कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई/ज़फर नक़वी

जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद
हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और
समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में
सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम
कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए
और वे भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत
बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट
ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बटवारा किया, वह  अनुचित और अमान्य है
अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्त
बनने और दिखाने की जो तात्लिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है।
यह बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट अंतिम पड़ाव होने की वजह से
प्रतिक्रियाएं अभी उन्माद में परिवर्तित नहीं हुई हैं लेकिन उत्तर प्रदेश
विधान सभा चुनाव नज़दीक आते-आते इनके उन्मादी होने की प्रबल संभावनाएं
नज़र आ रही हैं। भले ही राजनीति की बिसात पर यह प्रयास चारों खाने चित हो
जाएं।
कुल मिलाकर यही सार निकला है कि अयोध्या विवाद का वर्तमान फैसला सभी
पक्षों को किसी न किसी रूप में स्वीकार्य नहीं है। इसलिए मस्जिद के
पक्षकारों पर यह आरोप लगाना कि उन्हें हाई कोर्ट का फैसला मान्य नहीं है
इसलिए बात आगे नहीं बढ़ पा रही है, गलत है। क्योंकि मुसलमान अगर उक्त
फैसले को मान भी लें तो भी मन्दिर के पक्षकारों को ज़मीन का वर्तमान
विभाजन स्वीकार्य कहां है? जो लोग फैसले को राष्ट्रीय एकता और सौहार्द की
बेहतरीन मिसाल बता रहे थे, वही अब कह रहे हैं कि उक्त स्थान पर मस्जिद को
दी गयी भूमि स्वीकार नहीं। जिस प्रकार मन्दिर के पक्षकार भांति-भांति की
बोलियां बोल रहे हैं, उसी प्रकार मस्जिद के पक्षकारों की ओर से आवाज़ें आ
रही हैं। कुल मिलाकर अयोध्या विवाद 60 वर्ष पूर्व वाली स्थिति में ही आ
गया है।
शायद इसका सर्वमान्य हल सर्वोच्च न्यायालय में ही निहित हो। इसकी बड़ी
वजह यह है कि मुसलमान पक्षकार यह कह रहे हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट को
काज़ी मान रहे हैं। क्योंकि काज़ी का फरमान मानना पड़ता है। इसलिए
सुप्रीम कोर्ट भी अगर कानून व दस्तावेज़ को दरकिनार कर आस्था को
प्राथमिकता देगी तो भी मुसलमानों को वह मान्य होगा, चाहे विवशपूर्वक ही
सही। फिर, आखिर मन्दिर समर्थक सुप्रीम कोर्ट जाने से क्यों बचना चाहते
हैं? यह ठीक है कि विवाद पर अंतिम फैसला आने में समय लगेगा लेकिन इससे
फिर किसी के मन में कुंठा तो नहीं रहेगी।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का नया विचार सामने आया है कि ‘मुसलमान
अयोध्या फैसले को भावनात्मक रूप से स्वीकार करें, सुप्रीम कोर्ट जाने का
इरादा छोड़ें तो फिर उनसे सुलह की बात होगी।’ यद्यपि गुपचुप तरीके से
संघ के लोग मुसलमानों से बात कर रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से वे  ऐसी
बातें कर रहे हैं जिसमें अप्रत्यक्ष चेतावनियों की गंध आ रही है। तो फिर
सुलह और बातचीत वे किस आधार पर करेंगे, यह स्पष्ट नहीं है, दूसरी ओरवे 
यह भी कह रहे हैं कि मस्जिद-मन्दिर से उनका लेना-देना नहीं, इसका फैसला
तो संतों की उच्चस्तरीय परिषद करेगी। बहरहाल, अयोध्या विवाद को लेकर फिर
उसी प्रकार के विचार सामने आ रहे हैं जो विगत 18 साल से सामने आ रहे थे।
अब जो लोग इस विवाद का हल संसद में कानून बनाकर निकालने पर जोर दे रहे
हैं और उसके लिए शाहबानो प्रकरण का उदाहरण पेश करते हैं वे जानबूझकर या
