अब मैं सचमुच जीना चाहता हूँ. आमजन के लिए/ranjan zaidi
प्रोफ़ेसर के.पी.सिंह (एएमयू)१९७७ में उन्होंने जनवादी लेखक संघ का सदस्य बनने के लिए कहा तो
मैं टाल गया. इसका मतलब यह नहीं था कि मैं जनवादी लेखक संघ से दूर भागना चाहता था.दिल्ली में वर्षों तक मीटिंगों में हिस्सा लेता रहा.
१९८९-९० में मेरे एक सीनियर राजनीतिक मित्र, (भूतपूर्व राजदूत) उन्होंने अपनी पोलिटिकल पार्टी में शामिल कर मुझे जनरल सेक्रेटरी बना दिया। तब मैं हिंदी साप्ताहिक 'जनाधार भारती' का प्रबंध संपादक था. एक दिन चेंबर में एक पुलिस इंस्पेक्टर आया बोला, आप पार्टी के सचिव हैं, पुलिस इंक्वायरी है, आप ही रंजन ज़ैदी हैं? मेरे लिए यह आश्चर्य की बात थी. मैंने कहा, मैंने तो किसी पार्टी को ज्वाइन नहीं किया है. सचिव कैसे हो गया? उसने कहा, ओके., आप नहीं हैं तो…बात ख़त्म।
इस तरह दूसरा फेज़ गया ।
फिर एक समय ऐसा आया जब मैंने पहली बार अरविन्द केजरीवाल का अध्ययन किया और उस आंदोलन का भी जिसे अन्ना लीड कर रहे थे तो स्वतः ही कलम अरविन्द केजरीवाल पर उठ गया और मुझे लगा कि यह वही आँधी है जिसका शायद मुझे इंतज़ार था. जो आने वाले समय की राजनीति को नई दिशा देगी। (देखें १९/०८/२०१२ //:alps-politics.com)
राजनीति की अपनी भाषा है और व्यक्ति के अपने संस्कार।
और अब!
इस आंधी में मैं भी उड़ने के लिए पंख तोलने लगा हूँ क्योंकि शायद व्यवस्था परिवर्तन का स्वप्न मैं भी वर्षों
से देखता चला आ रहा हूँ.
सरकरी तंत्र में रहकर बहुत कुछ देखने को मिला, भोगा और लड़ा भी. नौकरी से मुक्त होकर अब मैं भी आम
आदमी की पंक्ति में खड़ा होकर अपनी आवाज़ बुलंद करना चाहता हूँ.
इसीलिए अब मैं सचमुच जीना चाहता हूँ. आमजन के लिए, उस क्रांति की ज्वाला के लिए जो मेरी देह
से फूटना चाहती है, उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों के लिए जो दूसरों के लिए जीना चाहते हैं.
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अब मैं सचमुच जीना चाहता हूँ. आमजन के लिए/ranjan zaidi
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