कांग्रेस को छलनी में बर्फ ज़माने की आदत अब छोड़ देनी चाहिए/-डॉ. रंजन ज़ैदी


मेरी नज़र में स्मृति ईरानी एक  नेक और अच्छी महिला है लेकिन-/डॉ. रंजन ज़ैदी .     
शपथ लेते समय  स्मृति ज़ुबीन ईरानी
स्मृति ईरानी की तरक्की से देश नाखुश नहीं हैं. उसने अपने अस्तित्व के स्थायित्व के संघर्ष का लम्बा रास्ता तय किया है. संघर्षशील लड़कियों को उससे प्रेरणा लेनी चाहिए। अभावग्रस्त परिवेश में आर्थिक विषमताओं और दुश्वारियों के बीच निश्चय ही वह अपनी पढाई पूरी नहीं कर पाई होगी। 
      मेरी नज़र में वह  एक  नेक और अच्छी महिला है. उसका महत्वकांक्षी होना भी गलत नहीं है. हाँ! उसके पास शिक्षा का होना ज़रूरी था. जो इस समय उसके पास नहीं है. शिक्षा के साथ-साथ उसके पास प्रशासकीय अनुभव भी नहीं है. यह और भी दुखद बात है. 
      ऐसे में स्मृति ईरानी को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय दे दिया जाना वैसे ही है जैसे ऑपरेशन थियेटर में लाकर किसी स्कूल-गर्ल से कहा जाये कि  बेटा, कर अपनी माँ के हार्ट का ऑप्रेशन। जेट विमान के कॉकपिट में बिठाकर स्काउट-गाइड लड़की से कहा जाये, ‘उड़ाओ जहाज़! अनाड़ी तैराक को तूफानी समंदर में फ़ेंककर  कहा जाये कि हिन्द महासागर को पारकर अरब सागर के साहिल पर पहुँचो।
                        मोदी के इस फैसले पर देश हतप्रभ है.

