जो है, जो नहीं है./रंजन ज़ैदी
व्यंग्य
राजनितिक 'स्पेस' के 'अल्फ़ा' में बैठा ६५ या ७५ वर्ष का बूढा राजनीतिज्ञ राजनीति के 'इवेंट-
होराइज़न' में देश के 'जेनविन-यूथ' को ब्लैक-होल की तरह निगल जाने की तैयारी कर रहा है.
बहुत कम लोग जानते होंगे कि इवेंट-होराइज़न से निकलने वाला सघन-ताप ही न दिखाई देने वाले असंख्य धब्बेदार 'ब्लैक-होल' को जन्म देता है. ऐसे 'इवेंट होराइज़न' अपने समीप से गुजरने वाले किसी भी चमकदार तारे को साबुत नहीं जाने देते, उसे अपने ताप से कणों में बदलकर बिखेर देते हैं.
१७८३ में वैज्ञानिक 'जॉन मिशल' अगर साहित्यकार बन जाता तो उसकी थ्यूरी का मुहावरा होता कि घनेरे वृक्ष के नीचे घास नहीं उगा करती। पोलिटिकल इलेक्ट्रान डी-जेनरेट करने वाले एलके अडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की पीड़ा को अपने समय के वैज्ञानिक सुब्रमनियम चन्द्र शेखर समझ सकते थे क्योंकि उनके अस्तित्व को भी तो उनके समकालीनों ने मान्यता नहीं दी थी.
राजनीति-विज्ञानं के विशेषज्ञ जानते होंगे कि राजनीति में 'पोलिटिकल न्यूट्रॉन-स्टॉरज़' 'इवेंट होराइज़न' के निकट आते ही परिस्थितिवश किस तरह अपने आपमें सिकुड़ जाते हैं, कभी ब्लैक-होल के डर से तो कभी अल्ट्रा-रेज़ेज़ के लौट आने के डर से. नियति के गाढ़े पदार्थ में ये बुलबुले ऐसे ही भारतीय राजनीति के ब्रम्हांड में कुर्सियां उछालते और पत्थरों से बुलबुले फोड़ते रहेंगे और दुनिया के मेले ऐसे ही सजते, संवरते अपनी रौनकें बिखेरते रहेंगे।
जॉन मिशेल ने अपने समय में ऐसा सपना नहीं देखा होगा कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत का कोई ऐसा राजनिति-शास्त्र का वैज्ञानिक भी ब्रम्हांड के राजनीतिक महाशून्य में जन्म लेगा जहाँ पर प्रकाश की किरणें टकराकर वापस नहीं आतीं। यदि सूर्य के व्यास को चीरता हुआ कोई भी उल्का-पिंड महाशून्य में गिरता है तो वह प्रकाश की गति से भी तेज़ गति से चलता हुआ ब्लैक-हॉल में गिरते ही लापता हो जाता है. अरविन्द केजरीवाल की राजनीती का विज्ञानं भी कुछ इसी तरह का है जिसने इस क्षेत्र के 'प्रोफेशनल पोलिटिकल एक्सपर्ट्स' को ब्लैक-होल की ओर धकेल दिया है. राजनीती का आइंस्टाइन दिग्विजय सिंह हत्प्रभ कि ऐसा आइडिया उनके मस्तिष्क में क्यों नहीं आया, वह भी गुजरात जाकर उसके मीडिया को फोकस में लेकर नमो के राज्य-विकास की पोलपट्टी खोल सकते थे, अपनी पार्टी की ६५ वर्षीय 'फ़ील्ड-एक्विशन' की निरापद थ्यूरी को निरस्तकर एक नई थ्यूरी को जन्म दे देते क्योंकि उन्होंने राजनीति-शास्त्र के गुरुकुल में दरिया बिछाकर छात्र-जीवन की शुरुआत की थी, कुर्ते के दामन से पसीना पोछा था, जबकि आज की पीढ़ी का राजनेता सुविधा-भोगी है और 'एसी' का ब्रह्महांड उसे विरासत में मिलता है. यही कारन है बीजेपी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी जैसी अन्य राजनीतिक उल्काएं ब्लैक-होल की ओर तेज़ी से बढ़ रही हैं और संघर्ष करती रहने वाली उल्काएं अपने नए रास्ते खोज रही हैं.
