है राम के वजूद पर हिंदोस्तां को नाज!
आज के दिन राम को याद करना चाहिए क्योंकि आज के ही दिन कुछ अमानुषों ने राम की
विरासत पर कब्जा कर लिया। वे राम जिन्हें इकबाल ने कहा है कि "है राम के वजूद पर हिंदोस्तां को नाज" और सन् बानवे के पहले हमारे अवध के हिंदू मुसलमान अभिवादन के लिए "राम-राम" ही कहा करते थे। 
वे राम जो हर संप्रदाय और हर धर्म के लिए साक्षात ईश्वर का प्रतीक बन गए थे। कबीर खूब कहते रहें कि दशरथ के घर राम न जन्मे पर फिर भी क्या फर्क पड़ता है। 
पाकिस्तान के मशहूर इतिहासकार राणा अली हसन चौहान ने लिखा है कि वे राम की वंश परंपरा में आते हैं। उन राम जी के लिए मस्जिद-ए-जन्मस्थान को तोड़ा जाना मुझे तो बहुत खला था और छह दिसंबर 1992 को जब यह खबर मिली तो मन इतना बेचैन हुआ कि कई दिनों तक खाने की भी इच्छा नहीं होती थी। 
राम हम सबके थे। चाहे वे गांधी रहे हों अथवा इकबाल। मस्जिद-ए-जन्मस्थान को देखकर लगता था कि वाकई रामजी का ही घर है। वह अगर वैसा ही बना रहता तो किसी का क्या जाता था? राम की अवधपुरी जाने वाले हिंदू न जाने कितने वर्षों से वहां जाते रहे हैं लेकिन 1840 तक अंग्रेजों को सबसे पहले लगा कि नहीं यह मस्जिद-ए-जन्मस्थान को तो मंदिर होना चाहिए। अंग्रेजों ने ही इसे बाबरी मस्जिद नाम दिया। शिया नवाब यहां के शासक थे उन्होंने कभी भी इस मस्जिद पर ध्यान तक नहीं दिया और उसके आसपास जितनी हिंदू धर्मशालाएं हैं, उनमें से ज्यादातर को शिया नवाबों ने ही बनवाया था। खुद हनुमान गढ़ी मंदिर नवाब शुजाउद्दौला ने बनवाया था क्योंकि हनुमान बाहुक का पाठ करने से उसकी बांह का दर्द ठीक हो गया था। 
अयोध्या में मुस्लिम आबादी नहीं के बराबर है और उन्हें इस मस्जिद-ए-जन्मस्थान में सिर्फ मीठे जल के कुएं से पानी निकालने के अलावा और कोई वास्ता नहीं रहा। हिंदू भी उसी कुएं से पानी निकालते थे। पर इस मस्जिद-ए-जन्मस्थान को ध्वस्त कर मुस्लिमों को कम धर्मभीरु हिंदुओं की भावनाओं को ज्यादा ध्वस्त कर दिया गया था। मजे की बात कि नवस्कूलों में दीक्षित मुस्लिम युवा भी इस इतिहास को नहीं समझte .
