व्यंग्य-(Short Story) : बकरा.कॉम/ --रंजन ज़ैदी

कुर्बान अली को मां ने पाला था.
व्यंग्य: बकरा.कॉम  --रंजन ज़ैदी
 --रंजन ज़ैदी     

(बक़रीद के अवसर पर विशेष)  
र्म भी कभी-कभी कैसे संकटों में घसीट लेता है.
     बकरे को मां ने पाला था, कुरबानी की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गई थी। बकरे को मां 'ललतू'  कहकर पुकारती थीं, मैं इसे ग़लत मानता था. व्यक्तिगत रूप से किसी भी व्यक्ति का उपहास उड़ाना मुझे पसंद नहीं था। शायद इसीलिए.
      पापा साब की सोच भी मेरी ही जैसी थी. सोच के मामले में वह कमाल के आदमी थे। पेशे से साधारण दर्जे के पेंटर थे लेकिन उनकी पेंटिंग्स और रंगों से मां बहुत परेशान रहा करती थीं। जब भी 'कुरबानजी,' पापा साब के स्टूडियो से बाहर निकलते, सारा घर हंसते-हंसते लोटपोट हो जाता था। कुरबानजी भी सर्कस के किसी जोकर से कम नहीं लगते थे। पता नहीं रंगों की महक का नशा वह कैसे एंज्वॉय करते थे कि इधर पापासाब ने स्टूडियो में कदम रखा, उधर पीछे से कुरबानजी दन से दरवाज़े को धकियाकर अन्दर जा पहुंचते।
       एक दिन तो पापासाब ने मां को चिढ़ाने के उद्देश्य से कुरबानजी के आधे बदन को ही रंगों का इंद्रधनुष बनाकर धमाल कर डाला। इंद्रधनुष ऐसा बना कि पड़ोसी बत्रा जी देखते ही कैमरा लाकर घर में ही आ धमके और बिना समय गंवाये बकरा-शूट में व्यस्त हो गए. माँ ने हांक लगाई कि बस, नौटंकी ओवर! बत्रा भाई साब, आप भी आइये, लांच का टाइम हो चुका है.  
      फोटो सेशन के बाद उन्होंने कुछ फोटो एक निजी टीवी चैनल को मेल कर दिये। रात सबने टीवी पर देखा तो एक और धमाल हो गया. स्क्रीन पर तो पापा साब भी बाइट देने में 'तकल्लुफ़ नहीं कर रहे थे। अजाने में पापा साब के ब्रश से बकरा-पेंटिंग में इंद्रधनुष के रूप में कोई मैसेज उभर आया था.यह तो अब देखने से पता चल रहा था. साब जक्क-बक्का थे.  
      पेंटिग में सचमुच कोई कोलाज़ उभर आया था. कोलाज़ में ही उड़ते हुए प्यासे कव्वे को चोंच में कंकड़ दबाये
 कुरबान अली को हनीफ़ कुरैशी से नफरत थी 
नीचे उतरते हुए दिखाया गया था। नीचे ही पेड़ के साये में कुछ धावक-खरगोश दौड़ से थककर नींद लेने में डूबे नज़र आते थे। पास की झाड़ी में भी कहीं कुछ बारीक सी हलचल सी हो रही होती है। वहीं से फ़ायर भी होता है। कंकड़ दबाये नीचे उतरते प्यासे कव्वे को ऐसी गोली लगती है कि तड़ से वह नीचे एक खरगोश पर आ गिरता है। खरगोश उठकर भाग खड़े होते हैं। इसी हड़बड़ाहट में वे भागते हुए एक-दूसरे से पूछते महसूस होते हैं, कि क्या किसी ने उनके मोबाईल, घड़ी और पर्स तो नहीं देखे हैं?’ जब खरगोश पीछे मुड़कर पीसीआर को देखते हैं तो उनकी स्पीड और बढ़ जाती है।