अनजान बन इस प्रकार की अज्ञानता की बात करते हैं। दरअसल शाहबानो का मामला
मुस्लिम व्यक्तिगत कानून की गलत व्याख्या से जुड़ा था, उसे कानून बनाकर
दूर किया गया। उससे कोई भी अन्य वर्ग प्रभावित नहीं हुआ। अभी हाल में ही
हिन्दू कानून में संशोधन कर उसमें पारिवारिक संपत्ति में लड़की को भी
भागीदार बनाया गया, इस पर किसी दूसरे का न कोई विरोध है और न मतलब। जबकि
अयोध्या विवाद दो धर्मों के बीच का मामला है। संसद इस पर अगर कानून बनाती
है तो यह मनमानी की श्रेणी में आएगा। अब इस बात पर यह दलील दी जाए कि इस
देश में बहुसंख्यक अपनी आस्था को लेकर ऐसा भी नहीं कर सकता तो फिर क्या
वह ईरान, पाकिस्तान और इराक में करेगा? बिल्कुल ठीक बात, बहुसंख्यक को
पूरा अधिकार है मनमानी करने का, जैसा कि अन्य देशों में होता है लेकिन
अपने कानून और संविधान बदलकर ही ऐसा हो सकता है। मैंने अपने पिछले लेख
में भी लिखा था कि हमारी सरकारें व्यवहार में धर्मनिरपेक्ष नहीं है, बस
संविधान के पाठ में धर्मनिरपेक्ष हैं। इसलिए संविधान से अगर धर्मनिरपेक्ष
शब्द निकाल दिया जाए तो बुराई क्या है? ऐसा करके आसानी से यह मामला हल हो
जाएगा। संसद फिर कानून बनाने के लिए भी स्वतंत्र होगी। कुछ अल्प
बुद्घिजीवियों की ओर से यह सवाल भी आता है कि अयोध्या में मस्जिद बनाने
वाले मुसलमान क्या मक्का में मंदिर बनाने देंगे। अरे भाई, मक्का हो या
मदीना, भारतीय मुसलमानों के बाप की जागीर नहीं, इसका जवाब तो सऊदी शासक ही
देंगे। मुसलमानों का मक्का से लगाव इस कारण है कि वो वहां हज करने जाते
हैं। मुसलमान होने की कोई रियायत वहां नहीं मिलती, पासपोर्ट नहीं होगा तो
जेल में ठूंस दिये जाएंगे। अब यह आरोप कि सारी दुनिया के मुसलमान आपस में
भाई हैं औरवे  मुस्लिम-जगत की ही बात करते हैं। मुसलमान और इस्लाम के
नाम पर सब एकजुट हो जाते हैं। मानवीय अधिकारों के हनन और अत्याचार व शोषण
के खि़ला$फ आवाज़ उठाना सबका अधिकार है। विदेशों में उपभोक्ता वस्तुओं
में हिन्दू देवी देवताओं के चित्रों के आपत्तिजनक उपयोग का विरोध हमने भी
किया। वर्षों से ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया, मलेशिया आदि देशों के
स्थायी नागरिक बन चुके हिन्दुओं पर वहां होने वाले नस्ली भेदभाव और हिंसा
पर भारतीय हिन्दू जनमानस भी विरोध करता है। विगत दिनों मलेशिया और
आस्ट्रेलिया में हिन्दूओं के साथ होने वाले भेदभाव पर तो प्रधानमंत्री तक
को हस्तक्षेप करना पड़ा था। यद्यपि वे उन देशों का आंतरिक मामला था,
लेकिन हम इसके विरूद्घ नहीं हैं, क्योंकि ऐसा विरोध उचित है। विश्व
बंधुत्व की भावना बुरी चीज़ नहीं है। बल्कि उचित यही है कि हिन्दू हो या
मुसलमान, अगर विदेशों में उनके साथ भेदभाव है या अत्याचार हो रहा है तो
पूरे भारतीय समाज को एकजुट होकर उसका विरोध करना चाहिए। यह प्रवृत्ति अगर
मजबूत होगी तो भारतीय समाज और अधिक एकजुट होगा और एक-दूसरे की भावनाओं को
अच्छे ढंग से समझने का मौका मिलगा।
मैं समझता हूं कि शर (लड़ाई-झगड़े) के स्थान पर नमाज़ नहीं हो सकती।
इसलिए अयोध्या की ज़मीन अगर मेरी व्यक्तिगत जागीर होती तो मैं
‘सर्वधर्मसम्भाव’ के अंतर्गत हिन्दुओं को सौंप देता, लेकिन समस्या यह है
कि अयोध्या विवाद आस्था कम जिद्द का मामला ज्यादा बन गया है, चाहे इस
सच्चाई को कोई स्वीकार करे या न करे। सन पचास के बाद पैदा हुई नस्ल तो
जानती भी नहीं थी कि अयोध्या में कोई विवादित स्थल भी है। क्योंकि इस
मामले में न कोई शोर था, न आंदोलन। यह विशुद्घ रूप से स्थानीय मामला था।
ऐसा नहीं है कि जो संगठन आज सक्रिय हैं, पहले नहीं थे. वे तब भी थे और
अयोध्या विवाद की वास्तविकता भी जानते थे। लेकिन सारा खेल तो परिसर का
