मेरे सवाल, मेरी शंकाएं और संभवतः मेरे पूर्वाग्रह!./अशोक गुप्ता
देश के नेताओं के संज्ञान में मेरे कुछ सवाल
संदर्भ : श्रीनगर कश्मीर के शंकराचार्य मंदिर का नाम बदल कर उसे शंकर च्युत किया जाना.
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| अशोक गुप्ता:कथाकार व स्वतंत्र पत्रकार |
संदर्भ : श्रीनगर कश्मीर के शंकराचार्य मंदिर का नाम बदल कर उसे शंकर च्युत किया जाना.
- इस निर्णय का मूलबिंदु कहाँ है, यानी इसका मूल प्रस्तावक कौन है? (इतना तो स्पष्ट है कि इसमें केन्द्र सरकार की सहमति अन्तर्निहित है.
- इस निर्णय से कश्मीर या देश के अन्य भागों में बसे मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक व शेष विस्तृत समाज में उनकी हैसियत में क्या बढ़ोतरी होगी और कैसे...? (इस निर्णय पर कॉंग्रेस की भी चुप्पी है और भाजपा की ओर से हिंदुत्व के झंडाबरदार नरेंद्र मोदी की भी.)
- मेरी सोच है कि कॉंग्रेस तो हमेशा से मुसलामानों को जनसंघ व भाजपा का हौआ दिखाकर अपने दामन में समेटती रही है, और उसकी ओर से मुसलामानों को मिली यह सुरक्षा ही उसकी नियामतें हैँ. (वरना, विकास, सम्मान शिक्षा और रोज़गार की दिशा में उसने मुसलामानों को पनपने देने की दिशा में ठेंगा ही दिखाया है. यह लॉलीपॉप देकर कॉंग्रेस की ‘चुप्पी भरी’ खुशी समझ में आती है.)
- नरेन्द्र मोदी, गुजरात में हुए मुसलामानों के भीषण-रक्तपात के बाद इस लोकसभा के चुनाव में खुद को मुसलामानों का सगा और धर्मनिरपेक्ष बताते हुए सामने आना चाहते हैं, इसलिए चुप हैं.
- चुप क्यों हैं?
मुस्लिम वोटों के मुद्दे पर उन्होंने कांग्रेस से उसी तरह हाथ मिला लिये हैं, जैसे जन-लोकपाल के मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल के समय बीजेपी ने कांग्रेस से हाथ मिला लिये थे. - (दरअसल, वह चाहे नरेंद्र मोदी हों, या राहुल या मनमोहन सिंह, हिंदू या मुसलमान का वास्तविक हित किसी का एजेंडा नहीं है. वह केवल इन वर्गों के वोट हथियाने के दांव खेलते हैं और पाला बदलते रहते हैं.नरेन्द्र मोदी के हिंदुत्व-भाव को भी इसी निगाह से देखा जा सकता हूँ. कॉंग्रेस और भाजपा दोनों की ही एक जैसी नीति है. (जैसे कॉंग्रेस ने पहले देश को समझाया था ‘इण्डिया इज़ इंदिरा’ और यह पाठ अभी तक क्रमशः जारी है,) उसी तरह भाजपा देश की छाती पर चढ़ कर चीख़ रही है, भारत का अर्थ है नरेंद्र मोदी. शंकराचार्य का नाम बदलना मुसलामानों को थमाया गया एक लौलीपॉप है और भारत की आदिकालीन हिंदू संस्कृति और विरासत पर एक अपमानजनक और शर्मनाक प्रहार, जिसमें जितना मनमोहन सिंह शामिल हैं उतना ही नरेन्द्र मोदी, एलके अडवाणी जी और सुषमा स्वराज भी.)
- क्या नरेन्द्र मोदी अपने चुनावी एजेंडे में यह शामिल करेंगे कि वह सत्ता में आने पर इस ‘चापलूसी हथकंडे’ को खारिज करेंगे?
- क्या वह अपनी चुनावी रैलियों में इस बदलाव का विरोध उसी सिंह गर्जना से करेंगे, जो वह अब तक करते आये हैं...?
- क्या राहुल गांधी इस संदर्भ में कोई स्पष्टीकरण या सफाई देंगे? या इस निर्णय के प्रपत्र को उसी तरह फाड़ कर कूड़ेदान में डाल देंगे जिस तरह उन्होंने मनमोहन सिंह के एक अध्यादेश के साथ किया था. आशंकाओं से जन्मे प्रश्न
- आशंकाएं प्रश्नों को जन्म दे रही हैं जिसमें दल-निरपेक्ष रूप से नेताओं के पास जनता के लिये केवल गैस के रंगीन गुब्बारे हैं और जो एक दूसरे पर आक्रामक होकर वार करते दिखते हैं. ये नेता अपने स्वार्थ के लिये अगले ही पल न केवल उससे गले मिल सकते हैं बल्कि किसी घोर आपत्तिजनक षड्यंत्र में उसके साझीदार भी हो सकते हैं.. केवल नाम बदल देना उतना खतरनाक नहीं है, जितना विभिन्न राजनैतिक दलों का चारित्रिक पतन.
- बताएं, देशवासी क्या कहते हैं....?

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