      पापासाब के इस व्यंग्य पर मां हंसते-हंसते लोट-पोट हो गई थीं। मां पहले कभी इतना नहीं हंसी थीं। सबको तब आश्चर्य अवश्य हुआ था। यह तो बहुत बाद में यानि कई दिनों बाद पता चला कि मां इतनी खुश क्यों नज़र आई थीं। अजाने में ही सही, कई जगहों से पेंटिग ने अच्छी-खासी कमाई कर करली थी। कुरबानजी का मुंह चूमकर मां कहतीं,’देखा! कितना खुशकिस्मत है हमारा लालू। अपना बदन दिखादे तो पैसा बरसने लग जाता है।
      पापासाब मुस्कुराकर रह जाते। उनकी भृकुटियां तो तब तनीं जब मां ने खुश होकर यह जानकारी दी कि पड़ोस की शाहिदा बी अपनी बरबरी बकरी को बेचने के लिए राज़ी हो गई हैं। अब मुआ बकरा अकेला नहीं रहेगा। बरबरी आयेगी तो अपना भालू भी छाती फुलाकर आंगन-आंगन उसपर रोआब जमा सकेगा जैसे पापासाब हमपर जमाते हैं। पापासाब किस्सा सुनाते, एक बार राजा साब के साथ शिकार पर गये तो झाड़ी में शेर का बच्चा हाथ लग गया। बहुत भूखा था। घर लाये तो अम्मा ने बच्चे की तरह उसे पाल लिया। हमारे बीच वह ऐसे पला-बढ़ा कि मानो घर का ही कोई सदस्य हो। उसकी दहशत का हाल यह था कि जाने कितनी औरतें जो चीनी, राब और गुड़ और लकड़ी मांगने आ जाती थीं, उसे देखते ही भाग खड़ी होती थीं। वह था भी बड़ा रोआबदार। जिसे नज़र भरकर देख ले, छुल्ल से उसका पेशाब हो जाये.
      फिर, मेरी शादी हुई तो शेरू ने छुपकर मेरी बीवी को देखा लेकिन उसके पास नहीं गया। एक दिन क्या देखता हूं कि शेरू भाग रहा है और मेरी बीवी उसका पीछा कर रही है। पीछा करते हुए वह बड़ी अल्मारी के ऊपर चढ़ जाता है। अब शेरू ऊपर और फूलती सांसों के बीच डंडा लिये हुए बीवी नीचे,’आ मुए, गधे के बच्चे! मैं देखती हूं तुझे।’ शेरू ऊपर बैठकर गुर्राने लगता है। इसी पल मैं पहुंचकर बीवी को समझाता हूं कि यह मेरी तरह शेर की खाल पहने गधा नहीं, असली शेर है। बीवियों का तो अपना अलग मंतव्य होता है, कहां मानतीं। शेरू को ही अंततः मानना पड़ा। उस रात पता नहीं कब वह चुपचाप घर से ऐसा निकला कि फिर कभी नहीं लौटा लेकिन 'मेैं' आज तक घर में हूं।’        
      पापासाब मां के आगे कभी ऊंची आवाज़ में बात नहीं करते थे। बरबरी बकरी की बात निकली तो मां की ही चली। पापासाब कहते कि कुरबान अली जमुनापारी है, बरबरी नाटे कद की होती है। दोनों का जोड़ सही नहीं है। मां कहतीं, अमिताभ-जया को देखो, बच्चे भी आसमान छूते हैं। दलील देतीं, औरत और बकरी का कोई खूंटा नहीं होता है। जहां बंध जाती हैं, वहीं परिवार बना लेती हैं। बरबरी तो कद में नाटी भी नहीं थी लेकिन जवानी का उठान ऐसा था कि कम्बख्त जब भी वह मेरे यहां अपनी मालकिन के साथ आती थी, मां उसे देखकर लोटपोट हो जाया करती थीं। बरबरी भी ऐसे इतराती थी कि जानवर तो जानवर, घर का नौकर ग़फूरे तक उसे देखकर आहें भरने लग जाया करता था।
