२९ वर्षों बाद मिला इंसाफ /ईशान ज़ैदी
२९ वर्षों बाद मिला इंसाफ /ईशान ज़ैदी
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| उमा मिश्रा, postman |
कानपुर (उप्र) : उसका नाम उमा मिश्रा है. उस पर रु 57.
60 पैसे के गबन का आरोप था. २९ वर्ष पूर्व इसी आरोप पर उसे जेल तक जाना पड़ा.
जेल गया तो डाकिये की नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा. परिवार और समाज में सम्मान को चोट पहुंची सो अलग. रिश्तेदार जेल से ज़मानत पर छुड़ा लाये लेकिन उमा मिश्रा किसी से आँख नहीं मिला पाये।
अदालत पर भरोसा कर चक्कर-पर-चक्कर लगाते रहे. तारीख पर तारीख पड़ती रही, घर की दीवार पर ३४८ तारीखें लकीरों में बदलती रहीं। फिर मकान बिक गया. बच्चे सड़क पर आ गये. खुले आसमान के नीचे कड़कड़ाती सर्दी में एक-एक कर ३ बच्चे भूख और बीमारी में दिवंगत हो गए लेकिन उमा मिश्रा ने हार नहीं मानी. हरदोई में खेत बचे थे, वे भी बेच दिए. बाद के बचे तीनों बच्चों को किराये के मकान में लाकर रखा, पड़ोसियों को बताया कि उसने गबन नहीं किया था. एक दिन अदलिया से उसे ज़रूर इंसाफ मिलेगा।
घटना
13 जुलाई 1984 की है. पोस्टमैन उमा मिश्रा को रु.697.60
पैसे के मनीआर्डर का दिए पतों पर वितरण करना था. 300 रु. बांटे जा चुके थे. बाकी के पैसे उमा मिश्रा ने डाकघर के सहायक पोस्टमास्टर के हवाले कर दिए लेकिन उसने हिसाब के दौरान आरोप लगाया कि टोटल रकम में रु.57.60 का उमा मिश्रा ने गबन किया है. पुलिस ने उमा मिश्रा को गबन के जुर्म में गिरफ्तार कर उसपर मुक़द्दमा दायर कर दिया जिसकी तारीखें २९ वर्षों तक सफ़र तय करती हुईं इसाफ के दरवाज़े तक आ पहुंचीं। यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते वह खुद बिस्तर से लग गया. बेटे की पढाई हाई स्कूल से आगे नहीं बढ़ सकी. चंदे से दो बेटियां तो ब्याह गईं लेकिन उमा मिश्रा टूट सा गया. इसके बावजूद उसने इस उम्मीद पर साँस नहीं तोड़ी और साहस बनाये रखा कि एक दिन उसे इसाफ ज़रूर मिलेगा। तभी 29 वर्षों बाद फैसला आया। फैसले में उसे निर्दोष साबित कर दिया गया था.
आज भी उसे अपने देश की अदालतों पर गर्व है और विश्वास भी कि निर्दोष व्यक्ति को एक दिन इंसाफ ज़रूर मिलता है. (www.samagravichar.in
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