दिल्ली की राजनीति में यथार्थवाद का समावेश हो चुका है.
दिल्ली की राजनीति में यथार्थवाद का समावेश हो चुका है. यह स्थिति उन
व्यवसायिक राजनेताओं के लिए निवाला छीनने जैसा है जिसके बचाव के लिए 'आम आदमी पार्टी' पर निरंतर प्रहार होते रहेंगे। इसके लिए व्यवसाई राजनीतिक-तंत्र किसी भी स्थिति तक जा सकता है. इसे हम सत्ता का संघर्ष कह सकते है जो आगे जाकर रफ्ता-रफ्ता जीवन-मरण की अस्मिता से जुड़ता चला जायेगा।
अच्छी बात यह है कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी 'आप' के माध्यम से इस खूबसूरत और दूरगामी राजनीति के चर्खे से सूत कातने में दिलचस्पी लेने लगे हैं.
नतीजे का खुलासा भी हुआ कि दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जेपी अग्रवाल ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। शायद दिल्ली की पूर्व मुख्य मंत्री शीला दीक्षित को पार्टी के भीतर की उथल-पुथल से दूरी बनाये रखने को कहा जाये और साथ ही कोई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी भी न दी जाये।राष्ट्रपति शासन के बाद भी अंततः दिल्ली में कांटे की टक्कर के चुनाव होने हैं. यह भी तय है कि इस चुनाव के बहुत करीब लोकसभा के चुनाव भी होंगे जिसमें राष्ट्रीय मुद्दे प्रमुख रूप से अपना प्रभाव दिखाएंगे और कांग्रेस पूरी ताक़त से लोकसभा के चुनाव के रथ पर सवार होकर अपने घोड़े दौड़ाएगी।
बीजेपी हिंदुत्व के अहंकार और नरेंद्र मोदी के मीडिया-हाईप के साथ दिल्ली के चुनाव में गद्दी हथियाने का भरपूर प्रयास करेगी लेकिन 'आम आदमी पार्टी' इसबार अपने पूरे बहुमत के साथ विधानसभा में अपनी सरकार बनाने में कामियाब होगी, लेकिन सरकार चलाने में बीजेपी साम, दाम, दंड, भेद के साथ उसे इतना पस्त कर देगी कि उसका अपना अहंकार भी परिस्थितियों के साथ पसीने-पसीने हो जायेगा।
बीजेपी के लिए यह स्थिति जीवन और मरण का सवाल बन जायेगी। ऐसी स्थिति में अरविन्द केजरीवाल और कुमार विश्वास की सुरक्षा को लेकर भी अनेक खतरे पैदा हो सकते हैं ।
यदि अरविन्द केजरीवाल की १८ सूत्री शर्ते ठुकरा दी जाती हैं तो अन्ना के आंदोलन के गर्भ से किरण बेदी के नेतृत्व में एक नया मोर्चा जन्म ले सकता है जो विधान सभा के चुनाव को प्रभावित कर बीजेपी को लाभान्वित करे और अरविन्द केजरीवाल के आंदोलन को ध्वस्त करदे।
सम्भावना कमज़ोर भी नहीं है क्योंकि ‘आम आदमी पार्टी’ में संघी तत्वों की संख्या कम नहीं है और प्रभावशाली बुद्धिजीवियों की संख्या का आभाव न होते हुए भी
वे उस समय तक सामने आने से बचते रहेंगे जब-तक पार्टी सरकार बनाए जाने की स्थिति में नहीं पहुँच जाती है.
अन्ना का आंदोलन मीडिया-हाईप था. उसे प्रमोशन 'दामिनी सामूहिक बलात्कार कांड' के गर्भ से जन्मे नेतृत्व-विहीन युवा छात्र-आक्रोश ने दिया था। फ़्रांस में जो आंदोलन हुआ था उसे छात्र-संगठनों का नेतृत्व मिला हुआ था, इसीलिए वह सकारात्मक था लेकिन इंडिया गेट पर हुए छात्र आंदोलन को किसी भी पार्टी से दिशा-निदेशन नहीं मिल पाया था।
तब उसने अन्ना की ओर उम्मीद की निगाह उठाई तो वहाँ भी उसे निराशा हाथ लगी. केजरीवाल ने उससे हिमायत चाही और उसने उन्हें दिया भी लेकिन वह ‘आम आदमी पार्टी’ से भी मायूस है क्योंकि आंदोलन अब सत्ता का लिबास पहन चुका
है जिसकी राजनीति से सत्ता परिवर्तन संभव है, व्यवस्था परिवर्तन नहीं।
आगामी चुनाव पर इसका असर साफ दिखाई पड़ सकता है. -डॉ। रंजन ज़ैदी


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