संघ, साबिर अली को लेकर पार्टी के शीर्ष-नेतृत्व से नाराज़ था./रंजन ज़ैदी
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मुख़्तार अब्बास नक़वी आत्म-सुरक्षा को लेकर आतंकित |
जब साबिर अली को बीजेपी में लिया गया था तब पार्टी जानती थी कि साबिर अली ज़मीन का नेता है और बिहार में नीतीश को लोकसभा के चुनाव में नुकसान पहुंचा सकता है. चुनाव में वह बीजेपी को लाभ पहुंचाने में भी सक्षम है, इसलिए उसे पार्टी में आनन-फ़ानन ले आया गया.
आरिफ मुहम्मद खान को भी कभी पार्टी ने इसी उत्साह के साथ लिया था लेकिन प्रतिभाशाली नेतृत्व में सक्षम आरिफ मुहम्मद खान अपनी तत्कालीन अदूरदर्शिता के कारण गुमनामी के अंधेरों में कहीं गुम हो गए. लेकिन 'मुकुन्दी लाल चिरैयाकोटी' गले में मंदिर का घंटा लटकाये पार्टी में दाखिल हुए तो उसी के होकर रह गए. मुसलमानों को तब भी उनकी एंट्री पसंद नहीं आई थी.
अब पत्रकार से नेता बने एमजे अकबर बीजेपी के प्रवक्ता हैं. पार्टी अब उन्हीं से कहलायेगी कि नरेंद्र मोदी इस देश के अन्न-दाता और मुसलमानों के मसीहा हैं. मुस्लमान उन्हें वोट दें. लेकिन क्या हकीकत में ऐसा हो सकेगा?
अडवाणी क्राइसेज़ में वह उनका दायां हाथ बने रहे, अब वह मोदी का दायां हाथ हैं. लेकिन साबिर अली प्रकरण ने उन्हें नयी मुसीबत में घसीट लिया है जिसके नतीजे कालांतर में उनके लिए ठीक नहीं होंगे क्योंकि उनके वक्तव्य से पार्टी को बहुत बड़ी क्षति पहुंची है जिसकी भरपाई अदालतें भी नहीं कर पाएंगीं।
पार्टी ने संघ के दबाव पर अब साबिर अली को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. साबिर अली के राजनीतिक भविष्य के लिए यह एक और शर्मिंदगी का कारण माना जायेगा । उसका अपना राजनीतिक दुर्भाग्य यह था कि उसने बिना सोचे-समझे जल्दबाज़ी में बीजेपी ज्वाइन कर ली थी जबकि इस सम्बन्ध में न तो नीतिश को और न ही खुद उसे जल्दबाज़ी से काम लेना चाहिए था। इस कदम से दोनों को कालांतर में भारी घाटा उठाना पड़ सकता है।
संघ वैसे भी साबिर अली को लेकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से नाराज़ हो था. उसे पार्टी में रखना बीजेपी के लिए सर-दर्द जैसा था. यदि वह रहता तो संघ उसे पनपने नहीं देता और दूसरे दल
उसे अपनी मूंछ का बाल बनने नहीँ देते।
नक़वी का फ़िलहाल कुछ नहीं होने वाला है क्योंकि बीजेपी पार्टी इस समय गम्भीर संकट से गुज़र रही है. पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू की बगावत सामने आ चुकी है. रायबरेली से चुनाव लड़ने के लिए उमा भारती ने इंकार कर दिया है. बनारस में मोदी की सीट सुरक्षित नहीं रही है. गुजरात की सीट भी अब मिस्त्री के आने से खतरे से घिर गई है.
बात शाहनवाज़ खां की करें तो शाहनवाज़ की राजनीतिक शैली में जो राजनैतिक नाटकीयता है, उसका अभी अध्ययन किया जाना चाहिए। वैसे अभी तक उनका तटस्थ नेता के रूप में ही शुमार किया जाता है. alpsankhyaktimes94gzb.com/ +91 9350 934 635 http://ranjanzaidi786@yahoo.com/


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