कुँवरपाल सिंह के 'राही' को पुरस्कारों की ज़रुरत नहीं थी/ रंजन ज़ैदी

राही को पुरस्कारों  की ज़रुरत नहीं थी/  रंजन ज़ैदी

 डा. राही मासूम रज़ा 

      स्वर्गीय  डॉ. केपी.सिंह (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) मुझे एमए  में  प्रेमचंद  पढ़ाते थे. प्रेमचंद का  एक पेपर डॉ. ज़ैदी  जाफ़र  रज़ा  (यानि 'प्रेमचन्द्र की औपन्यासिक महायात्रा' के लेखक शैलेश ज़ैदी) पढ़ाते थे.
              एएमयू के हिंदी विभाग में मैंने डॉ. केपी सिंह  और शैलेश ज़ैदी दोनों को कभी अम्न के साथ जीते हुए नहीं देखा। इसके पीछे के कारणों में मैं झांकना नहीं चाहता क्योंकि अब दोनों ही इस असार संसार से दूर जा चुके हैं. दोनों की तुलना करना भी वाजिब नहीं है. मुंशी प्रेमचंद को दोनों ने ही अपने-अपने नज़रिये से
डॉ. केपी. सिंह
जांचा-परखा था. स्कॉलर के रूप में मझे  शैलेश ज़ैदी  पसंद थे, लेकिन  एक  व्यवहारिक  व्यक्ति  के रूप में केपी मुझे बहुत अपील करते थे.  
             डा. राही मासूम रज़ा के भाई  डा. मूनिस रजा  के परिवार का मेरे मामू यानि इतिहासकार  प्रोफेसर मुहिब्बुल हसन  के घर अमीरनिशां स्थित हैदर विला में आना-जाना था. केपी, राही मासूम  रज़ा  एकसाथ एक कमरे में रहे थे,  प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हुए थे, जनवादी थे और राही के उपन्यासों के पात्र  भी बनते जा रहे थे. शोध के दौरान राही मासूम रज़ा ने स्वयं मुझे बताया था कि उपन्यास टोपी शुक्ला का पात्र टोपी  कोई और नहीं, खुद केपी सिंह ही हैं. कमाल की बात यह है कि क्लासिक कहे जाने वाले उपन्यास 'आधा गांव' (उर्दू उपन्यास 'मुहब्बत के सिवा' निखत प्रकाशन इलाहबाद, लेखक : राही मासूम रज़ा) का जब पुनर्लेखन अलीगढ़ में शुरू हुआ तो हिंदी में उसे केपी सिंह ने ही लिखा और उनकी निगरानी में ही उसका प्रकाशन राजकमल प्रकाशन के यहां से करवाया। इसे पुरस्कृत करने की कोशिश भी की गई लेकिन कुछ राजनीतिक कारणों  के दबाव के रहते इसे रास्ते से हटा दया गया.
            राही का एक और उपन्यास कटरा बी आरज़ू (उर्दू उपन्यास आरज़ूओं की बस्ती, लेखक: (छद्म नाम) आफाक हैदर ) आपात कालीन पृष्ठभूमि पर लिखा गया एक सशक्त उपन्यास था लेकिन उसे कांग्रेस के दबाव पर पुरस्कृत नहीं किया गया.
              भारतीय राजनीति समय-समय पर यदि पक्षपात   करे तो हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान अविस्मरणीय हो जाये।

zaidi.ranjan20@politics1.blogger.com

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