    देश का प्रबुद्ध वर्ग अपनी स्टडी और ब्यूरोक्रेट्स अपने घर के आईने के सामने खुद का सामना करने से घबराने लगा है. कितने प्रसिद्ध विद्वानों, योग्य और अनुभवी राजनेताओं और वैज्ञानिकों ने इस मंत्रालय की ज़िम्मेदारियाँ संभाली हैं.  
   स्मृति ईरानी इस जहाज़ को बिना प्रशिक्षण के चला ले जाएंगीं, इसमें मुझे संदेह है. यह ऐसा ही है जैसे लाला की बेटी को अंग्रेजी पत्रिका का संपादक बनने का शौक़ था लेकिन अंग्रेजी पत्रकारिता का उसे कोई अनुभव नहीं था. लाला ने कई पत्रकार नौकर रख लिए, पत्रिका निकलने लगी. अनुभव- शून्य बिटिया जी अंग्रेजी पत्रिका की संपादक बन गयीं। लाला जी गदगद हो गए. 
      स्मृति ईरानी के साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो रहा होगा। कोई उसे समझा वाला नहीं होगा कि वह जोश में कितने भावी बवंडरों की खिड़कियाँ खोलने का काम करने जा रही है. उसकी इस कमज़ोरी का ब्यूरोक्रेट्स और बिचौलिए कितना गलत फायदा उठाएंगे और भ्रष्टाचार कितनी बुलंदियां छुएगा, इसकी उसे कल्पना भी नहीं हैं,. ब्यूक्रेट्स किसी का नहीं होता है लेकिन यह देश की मोदियाना राजनीति है जिसके निदेशन में मानव संसाधन मंत्रालय अब देश की भावी पीढ़ी का भविष्य तय करेगा. यहां यह बात ज़रूर कही जाएगी की मोदी का यह भावुक कदम कालांतर में सरकार, प्रशासन और पार्टी के बीच आतंरिक असंतोष की चिंगारियों को हवा देने का काम ज़रूर करेगा। 
      जब प्रेस कांफ्रेंस में नए कानून मंत्री मोदी के फैसले का समर्थन कर रहे थेतब उनकी भी ज़बान लड़खड़ा रही थी. वह भी जानते हैं कि मात्र अंग्रेजी बोल लेना योग्यता नहीं होती है।  अंग्रेजी तो केरल का रिक्शेवाला भी बोल लेता है. शेफ संजीव कपूर और होटल के बेयरे भी अंग्रेजी बोलते हैं, इसका मतलब यह नहीं होता  है कि वह अंग्रेजी के विद्वान हैं. उल्टा-सीधा इतिहास बताने वाला गाइड भी अंग्रेजी में ही इतिहास की जानकारी देता है.  इसका मतलब यह नहीं कि वह इतिहासकार हो जाता है. अंग्रेजी बोलना विद्वता की निशानी नहीं है. इसमें भी कथित विद्वान मूर्ख होते हैं. 
      जहां तक सुषमा स्वराज्य की बात है, तो उनकी योग्यता का गूगल में ग्राफ देखना चाहिए। देश का अवसरवादी, दिशाहीन और चाटुकार मीडिया यदि उनकी योग्यता का प्रोफाइल देख लेता तो उनकी तुलना स्मृति ईरानी से कभी नहीं करता। उसे जानना चाहिए कि सुषमा स्वराज्य क कद्दावर नेता है और ज़बरदस्त अध्येयता भी. यही नहीं, वह जानी-मानी अधिवक्ता भी रही हैं/हैं।  38 वर्षीय स्मृति ईरानी के खाते में फूहड़ सीरियलों के सिवा और क्या है? सास भी कभी बहू थी ने समाज के एक बड़े वर्ग को असभ्य, असंस्कृत और मूल्ययहीन व व्यवसायीकरण का दरवाज़ा दिखाया। इसमें स्मृति को दोषी नहीं माना जा सकता। सुषमा स्वराज्य की स्मृति ईरानी से तुलना नहीं की जानी चाहिए क्योंकि वह लोकसभा की विजयी  सदस्य है जबकि स्मृति ईरानी दोदो बार चुनाव हार चुकी हैं. लोकतान्त्रिक देश के कानून के तहत हांरे हुए प्रत्याशियों को मंत्रालय नहीं दिए जाने चाहिए। इसके बावजूद अरुण जेटली और स्मृति ईरानी को मंत्रालय दिए गए. ये इतिहास का दुर्भाग्यपूर्ण अनुच्छेद माना जा सकता है.  
नरेंद्र मोदी को अनुशासन के दायरे में इसपर गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए।
     
हालफिलहाल में यदि स्मृति ईरानी को (स्वतंत्र प्रभार मंत्रालय) के रूप में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय दे दिया जाता तो उस क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और घोटालों  पर लगाम लगाया जा सकता था. इससे स्मृति ईरानी को न केवल काम करने का अनुभव होता बल्कि स्वैच्छिक क्षेत्र में विकास के नाम पर जो लूट मचती रही है, उनपर से नक़ाबें भी उठतीं और नए खुलासे भी सामने आते. यहां स्मृति ईरानी बहुत काम कर सकती थी. वह स्मृति ईरानी की रुचि का महक़मा होता और बड़ी ज़िम्मेदारी संभालने से पहले का अनुभव भी होता।
      बीजेपी के पास कद्दावर नेताओं की  कमी नहीं हैं. मोदी को चाहिए था कि वह अभी देश को विवादों से दूर रखें. वह अब भारत के प्रधानमंत्री हैं. जिसे चाहें नवाज़ सकते हैं, तख़्त का तख्ता कर सकते हैं, गंगा को पवित्र और अयोध्या को काबे में तब्दील कर सकते हैं लेकिन भारत की आत्मा को नहीं कुचल सकते।  
      रहा सवाल कांग्रेस को इस विषय पर आलोचना करने का, तो उसे छलनी में बर्फ ज़माने की आदत अब छोड़ देनी चाहिए।                                    ('न्यूज़ फीचर एंड प्रेस मीडिया अलायंस' द्वारा जारी।  
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