कपट की लम्बी परम्परा/Arun Maheshwari
छह दिसम्बर 1992 की घटना से सारा देश सन्न रह गया था। अनेक पढ़े-लिखेसोचने-समझने वाले लोग भी जैसे किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए थे। आधुनिकभारत में एक संगठित भीड़ की बर्बरता का ऐसा डरावना अनुभव इसके पहले कभी नहीं हुआ था। बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद का यह मुद्दा वैसे तो लम्बे अर्से से बना हुआ है। पिछले चार वर्षो से इस पर खासी उत्तेजना रही है। खासतौर पर विश्व हिन्दू परि-षद् और बजरंग दल नामक संगठन इस पर लगातार अभियान चलाते रहे हैं। दूसरी ओर से बाबरी मस्जिदएक्शन कमेटी भी किसी  किसी रूप में लगी हुई थी। 
सर्वोपरिभारतीय जनता पार्टी ने इसे अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना रखा था तथा उसके सर्वोच्च नेताइन अभियानों में अपनी पूरी शक्ति के साथ उतरे हुए थे। उनके इन अभियानों से फैली उत्तेजना से देश भर में भयानक साम्प्रदायिक दंगे भी हुए जिनमें अब तक हजारों लोगों की जानें जा चुकी हैं। 
इसके पहले 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के शासनकाल में भी कार सेवकों ने इस विवादित ढाँचे पर धावा बोला था। उस समय भी भारी उत्तेजना पैदा हुई थी जिसमें पुलिस को ढाँचे की रक्षा के लिए गोली चलानी पड़ी थी।ऐसे तमाम हिंसक अभियानों के बाद भी चूँकि वहाँ बाबरी मस्जिद सुरक्षित रहीइसीलिए भारत की जनता का बड़ा हिस्सा काफी कुछ आश्वस्त सा हो गया था। हर थोड़े समय के अन्तराल पर भाजपा के नए-नए अभियानों-कभी शिलापूजनतो कभी पादुका पूजन आदि से लोगों के चेहरों पर शिकन तो आती थीलेकिन भारत में अवसरवादी राजनीति के अनेक भद्दे खेलों को देखने का अभ्यस्त हो चुके भारतीय जनमानस ने साम्प्रदायिक उत्तेजना के इन उभारों को भी वोट की क्षुद्र राजनीति का एक अभि अंग समझकर इन्हें एक हद तक  जैसे पचा लिया था। 
सपने में भी उसे यह यकीन नहीं हो रहा था कि यह प्रक्रिया पूरे भारतीय समाज के ऐसे चरम बर्बरीकरण का रूप ले लेगी। यही वजह रही कि छह दिसम्बर की घटनाओं से उसे भारी धक्का लगा। साम्प्रदायिक घृणा के प्रचार के लम्बेलम्बे अभियानों का साक्षी होने के बावजूद एक बार के लिए पूरा राष्ट्र सकते में  गया। 
संत्रस्त राष्ट्र
सिर्फ केन्द्रीय सरकार ने ही बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने की उस घटना को चरम विश्वासघात नहीं कहा,  देश के तमाम अखबारोंबुद्धिजीवियोंसभी गैर-भाजपा राजनीतिक पार्टियों और आम-फहम लोगों तक ने इसे देश के साथ किया गया एक अकल्पनीय धोखा बताया। 