'कोइंटम' की थ्यूरी पर दिग्गी राजा ने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने जानने कि कोशिश भी नहीं की कि अरविन्द केजरीवाल के राजनीतिक ब्लैक होल का ताप उसके टैम्प्रेचर की स्थितियों के हिसाब से घटता-बढ़ता है.
आप को जब एहसास हुआ कि पार्टी प्रचार कि परिधि से 'आउट आफ फोकस' जा रही है और नमो का पारा फिर से चढ़ने लगा है तो अरविन्द केजरीवाल ने गुजरात की राजनीति को अपने होराइज़न में समेट लिया । वहाँ जाम लगा तो पुलिस का एना स्वाभाविक था. जब पुलिस आई तो ज़िन्दगी का खतरा भी बढ़ गया. मीडिया ने सोचा, अब टीआरपी बढ़ जायेगी।
निजी चैनलों के पेड-निदेशकों की झल्लाहट इसलिए बढ़ी कि अरविन्द केजरीवाल के बायकाट के बाद भी 'आप' सबको अपने होराइज़न में घसीटने लगी है. ऐसे में नमो का क्या होगा?
पुलिस-प्रशासनभी बड़बड़ाने लगा. झड़प की स्थिति तक बन आई. 'कोड अफ कंडक्ट' लागु हुआ तो आप की ओर से हज़ारों एसएमएस देशभर में ब्लैक-होल की तरफ बढ़ने लगे और आकाश-गंगा कि राजनीतिक उल्काएं दिल्ली की ओर बढ़ने लगीं।
बीजेपी और आरएसएस के सुविधा भोगी कार्यकर्ताओं ने कुर्सी का लालच छोड़ उसे 'आप' की ओर उछाल दिया। वे नहीं समझ पाये कि 'आप' अपनी वैचारिक-आकाश-गंगा से भारतीय राष्ट्रीय-राजनीती की आकाश-गंगा में प्रवेश करने जा रही है. उसके पास उसका अपना निजी इवेंट होराइज़न है जिसे उसने संघर्ष के बाद प्राप्त किया है जबकि सुविधाभोगी राष्ट्रीय-पार्टियां अब विरासत के मद में अपने पूर्वजों की पुरानी कुर्सियां फेंककर राजनीति की सुविधाभोगी कुर्सियां तलाश रही हैं.
राजनेताओं की यह नई पीढ़ी यह तक नहीं जानती कि आकाश-गंगाओं का सफ़र प्रकाश की गति से भी तेज़ न हो तो ब्लैक-होल टूटती-फूटती उल्काओं को निगल जाया करते हैं.
बदलते राजनीतिक समीकरणों की परिधि में अब धीरे-धीरे राजनीतिक 'सुपर-मैसिव स्टेलर' पीछे छूटते जा रहे हैं और विरासत की उल्काएं ब्रह्माण्ड में अपने ठिकाने बनाने में व्यस्त होती जा रही हैं.
वस्तु-स्थिति यह है कि अब भारतीय राजनीतिक विरासत के सुविधाभोगी वारिस इवोलूशन की थ्यूरी को नकार चुके हैं और ऐसी उल्काओं पर सवार हो चुके हैं जो किसी भी समय किसी न किसी होराइज़न के गुरुत्वाकर्षण की गिरफ्त में आकर ब्लैक होल में लुप्त हो जायेंगे।
वह नहीं जानते कि ब्रह्माण्ड एक नए चमत्कार को नमस्कार करने की ओर अग्रसर हो चुका है.