ताला खुलने के बाद शुरू हुआ। उस समय भी मस्जिद के बाहर बने चबूतरे को
गर्भगृह बताया गया था और वहां से मंदिर बनाने की बात थी। लेकिन उस समय
कुछ तथाकथित मुस्लिम नेता अड़ गये कि मस्जिद के बाहर सारी ज़मीन हमारी
है। बस फिर क्या था, मिल गया मुद्दा। सत्ता तक पहुंचने और समाज को उन्मादी
बनाने का इससे अच्छा कोई मौका ही नहीं था।
अयोध्या में भव्य मंदिर बने इससे मुसलमानों को क्या एतराज़ हो सकता है और
क्यों हो, राम को ‘इमामे हिन्द’ लिखने वाले शायर अल्लामा इक़बाल मुसलमान
ही थे। इसलिए यह आरोप लगाना कि मुसलमान हिन्दू भावनाओं या उनके धर्म का
आदर नहीं करते, सर्वथा अनुचित है। इस्लाम की मौलिक शिक्षा यही है कि
दूसरे धर्मों का मज़ाक न उड़ाओ, उनके महापुरुषों को बुरा न कहो, क्योंकि
जवाब में जब वह तुम्हारे महापुरुषों को बुरा कहेंगे तो तुम्हें कैसा
लगेगा? अब अगर कोई मुसलमान ऐसा करता है तो बुराई उसमें है, धर्म में नहीं।
मुसलमान तो शराबी, जुआरी, चोर, डकैत, हत्यारे और दूसरे के अधिकारों को
मारने वाले अतिवादी भी हैं। जबकि इस्लाम ने इन सारी बुराइयों के लिए
इस्लामी कानून के अनुसार कठोरतम सज़ा निर्धारित की हुई है और ऐसे लोगों
से दूर रहने को कहा है। इसलिए धर्म अलग चीज़ है और उसको मानने वाले का
व्यवहार बिल्कुल अलग चीज़ है।
इस देश में करोड़ों लोगों की इच्छा यही है कि अयोध्या में मंदिर-मस्जिद
साथ-साथ बनें और यह विवाद सदा के लिए समाप्त हो लेकिन जब आस्था पर
राजनीति हावी हो जाए तो फिर आस्था असीमित हो जाती है। यही वजह है कि
हिन्दुओं की बड़ी आबादी मूर्तिपूजक नहीं है। वे भगवान राम को नहीं मानते,
लेकिन अयोध्या मामले में सब एक हैं क्योंकि यह दो वर्गों के बीच का विवाद
है। इसलिए न मानते हुए भी सब आस्था का गान कर रहे हैं। वैसे मेरा मत यही
था कि कानून व दस्तावेजों के अनुसार हाईकोर्ट का फैसला मुसलमानों के हक
में आएगा। उसके बाद मुसलमान सार्वजनिक घोषणा करके उदारता और सहिष्णुता के
साथ उपरोक्त स्थान हिन्दुओं को दे देते और उसके बदले वे मुसलमानों के
कल्याणकारी कार्यों में प्रबल सहयोग की हिन्दुओं से अपेक्षा करते। लेकिन
विवादित भूमि के विवादित फैसले से सारी बात बिगड़ गयी। उपरोक्त विचार
मेरी भावना से सम्बद्ध थे क्योंकि मैं किसी पक्ष का समर्थक नहीं और न ही विरोधी। एक
निष्पक्ष लेखक के जो विचार हो सकते थे, वही मेरे विचार. क्योंकि मैं
सर्वधर्मसम्भाव में विश्वास रखता हूं। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता में नहीं,
जैसा कि हमारी सरकारें हैं। सर्वधर्मसम्भाव की भावना को मेरा धर्म भी
स्वीकृति प्रदान करता है और यह भावना धर्मनिरपेक्षता के ढकोसलों और
दिखावों से कहीं ज्य़ादा सशक्त और प्रबल है। इसलिए मस्जिद-मंदिर विवाद पर
जब तक राजनीतिज्ञों और तथाकथित धर्म के ठेकेदारों का साया रहेगा, तब तक यह
विवाद हल नहीं होगा क्योंकि यह उनकी राजनीति और सत्ता प्राप्ति का
केन्द्र बिंदू है।
(लेखक: वरिष्ठ पत्रकार हैं)

टिप्पणियाँ

  1. पूरी तरह से एकतरफा लेख... नेता पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष नहीं है, ऐसा होता तो पर्सनल कानून लागू न किये जाते..
    दरअसल शाहबानो का मामला
    मुस्लिम व्यक्तिगत कानून की गलत व्याख्या से जुड़ा था, उसे कानून बनाकर
    दूर किया गया। उससे कोई भी अन्य वर्ग प्रभावित नहीं हुआ।
    जजों से भी अधिक काबिल हो गये संशोधन का फैसला कराने वाले.
    प्रभावित हुईं वे स्त्रियां जिनके मां-बाप मुस्लिम थे और जो शाहबानो जैसी स्थिति का शिकार हुई.

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