अयोध्या में कार सेवक नामाधरी भीड़ ने एक विवादित ढाँचे को नहीं गिराया थापूरे राष्ट्र को एक अन्तहीनगृहयुद्ध में धकेल देने का बिगुल बजाया था। राष्ट्र इस कल्पना से सिहर उठा था कि अब तो सार्वजनिक जीवन से हर प्रकार की मर्यादाओं के अन्त की घड़ी गई है। सिर्फ राजनीतिक, संवैाधनिक और धार्मिक ही नहीं, सभ्यता और संस्कृति की मर्यादाएँ भी रहेंगी या नहीं, पूरा समाज इस आशंका से संत्रस्त हो गया था। लोगों की नजरों के सामने प्राचीनतम सभ्यता वाले वैविध्यमय महानता के भारत का भावी चित्र एक-दूसरे के खून के प्यासे, बिखरे हुए अनगिनत बर्बर कबीलोंवाले भूखंड के रूप में कौंध गया था। यही वजह थी कि छह दिसम्बर के तत्काल बाद भारत के किसी अखबार ने साम्प्रदायिक उत्तेजना और बर्बरता को बढ़ावा देनेवाली वैसी भूमिका अदा नहीं की जैसी कि दैनिक अखबारों के एक हिस्से ने 30 अक्टूबर, 1990 की घटनाओं के वक्त अदा की थी जब बाबरी मस्जिद पर पहला हमला किया गया था। 


आडवाणी का कपट 
इसी क्रम में कई अखबारों ने अकेले अयोध्या प्रकरण के सन्दर्भ में भारतीय जनता पार्टी के अनगिनत  परस्पर विरोधी बयानों की फेहरिस्त भी छापी। अंग्रेजी दैनिक स्टेट्समैन ने 11 दिसम्बर, 92 के अपने अंक में 1 दिसम्बर से 8 दिसम्बर 92 के बीच लाल कृष्ण आडवाणी के ऐसे परस्पर-विरोधी वक्तव्यों के उद्धरण प्रकाशित किए जो उन्होंने वाराणसी से मथुरा तक की अपनी यात्रा के दौरान  और फिर मस्जिद को ढहा दिए जाने के उपरान्त दिए थे। आडवाणी की तरह के नेता हर नए दिन अपनी  बातों को बदलकर एक प्रकार का दिग्भ्रम पैदा करने में कितने माहिर हैंइसे स्टेट्समैन की इन उद्धृतियों से जाना जासकता है :
वाराणसी, 1 दिसम्बर : हम किसी मस्जिद को गिराकर मन्दिर बनाना नहीं चाहते। जन्मभूमि स्थल पर कोई मस्जिद थी ही नहीं। वहाँ राम कीमूर्तियाँ है और हम वहाँ सिर्फ मन्दिर बनाना चाहते हैं...गलत आचरणों और नियम के खिलाफ जनतान्त्रिक प्रतिवाद  हमारे देश की एक प्राचीन परम्परा है...कार सेवा का अर्थ भजन और कीर्तन नहीं होता। हम उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अिधगृहीत 2.77 एकड़ भूमि पर बेलचों और इटों से कार सेवा करेंगे।आजमगढ़, 1दिसम्बर 
हम शान्तिपूर्ण कार सेवा चाहते हैं लेकिन केन्द्र तनाव पैदा कर रहा है।
मऊ,2 दिसम्बर 
छह दिसम्बर से कार सेवा शुरू होगी। सभी कार सेवक अयोध्या में 2.77 एकड़ पर कायिक श्रम करेंगेसिर्फ भजन नहीं गाएँगे।गोरखपुर,3 दिसम्बर (जहाँ उन्होंने इस खबर को गलत बताया जिसमें उनकी इस बात का उल्लेख किया गया था कि कारसेवा में बेलचों और इटों का इस्तेमाल किया जाएगा ) ’’कार सेवक पूरी तरह से नियन्त्रण में रहेंगे। कारसेवा प्रतीकात्मक होगी। मैंने ऐसी (बेलचों और इटों के इस्तेमाल की तरह कीबातकभी नहीं कही। फिर भी गलत खबर के कारण सदन में हंगामा होने से लोक सभा का  दिन का कामकाज खराब हो गया।
दिसम्बर को उत्तर प्रदेश में एक आम सभा में लोगों को कारसेवा के लिए अयोध्या पहुँचने का आव्हान करते हुए वे कहते हैं : कमर कसकर उतर पड़ो। इस बात की परवाह  करो कि कल्याण सिंह सरकार बनी रहती है या गिरा दीजाती है।नई दिल्ली,7 दिसम्बर 
यह (मस्जिद को गिरानादुर्भाग्यजनक था। मैंने और उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री ने इसे रोकने का भरसकप्रयत्न कियालेकिन हुआ ऐसा कि हम अयोध्या पर जनभावनाओं की तीव्रता का अनुमान नहीं लगा  पाए। हम चाहते थे कि मन्दिर वैाधानिक और कानूनी तरीकों से निर्मित हो।नई दिल्ली,8 दिसम्बर : 