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alpsankhyaktimes94gzb.com +91 935 093 4635 http://ranjanzaidi786@yahoo.com/
राजनितिक 'स्पेस' के 'अल्फ़ा' में बैठा ६५ या ७५ वर्ष का बूढा राजनीतिज्ञ राजनीति के 'इवेंट-
होराइज़न' में देश के 'जेनविन-यूथ' को ब्लैक-होल की तरह निगल जाने की तैयारी कर रहा है.
बहुत कम लोग जानते होंगे कि इवेंट-होराइज़न से निकलने वाला सघन-ताप ही न दिखाई देने वाले असंख्य धब्बेदार 'ब्लैक-होल' को जन्म देता है. ऐसे 'इवेंट होराइज़न' अपने समीप से गुजरने वाले किसी भी चमकदार तारे को साबुत नहीं जाने देते, उसे अपने ताप से कणों में बदलकर बिखेर देते हैं.
१७८३ में वैज्ञानिक 'जॉन मिशल' अगर साहित्यकार बन जाता तो उसकी थ्यूरी का मुहावरा होता कि घनेरे वृक्ष के नीचे घास नहीं उगा करती। पोलिटिकल इलेक्ट्रान डी-जेनरेट करने वाले एलके अडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की पीड़ा को अपने समय के वैज्ञानिक सुब्रमनियम चन्द्र शेखर समझ सकते थे क्योंकि उनके अस्तित्व को भी तो उनके समकालीनों ने मान्यता नहीं दी थी.
राजनीति-विज्ञानं के विशेषज्ञ जानते होंगे कि राजनीति में 'पोलिटिकल न्यूट्रॉन-स्टॉरज़' 'इवेंट होराइज़न' के निकट आते ही परिस्थितिवश किस तरह अपने आपमें सिकुड़ जाते हैं, कभी ब्लैक-होल के डर से तो कभी अल्ट्रा-रेज़ेज़ के लौट आने के डर से. नियति के गाढ़े पदार्थ में ये बुलबुले ऐसे ही भारतीय राजनीति के ब्रम्हांड में कुर्सियां उछालते और पत्थरों से बुलबुले फोड़ते रहेंगे और दुनिया के मेले ऐसे ही सजते, संवरते अपनी रौनकें बिखेरते रहेंगे।
जॉन मिशेल ने अपने समय में ऐसा सपना नहीं देखा होगा कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत का कोई ऐसा राजनिति-शास्त्र का वैज्ञानिक भी ब्रम्हांड के राजनीतिक महाशून्य में जन्म लेगा जहाँ पर प्रकाश की किरणें टकराकर वापस नहीं आतीं। यदि सूर्य के व्यास को चीरता हुआ कोई भी उल्का-पिंड महाशून्य में गिरता है तो वह प्रकाश की गति से भी तेज़ गति से चलता हुआ ब्लैक-हॉल में गिरते ही लापता हो जाता है. अरविन्द केजरीवाल की राजनीती का विज्ञानं भी कुछ इसी तरह का है जिसने इस क्षेत्र के 'प्रोफेशनल पोलिटिकल एक्सपर्ट्स' को ब्लैक-होल की ओर धकेल दिया है. राजनीती का आइंस्टाइन दिग्विजय सिंह हत्प्रभ कि ऐसा आइडिया उनके मस्तिष्क में क्यों नहीं आया, वह भी गुजरात जाकर उसके मीडिया को फोकस में लेकर नमो के राज्य-विकास की पोलपट्टी खोल सकते थे, अपनी पार्टी की ६५ वर्षीय 'फ़ील्ड-एक्विशन' की निरापद थ्यूरी को निरस्तकर एक नई थ्यूरी को जन्म दे देते क्योंकि उन्होंने राजनीति-शास्त्र के गुरुकुल में दरिया बिछाकर छात्र-जीवन की शुरुआत की थी, कुर्ते के दामन से पसीना पोछा था, जबकि आज की पीढ़ी का राजनेता सुविधा-भोगी है और 'एसी' का ब्रह्महांड उसे विरासत में मिलता है. यही कारन है बीजेपी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी जैसी अन्य राजनीतिक उल्काएं ब्लैक-होल की ओर तेज़ी से बढ़ रही हैं और संघर्ष करती रहने वाली उल्काएं अपने नए रास्ते खोज रही हैं.
