सलाम है विशाल भरद्वाज को /रंजन ज़ैदी

सलाम है विशाल भरद्वाज को /रंजन ज़ैदी

बा श्रीनगर स्थित होटल सेतूर की है. वहां के सभी जगह टीवी स्क्रीन पर श्रेया घोषाल का गाया गीत बज रहा था जिसे मैंने लिखा था,'अब हमको आगे बढ़ना है, अपना इतिहास बदलना है.' लाबी में एक प्रकाश्य बुकलेट पर बहस चल रही थी  कि मैंने उस नेता को हाइलाइट क्यों नहीं किया जो सोनिया गांधी की होने वाली रैली में हज़ारों की भीड़ जुटाने वाला है. खुद नेता जी भी मुझे धमका रहे थे लेकिन मैं उन्हें कन्विंस कर रहा था कि मेरा काम सोनिया जी के होने वाले भाषण को हाइलाइट करना है कि उस नेता को.

          बात बढ़ी तो मैं वहां से उठकर रेडिओ श्रीनगर के उस अधिकारी के पास चला गया जो होने वाले कार्यक्रम के सम्बन्ध में तफ्सील से जानकारी जुटाना चाहता था. वहीँ मुझे लोगों की ज़बानी  'दरद पुरा' गाँव की तस्वीर सामने आई जहाँ (बताया गाया कि) सिर्फ गुर्जर मुस्लिम विधवाएं रहती हैं, और वे अपने बच्चों के साथ ज़िंदगी जीने की लड़ाई लड़ रही हैं. कृष्ण गंगा नदी के उस पार पाकिस्तान तो इस पर भारत. अपने साथियों से मिलकर मैंने कार्यक्रम के बाद  'दरद पुरा' गाँव जाने का फैसला किया. गुलाम नबी आज़ाद तब जम्मू ऐंड कश्मीर के मुख्य मंत्री थे. यह बात है २००७ की.

          शायद मैं दर्द पुरा गांव का ज़िक्र करता, यदि 'हैदर' फिल्म देखी होती. हैदर जैसे  युवक कश्मीर  में बिखरे हुए हैं. उस गांव तक पहुँचने के रास्तों में मैंने वह असली कश्मीर देखा जिसे शायद एक अफसर होकर मैं कभी नहीं देख सकता था.

          सलाम है विशाल भरद्वाज को जिसने 'हैदर' बनाई. इसी विषय पर 'यह दाग़-दाग़ उजाला' (१३ कड़ियाँ) रेडिओ धारावाहिक, आकाशवाणी दिल्ली, उर्दू) लिखा था. सलाम है उस हौसले को जिसने सच्चाई का दामन नहीं छोड़ा. सलाम है उन बेहतर फिल्म देखने वाले दर्शकों को जिन्होंने साफ़ बता दिया कि दर्शक अच्छी फिल्मों का हमेशा स्वागत करते रहेंगे. काश कि कश्मीर दहकते हुए ज्वालामुखी से बाहर निकल आये. काश कि वहां के युवकों को फरन से हाथ निकालकर सैलानियों से भीख मांगने की ज़रुरत पड़े. 

          शायद मैं दर्द पुरा गांव का ज़िक्र करता, यदि 'हैदर' फिल्म देखी होती. हैदर जैसे  युवक कश्मीर  में बिखरे हुए हैं. उस गांव तक पहुँचने के रास्तों में मैंने वह असली कश्मीर देखा जिसे शायद एक अफसर होकर मैं कभी नहीं देख सकता था. सलाम है विशाल भरद्वाज को जिसने 'हैदर' बनाई. इसी विषय पर 'यह दाग़-दाग़ उजाला' (१३ कड़ियाँ) रेडिओ धारावाहिक, आकाशवाणी दिल्ली, उर्दू) लिखा था. सलाम है उस हौसले को जिसने सच्चाई का दामन नहीं छोड़ा. सलाम है उन बेहतर फिल्म देखने वाले दर्शकों को जिन्होंने साफ़ बता दिया कि दर्शक अच्छी फिल्मों का हमेशा स्वागत करते रहेंगे. काश कि कश्मीर दहकते हुए ज्वालामुखी से बाहर निकल आये. काश कि वहां के युवकों को फरन से हाथ निकालकर सैलानियों से भीख मांगने की ज़रुरत पड़े.

        'हैदर' नहीं देखा है तो देखें, समझें, जानें कि कश्मीरियों की असली समस्या क्या है. हैदर की रूह में उतर जाने वाले कलाकार शाहिद कपूर के फ़न को देखें. देखने के लिए और भी इतना कुछ कि मेरा कहा भी कम पड़ जाये.  
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