      उधर जमुनापारी कुरबानजी का हाल यह था कि नाटे कद की बरबरी को देखते ही भरे घर में उसके साथ बलात्कार करने पर उतारू हो जाते। कम्बख्त, अगर वह ऐसा कर भी लेता तो कोई पुलिस-कम्प्लेंट तक नहीं हो सकती थीे और न ही कुछ और हो सकता था क्योंकि हमारे संविधान में ऐसी कोई धारा है ही नहीं जिससे कुरबानजी या बरबरी को खाप-पंचायतें सज़ा दे सकें। 
      पापासाब भी उसको कुरबानजी ही कहकर सम्बोधित करते थे। कुरबानी के बकरे का नाम वह शायद ऐसा ही रखना पसंद करते होंगे क्योंकि बकरे को अंततः एक दिन कुरबान तो होना ही होता है। वैसे भी मुहावरा आम है कि बकरे की मां कब तक खैर मनायेगी? मेरा खयाल है कि बकरीद में मांओं को कुरबान नहीं किया जाता है। धर्म हो या देश, उनपर कुरबान हो जाने वाला युवा-वर्ग ही काफ़ी होता है।  
     कुरबान को लेकर मां के पास मानो चर्चा करते रहने के इतने बहाने रहते थे कि कभी भी कोई बहाना उनकी याददाश्त से बाहर निकल सकता था। जैसे, बच्चे स्कूल जाने के लिए तैयार होते हैं तो मुआ कुरबान आगे-आगे चल पड़ता है मानो उसे भी स्कूल जाना है। कुंजड़े की आवाज़ सुनते ही मैं बाद में बाहर निकलती हूं, वह मुआ पहले बाहर पहुंचकर सब्ज़ियों को देखने लग जाता है कि उसे भी खीरा-गोभी दो। खीरा कितना मंहगा है? दूसरी सब्ज़ी ही कौन सी सस्ती है? मुई मंहगाई आसमान छू रही है। क्या खुद खाएं और क्या लालू को खिलाएं।
      मुआ कुर्बान समझता भी कैसे? खुद कमाता तो पता चलता कि नोन, तेल, लकड़ी किस भाव में आती है। उसकी पगुराहट तो रुकती नहीं थी। घर में जो भी आता, मुंह भर देता। कोई नहीं देता तो वह खुद छीन लेता। उसकी इसी बेबाकी पर दादी मां अकसर उसपर कमेंट कर देतीं कि मुआ चिकना घड़ा है, बेगैरत। ऐसे लोग वैसे भी खाते-पीते काफी तंदुरुस्त हो जाते हैं।      
     एक दिन पापासाब मां को छेड़ने के ही ग़रज़ से कह उठे, कुरबान अली को हनीफ़ कुरैशी खरीदने को तैयार है, सोचता हूं-बेच दूं। मां, कमर पर हाथ रखकर पहाड़ की तरह सामने आ गईं,‘बेचने के लिए इसे बचपन से नहीं पाला है। यह कुरबानी के लिए है।’ पापासाब कहते,‘तभी तुम इसका खयाल रखती हो।’ मैें पापा साब से पूछ बैठता हूं,‘ पति और बकरे में क्या अंतर होता है पापा जी?’ पापासाब तुरंत उत्तर देते हैं,‘वही जो मुझमें और कुरबान अली में तुम देखते हो।’  यानी कुरबान मां के पास एक परमानेंट-सब्जेक्ट के रूप में रहने लगा था और वह उसे लेकर कभी भी चर्चा करने में पीछे नहीं हटती थीं।
      अपनी पड़ोसिनों को बताया करती थीं कि बहुत खाता है मुआ, चबर-चबर करता ही रहता है। कितना छोटा था जब आया था, अब देखो, मुआ जमीलुद्दीन अंसारी मनिस्टर की तरह चारा खाखा कर कैसा मोटा हो गया है। पड़ोसिनें कहतीं, कुरबानी का गोश्त हमें देना मत भूल जाना भाभी। पड़ोसियों का हिस्सा निकालना अल्ला-रसूल की नजर में सवाब होता है। हनीफ़ कसाई का आदमी हर बकरीद से हफ़ता भर पहले नया बोरा दे जाता था कि कुरबानी की खाल उसी में रखवा दें ताकि उसे बेचकर पैसा यतीमखाने भेजा जा सके, लेकिन हर बार वह बोरा वापस ले जाना भूल जाता था। मां उसे अपने काम में ले लिया करती थीं।    