'कोइंटम' की थ्यूरी पर दिग्गी राजा ने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने जानने कि कोशिश भी नहीं की कि अरविन्द केजरीवाल के राजनीतिक ब्लैक होल का ताप उसके टैम्प्रेचर की स्थितियों के हिसाब से घटता-बढ़ता है.
आप को जब एहसास हुआ कि पार्टी प्रचार कि परिधि से 'आउट आफ फोकस' जा रही है और नमो का पारा फिर से चढ़ने लगा है तो अरविन्द केजरीवाल ने गुजरात की राजनीति को अपने होराइज़न में समेट लिया । वहाँ जाम लगा तो पुलिस का एना स्वाभाविक था. जब पुलिस आई तो ज़िन्दगी का खतरा भी बढ़ गया. मीडिया ने सोचा, अब टीआरपी बढ़ जायेगी।
निजी चैनलों के पेड-निदेशकों की झल्लाहट इसलिए बढ़ी कि अरविन्द केजरीवाल के बायकाट के बाद भी 'आप' सबको अपने होराइज़न में घसीटने लगी है. ऐसे में नमो का क्या होगा?
पुलिस-प्रशासनभी बड़बड़ाने लगा. झड़प की स्थिति तक बन आई. 'कोड अफ कंडक्ट' लागु हुआ तो आप की ओर से हज़ारों एसएमएस देशभर में ब्लैक-होल की तरफ बढ़ने लगे और आकाश-गंगा कि राजनीतिक उल्काएं दिल्ली की ओर बढ़ने लगीं।
बीजेपी और आरएसएस के सुविधा भोगी कार्यकर्ताओं ने कुर्सी का लालच छोड़ उसे 'आप' की ओर उछाल दिया। वे नहीं समझ पाये कि 'आप' अपनी वैचारिक-आकाश-गंगा से भारतीय राष्ट्रीय-राजनीती की आकाश-गंगा में प्रवेश करने जा रही है. उसके पास उसका अपना निजी इवेंट होराइज़न है जिसे उसने संघर्ष के बाद प्राप्त किया है जबकि सुविधाभोगी राष्ट्रीय-पार्टियां अब विरासत के मद में अपने पूर्वजों की पुरानी कुर्सियां फेंककर राजनीति की सुविधाभोगी कुर्सियां तलाश रही हैं.
राजनेताओं की यह नई पीढ़ी यह तक नहीं जानती कि आकाश-गंगाओं का सफ़र प्रकाश की गति से भी तेज़ न हो तो ब्लैक-होल टूटती-फूटती उल्काओं को निगल जाया करते हैं.
बदलते राजनीतिक समीकरणों की परिधि में अब धीरे-धीरे राजनीतिक 'सुपर-मैसिव स्टेलर' पीछे छूटते जा रहे हैं और विरासत की उल्काएं ब्रह्माण्ड में अपने ठिकाने बनाने में व्यस्त होती जा रही हैं.
वस्तु-स्थिति यह है कि अब भारतीय राजनीतिक विरासत के सुविधाभोगी वारिस इवोलूशन की थ्यूरी को नकार चुके हैं और ऐसी उल्काओं पर सवार हो चुके हैं जो किसी भी समय किसी न किसी होराइज़न के गुरुत्वाकर्षण की गिरफ्त में आकर ब्लैक होल में लुप्त हो जायेंगे।
वह नहीं जानते कि ब्रह्माण्ड एक नए चमत्कार को नमस्कार करने की ओर अग्रसर हो चुका है.
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