लेकिन वह इश्क़ शारीरिक कम 'इंटेलेक्ट' अधिक था.
सोनिया गांधी के जीवन में अवसर आया लेकिन वह प्रधान मंत्री नहीं बनीं। उद्देश्य था. बेटे को विरासत सौंपना. मनमोहन सिंह को गद्दी पर बिठा दिया। कुशल राजनीति की विजय का यह पहला पत्ता था.
बेटी ने अपनी माँ और दादी की तरह अपना रास्ता खुद चुन लिया था. यहीं से कांग्रेस के भावी संभावनाओं के सूरज को ग्रहण लगना शुरू हो जाता है. अनुभवी कांग्रेसी जान गए कि प्रियंका अब राबर्ट वाड्रा की ओर से मुक्त नहीं हो पायेगी। कई बार ऐसे अवसर आये भी जब देश ने प्रियंका में अपनी इंदिरा प्रियदर्शिनी की झलक देखी. उसका राहुल पर कभी विश्वास नहीं रहा था. राजीव पर भी नहीं था, लेकिन राजीव ने परिस्थितियों पर काबू पा लिया था शायद उनकी हत्या भी इसी कारण से हुयी थी. क्योंकि उनका भावी राजनीतिक जीवन लम्बा था. अवं को राहुल में ऐसी जिजिविषा भी नहीं दिखाई दी.
इंदिरा जी अटल बिहारी बाजपेयी की भी दुर्गा रहीं हैं. प्रियंका में इंदिरा जी की ढेर सारी प्रतिभा थी लेकिन उसने अपने राजनीतिक अवसर गँवा दिए. समय गुज़रते ही अब चाहकर भी अमेठी का चुनाव प्रियंका अपने भाई को आसानी से नहीं जिता पाएंगीं। राहुल गांधी के व्यक्तित्व और डीएनए में देश पर हुकूमत करने का माद्दा ठीक उसी तरह नहीं है जैसे सोनिया गांधी में नहीं रहा है.
पिछले 10 साल तक यूपीए1 और-२ के घटक इसी कमज़ोरी का लाभ उठाते रहे, स्कैम होते रहे, जिससे कांग्रेस जर्जर होकर रह गई. इसमें उन नेताओं का महत्वपूर्ण हाथ कहा जा सकता है जो सत्ता के करीब रहना चाहते थे और यूपीए के घातक थे.
लोगों में आशा है कि कांग्रेस फिर से नया जन्म लेगी। इंदिरा जी के समय में भी ऐसा बुरा समय आया था. मेरा मानना है कि तब राजनीती आज की जैसी नहीं थी, ओछी, गिरी हुई, मूल्यहीन और अभद्र। तब लोगों में राजनीति और मूल्यों की समझ थी. संसद में अंगूठाटेक थे तो विद्वान भी थे. आज की स्थितियां बदली हुई हैं. समय भी अब बदल चुका है. नई और रातोंरात अमीर बनने की चाहत रखने और मूल्यों से खाली नस्ल के नए छत्रप जवान हो चुके हैं, राबर्ट वढेरा जैसे युवक ज़मीन से उठकर अरब-ख़रब पति बन चुके हैं, ब्यूरोक्रेट्स को खरीद सकते हैं, ज़रुरत पड़ने पर उन्हें तबाह भी कर सकते हैं. .नई राजनीती में नए उद्योगपतियों और डेवलपरों का एक ऐसा माफिया सक्रिय हो चुका है जो देश की लोकतान्त्रिक अस्मिता को कालांतर में गहरे ज़ख्म देने वाला है, मीडिया चूंकि इस चुनाव में पूरी तरह से बेनक़ाब हो चुका है. इसलिए देश के बुद्धिजीवियों को अभी से सावधान हो जाना होगा।
वैसे भी संघर्ष अब आसान नहीं रहा है. चुनावों में जीत भी अब आसान नहीं रही है. कांग्रेस भले ही अजायबघर की तरह रहे लेकिन नेहरू परिवार इतिहास के पन्नों में अब गुम होने वाला है. आने वाली नस्लों को इतिहास यह ज़रूर बताएगा कि किस तरह से नेहरू परिवार में सेंध लगाकर एक मैलवोलियो ने नेहरू-मोनार्की के युग को समाप्त करवा दिया और वह खुद हाउस ऑफ़ लार्ड्स का एक ताक़तवर मेंबर बन गया है। उसके साथ ही देश में नए छत्रपों का साम्राज्य छा गया है.
सवाल उठता है कि क्या केंद्र में बीजेपी सरकार बनाने में सफल हो
जाएगी? शायद हो भी जाये। शायद नहीं भी हो ।हर स्थिति में नरेंद्र मोदी के लिए यह परीक्षा की घडी होगी। राज्य सरकार चलाने और केंद्र की गद्दी पर बैठकर देश चलाने में अंतर होता है. कमज़ोर केंद्र विदेशी ताकतों की साज़िशों की प्रयोगशाला बन जाता है. भावी एनडीए सरकार यदि अपनी एनर्जी 'टेम्पिल इंडस्ट्रियल माफिया' के हाथों में पड़ी रही और बीजेपी की कथित निजी सेनाएं मुसलमानों को नेस्तनाबूद करने में ही व्यस्त रहीं तो देश बहुत जल्द गृहयुद्ध का शिकार हो जायेगा। हालाँकि फ़िलहाल मुझे इसकी सम्भावना कमज़ोर जान पड़ती है. लेकिन अमित शाह जैसे व्यक्तियों के षड्यंत्रों की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती है. हालाँकि कांग्रेस और बीजेपी सिक्के के दो पहलू हैं. बीजेपी के डीएनए में भी वे ही सारे तत्त्व मिश्रित हैं जो कांग्रेस में रहे हैं. यदि एनडीए की सरकार बन जाती है तो कुछेक वर्षों में एनडीए सरकार के भी भ्रष्टाचार सामने उजागर होने लगेगे. विशेष परिवर्तन उस सरकार में भी नहीं आने वाला है. यह धरना कि मोदी मुसलमानों को समाप्त कर देंगे, अवचेतन में काई की तरह जमी मानसिक ग्रंथि तो हो सकती है, यथार्थ में संभव नहीं है. शायद कुछ नया होता दिखाई दे. शायद परस्पर संवाद से दो समुदायों के बीच की कडुवाहट दूरहो जाये। शायद हम जिन्हें बहुत गलत समझ रहे हैं, सत्ता पाकर वे वैसे न रहें।
यहां मैं अपने ही शेर की प्रस्तुति को समीचीन मानूंगा--
तख़्त सजा है आ जाने दो, बर्फ का ताज पिन्हाऊँगा।
पिघलेगा जब सिंहासन तो अद्ल की राह दिखाऊंगा।
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