      जब भी बकरीद आने को होती अम्मा, कल्पना में कुरबानगाह पर अपने कुर्बान को मिमियाते हुए देखने लग जातीं। हिसाब लगातीं, हिस्सेदारों को कितना-कितना गोश्त दिया जाना है। जमीला भाभी के यहां से पिछली बार 5 बोटियां आई थीं, मैं भी इससे ज़्यादा नहीं दूंगी। रान तो छोटी का बेटा असलम ही ले जायेगा। कानों में भांजी की आवाज़ गूंजी,‘खाला, गुरदे कलेजी और भेजा, मैं लूंगी। हैदर मामूं के यहां मत भेज दीजियेगा।’ कापी के पन्ने पलटकर मां देखतीं, कब, किस मिलनसार नेे, कुरबानी का कितना गोश्त भेजा था। रिश्तों की गहराई का वह उसी से अनुमान लगाती रहती थीं,‘अल्ला तौबा! हमीदा खाला ने इसबार पूरी रान ही भेज दी। पहले तो कभी नहीं भेजी।’ घर आई विधवा बहन ने जले पर और नमक छिड़क दिया,‘बा जी, सईद उनकी आंखों में काजल जो बन रहे हैं। बेटी नहीं ब्याहनी है क्या?’ मां को अब हमीदा खाला की सियासत समझ में आई। सईदा का फ़ोन आया,‘यार, तुम मुझसे शादी करना चाहते हो, क्यों?’ मैं पूछता,‘आपने कबसे ऐसा ख्वाब देखना शुरू कर दिया मधुबाला जी?’ जवाब आता,‘मैं नहीं, अम्मी देखने लगी हैं।’ मैं सईदा से सवाल करता कि हमारी अम्माएं शादी के लिए इतनी इमोशनल क्यों होती रहती हैें, मैं आज तक इस मिस्ट्री  को नहीं समझ पाया। सईदा हंसकर जवाब देती,‘मिस्ट्री का खुलासा हो तो मुझे भी बताना।’
      माँ  शायद उस समय भी इसी विषय पर सोच रही होंगी। कारण यह था कि दीवार के उसपार मोखले से काज़ी शमशाद की बीवी तैयबा बाजी ने जानकारी दी थी कि हमीदा खाला  के मियां हसनैन भाई किसी की मार्फ़त रिश्ते की बात चलाने की जुगाड़ में लगे हैं और इस कोशिश में हेैं कि मेरे पापा साब हमीदा खाला के यहां रिश्ता ले आएं। मां के लिए यह खबर किसी बड़े नशे से कम नहीं थी। उस नशे से उन्हें होश तब आया जब कुरबान ने मां के दुपट्टे को चबाते-चबाते उन्हें पटकनी नहीं देदी। मां फ़र्श पर धाड़ से ऐसी गिरीं कि फिर कभी उठ नहीं सकीं। दुनियाभर का इलाज हुआ। कूल्हे की टूटी हड्डियां फिर कभीं जुड़ नहीं पाईं। इसी रोग में एक दिन वह अल्ला को प्यारी भी हो गईं लेकिन कुरबान अब भी दुनिया से बेखबर खूब खाता है और घर-भर में मेंगनियां बिखेरता रहता है।    
      जब वह आया था तो मां उसे निपिल से दूध पिलाया करती थीं। उसकी नन्हीं-नन्हीं मेंगनियां खुद समेटकर गमलों में डाल दिया करती थीं ताकि पौधों को खाद मिल सके। उसे इंसान बनाने की कोशिश करतीं लेकिन वह शौहर की तरह बकरा ही बना रहता। ऐसा लगता मानों वह जानता हो कि कुरबानी के बकरे को एक न एक दिन कुरबान होना ही होगा, तो फिर कुछ करने का कष्ट क्यों उठाया जाये?
