उर्दू उपन्यास के सौ साल/रंजन जैदी

उर्दू उपन्यास के सौ साल/रंजन जैदी

      यह अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम बना जिसने सर सय्यद के तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आन्दोलन को एक भाषा और बोलने की शक्ति प्रदान की. इस आन्दोलन की शृंखला में रतन नाथ सरशार, ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले उपन्यासकार अब्दुल हलीम शरर, और मुंशी प्रेमचंद अग्रिणी लेखकों  में गिने जाने लगे
    १९४८ में फिक्र तौन्सवीं का छठा  दरिया भारत-पाक विभाजन के दौरान लिखी गयी उनकी एक ऐसी थी जिसमें रोज़ की सम्प्रदियिक हिंसा, गमन और हिन्दू-मुस्लिम दंगों का रोजनामचा दर्ज किया गया था. इसे मैंने पहली बार हिंदी में अनूदित कर हिंदी मासिक पत्रिका  गंगा (संपादक:कमलेश्वर) में दिया जिसे धारावाहिक रूप में प्रकाशित किया गया.
चांदनी बेगम
डायरी
    अब्दुल्ला हुसैन का उपन्यास उदास नस्लें हालाँकि १९६२  में प्रकाश में आया था लेकिन उसमें अंग्रेजी साम्राज्य के षड्यंत्रों, अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश, भारतीय आज़ादी के आन्दोलन की पृष्ठभूमि  और अनेक ऐसे आयामों का चित्रण प्रस्तुत किया गया है कि वह एक क्लासिक की हैसियत हासिल करने में कामियाब होता नज़र आता है
    १९६९ में हयातुल्लाह अंसारी का एक वृहद उपन्यास लहू के फूल का प्रकाशन हुआ जो आज़ादी से पूर्व के हिन्दुतान में रह रहे दलितों की समस्याओं पर आधारित था
   कुर्रतुल-एन हैदर का उपन्यास आग का दरिया एक कालजई उपन्यास सिद्ध हुआ. लेकिन इसके बावजूद कि वर्तमान उर्दू उपन्यास रचनात्मक दृष्टि, कंटेंट और अपनी यथार्थपरक विशेषताओं के रहते परिपक्व होते हुए भी इतना निजी और रियलिस्टिक होता जा रहा है कि हम पढ़ते-पढ़ते सीधे पात्र के साथ उसके बेडरूम तक जा पहुँचते हैं. यह अंग्रेजी संस्कृति तो हो सकती है, भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश की  संस्कृति नहीं हो सकती जो आज भी अपनी संस्कृति, इतिहास, परम्पराओं और मानवीय सरोकारों के साथ मानवीय संभावनाओं के बीच जीने में आनंद की अनुभूति  महसूस करते हैं
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