आज जब एक पुराने ढाँचे को जो 50 वर्ष से ज्यादा काल से मस्जिद नहीं रह गया हैन्यायिक  प्रक्रिया की धीमी गति तथा कार्यपालिका की मन्दबुद्धि और अदूरदर्शिता से क्रुद्ध लोगों ने गिरा दिया है तो उन्हें  राष्ट्रपतिउपराष्ट्रपति तथा राजनीतिक पार्टियाँ राष्ट्र के प्रति विश्वासघातसंविाधन का विध्वंस आदि क्या नहीं कह कर कोस रहे हैं। अयोध्या आन्दोलन के दौरान जाहिर हुए इस नग्न दोहरे मापदण्ड के चलते ही हिन्दुओं में क्रोध और अपमान की भावनाएँ  रही हैं।आडवाणी के उपरोक्त सारे बयान कितने परस्पर विरोधी और कपटपूर्ण थे, इसे कोई भी आसानी से देख  सकता है। पिछले चारपाँच वषो के दौरान अगर किसी ने भी आडवाणी की बातों पर ध्यान दिया होगा तो वह तत्काल इस निष्कर्ष तक पहुँच सकता है कि हवा के हर रुख के साथ गिरगिट की तरह फौरन रंगबदलने की कलाबाजी में आडवाणी सचमुच बेमिसाल हैं। इसके साथ ही यह भी सच है कि आडवाणी के इस गुण ने ही पिछले कुछ वषो में उन्हें संघी राजनीति के शीर्षतम स्थान पर पहुँचा दिया है।

अयोध्या का सच और झूठ /वसीम अकरम त्यागी

अयोध्या में सच और झूठ अपने मायने खो चुके हैं। मुसलमान पांच पीढ़ियों से वहां फूलों की खेती कर  रहे हैं। उनके फूल तमाम मंदिरों और उनमें बसे देवताओं पर.. राम पर चढ़ते रहे हैं।मुसलमान वहां खड़ाऊं बनाने के पेशे में जाने कब से हैं। ऋषिमुनिसंन्यासीराम भक्त सब मुसलमानों की बनाई खड़ाऊं पहनते रहे। सुंदर भवन मंदिर का सारा प्रबंध चार दशक तक एक मुसलमान के हाथों मेंरहा।1949 में इसकी कमान संभालने वाले मुन्नूमियां 23 दिसंबर 1992 तक इसके मैनेजर रहे। जब कभी लोग कम होतेआरती के वक्त मुन्नू मियां खुद खड़ताल बजाने खड़े होजाते। क्या वह सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और झूठ क्या ? अग्रवालों के बनवाए एक मंदिर की हर ईंट पर 786 लिखाहै। मंदिर के लिए सारी ईंटें राजा हुसैन अली खां ने दीं। किसे सच मानें ? क्या मंदिर बनवाने वाले अग्रवाल सनकी थे या दीवाना थावह हुसैन अली खां जो मंदिर के लिए ईंटें दे रहा था ? इस मंदिर में दुआ के लिए उठने वाले हाथ हिंदू या मुसलमान किसके हैं,पहचाना ही नहीं जाता। सब आते हैं। एक नंबर 786 ने इस मंदिर को सबका बना दिया। क्या छह दिसंबर 1992 का दिन ही सच हैजाने कौन ! छह दिसंबर 1992 के बाद सरकार ने अयोध्या के ज्यादातर मंदिरों का अधिग्रहण कर लिया। वहां ताले पड़ गए।आरती बंद हो गई। श्रद्धालुओं का आना बंद हो गया। बंद दरवाजों के पीछे बैठे देवी-देवता क्या कभी उन्हें कोसते होंगे जो एक गुंबदपर चढ़कर राम को छू लेने की कोशिश कर रहे थे ? सूने पड़े हनुमान मंदिर या सीता रसोई में उस खून की गंध नहीं आती होगी जोराम के नाम पर अयोध्या और भारत में बहाया गया ? अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी है ! अयोध्या एकतहजीब के मर जाने की कहानी है ! Teep/ Face Book /http://

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