      शायद उसकी बेताबी का अंदाज़ा लगाकर ही मां ने उसे हासिल करने कर आयडिया सोचा होगा। पेंटिंग से पैसा क्या आया कि मां ने अपने कुर्बान अली  के लिए बरबरी को ही खरीद लिया। अब ज़िद यह कि उसकी सफेद खाल पर भी पापासाब कोई पेंटिंग बनाएं ताकि और अच्छे पैसे मिलें। पापासाब ने इस खयाल से तो पेंटिंग बनाई भी नहीं थी कि उसका ऐसा व्यवसायिक इस्तेमाल भी होगा, लेकिन मां तो अखबार की पुरानी रद्दी थीं नहीं, वज़नदार बेकार लोहे को भी कांटे पर डाल देती थीं।
      मां ने अपने प्रैक्टिकल होने का सबूत दिया था। पापासाब को आकर समझातीं,’अपनी मार्केटिंग करना सीखिये। पहले जैसा ज़माना नहीं है कि रईस को पेंटिंग बेच दी ताकि वह उनपर अपनी पट्टी लगाकर नंदलाल बसु बन जाये। अब अपने आर्ट को बाज़ार में लाइये, एक्ज़िबिट कीजिये, लाने के लिए कमीशन देना और खुद को प्रमोट करना होगा। आप बरबरी पर ब्रश चलाइये, यह नया प्रयोग होगा। इसकी मैें मार्केटिंग करूंगी। मार्केटिंग से घर में पैसा आयेगा। पैसों से आप अपनी कला का प्रमोशन कर सकेंगे, अपना पीआर बढ़ा सकेगे, संस्थानों से एवार्ड ले सकेंगे और......।’
      पापासाब ने मां को बाहर कर अपने स्टूडियो के दरवाजे़ बंद कर दिये। दो दिनों तक पापासाब घर में दिखाई नहीं दिये। अगले दिन दिखे तो बरबरी उनके कमरे में दिखाई दी। अगर कुरबानजी के आवाज़ देने पर वह मिमियाती नहीं तो शायद किसी को पता भी नहीं चलता। मां ने उसकी आवाज़ सुनली थी। नौकर से उसके लिए ताज़ा चारा मंगवा लिया था। तब उन लम्हों में न जाने कितने सपने उनकी आंखों में तैर गये थे। मार्केटिंग शबाब पर पहुंच गई थी। हाल में प्रेस के लोगों को बुलवा लिया गया था। आज मां उन्हें कोई गिफ्ट भी देने जा रही थीं। सब उत्सुकता से इंतज़ार में थे कि चौखट लांघकर बरबरी हाल में दाखिल हुई।
      इस बार सबने देखा और कैमरों ने शूट किया कि उसके बदन पर अलाउद्दीन का चिराग़ है। चिराग को मां रगड़ती नज़र आती हैं। पेंटिंग में धमाका होता है, मां सहित आसपास के लोग उड़ जाते हैं। बहुत से ज़ख्मी भी हो जाते हैं। पुलिस मां को आतंकवादी बताकर पेंटर के घर को घेर लेती है।
अब बरबरी उसके दो बच्चों की माँ बन चुकी है. 

      पेंटिग को देखकर मां मूर्च्छित हो जाती हैं। उठतीं हैं तो कांपने लगती हैं। अलाउद्दीन के चिराग की धमक अभी तक उनके कानों में गूंज रही होती है। कुरबानजी हाल में आकर मां के कान को सूंघता है। अपने चौड़े और निकले हुए होठों से उन्हें पत्तों की तरह मुंह में लेना चाहता है लेकिन बरबरी जैसे ही उसे सींग मारती है. वह उछलकर छिटक जाता है। मां का लाडला सचमुच जवान हो गया था। मुझे याद आया, जब कुरबान छोटा था, उन्हीं दिनों एक बार पापासाब ने कुरबान को मेरी गोद में देते हुए कहा था ‘तुम्हारे सीखने की उम्र है, जानवरों से सीखोगे तो कभी अच्छे  इंसान ज़रूर बन जाओगे।’

      उन्होंने कभी कुरबान से मुहब्बत नहीं की, नफ़़रत भी नहीं की। तब यह बात मेरी समझ में नहीं आई थी, आज जब वह नहीें हैं और मां भी नहीं हैं तो, मैं उनके उन शब्दों का अर्थ समझने की कोशिश कर रहा हूं क्योंकि अब मेरी माँ का लाडला क़ुर्बान अली सचमुच जवान हो चुका है और बरबरी उसके दो बच्चों की माँ बन चुकी है. (सर्वाधिकार सुरक्षित)
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