'लव' का मतलब 'मुहब्बत', 'जिहाद' का मतलब 'धार्मिक-युद्ध', तब?/ ----रंजन ज़ैदी
'लव' का मतलब 'मुहब्बत', 'जिहाद' का मतलब 'धार्मिक-युद्ध', तब?
----रंजन ज़ैदी
'चुनावी-जीत' हासिल करने का ‘जुनून’ आरएसएस की तमाम कथित सेनाओं और बीजेपी को किसी भी हद तक और किसी के भी खेमे तक कहीं भी ले जा सकता है. 'लव-जिहाद' का कथित आंदोलन इसका सबूत है. यह बात और है कि बीजेपी ने इस प्रकार के आंदोलन से अपना पल्ला झाड़ लिया है।
'लव' का मतलब 'मुहब्बत' है. 'जिहाद' का मतलब 'धार्मिक-युद्ध', यानि इस्लाम धर्म या पंथ की रक्षा के लिए लड़ा जाने वाला धार्मिक-युद्ध। स्पष्ट है कि अरबी से निकला 'जिहाद' का शब्द निश्चय ही इस्लाम और मुसलमानों से सम्बंध रखता है, जबकि 'लव' ईसाई व उनकी भाषा 'अंग्रेजी' से. ईसाई और इस्लाम (दोनों ही) देश के अल्पसंख्यक समुदाय है. बड़ी बात यह है कि देश में चरमपंथी हिन्दू नहीं चाहते कि इस देश में अल्पसंख्यक उन्मुक्त होकर संविधान में दिए गए अधिकारों के आधार पर जियें। अपने भाषाई ज्ञान और ऐतिहासिक अज्ञानता के कारण वे नहीं जानते कि इन शब्दों का सही अर्थ क्या है. वह इस शब्द की जगह 'लव-जहद' कहते तो बात को एक पैमाना मिल जाता यानि 'लव-इंडस्ट्री,' जिसे हम देश की पुरातन संस्कृति से जोड़ सकते थे.
' 'वास्तविकता यह है कि ‘लव-जिहाद' आंदोलन के माध्यम से मुस्लिम और ईसाई समुदाय के नौजवानों को आगाह किया जा रहा है कि 'मुस्लिम युवक हिन्दू लड़कियों से' और 'हिन्दू लड़कियां मुस्लिम युवकों से' विवाह न करें।
निश्चय ही यह अत्यंत संवेदनशील और बेहद पेचीदा मामला है. सवाल उठता है कि आंदोलनकारी अपने उन कट्टर नेताओं के घरों में कैसे सेंध लगाएंगे जहां बीवियां हिन्दू हैं, और वे इस आंदोलन व आंदोलनकारियों से बेहद नाराज़ और गुस्से में हैं जो देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को बरबाद करना चाहते हैं.
चूंकि इस आंदोलन के पीछे मेन-मुद्दा वोटों के ध्रुवीकरण का है तो अजाने में कोई मुद्दा न होने के कारण 'लव-जिहाद' का मुद्दा कथित आंदोलन के रूप में
छेड़ दिया गया है ताकि 'स्पांसर्ड-मीडिया' इसे धीरे-धीरे छेड़ता और गरमाता रहे. वोटों के ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला चूंकि गुजरात के बाद उत्तरप्रदेश में भी अपना सफल परीक्षण कर चुकी है और विधान सभा के चुनाव सिर पर है, इसलिए अब इस फार्मूले को आज़माया जा रहा है. यदि फार्मूला काम कर गया तो भावी राजनीति नए मानचित्र पर काम शुरू कर देगी, नहीं तो मुद्दे नारे लगाने के लिए दंगों की भूमिका बनाती रहेगी।
दुखद स्थिति यह है कि देश की संसद में प्रतिपक्ष आज वेंटिलेटर पर है. कांग्रेस के पास एक भी ताक़तवर और जुझारू नेता नहीं है जो देश को एकजुट कर सके. बीजेपी कुछ सालों तक इसी कमज़ोरी का लाभ उठाती रहेगी। यह बात और है कि इस बीच लोकतंत्र का सफर अधिनायकवाद की ओर भी अग्रसर हो सकता है। ऐसे में सपनों की मंडी में अनिश्चितता का भी माहौल बनता-बिगड़ता रह सकता है.
इसलिए सपनों के सौदागरों पर निगाह बनाये रखते हुए हमें बहुत चौकस रहना होगा ताकि हमारे देश का लोकतंत्र मज़बूत बना रह सके..
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