पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-( 9 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी

यमुना का पुराना पुल
     पुरानी कहावत है कि 'बस्ती मांगे तीन बल, बादल, दरिया, हाकिम-दल।' किसी भी नये शहर के लिए ये तीन चीज़ें महत्वपूर्ण हुआ करती हैं-बादल, जिससे किसान की किस्मत जुड़ी होती है उसके पानी से जीवन का रिश्ता जुड़ा होता है। दरिया यानी नदी, जीवन चाहे मानस का हो या पशुओं का, उसे हमेशा दरियाओं की ज़रूरत रही है। इसीलिए दुनिया भर की सभ्यताओं का जन्म भी  दरियाओं के किनारे ही  हुआ है। वे नगर पहले-फूले और फैले भी तो दरियाओं के किनारे ही । आज की दिल्ली को भी हमारे पूर्वजों ने यमुना नदी के किनारे ही बसाया था। यह भी प्रकृति का कू्र और शाश्वत सत्य है कि दरिया कभी भी एक स्थान पर टिका नहीं रह सका है। वह सरकता रहता है। कारण यह है कि दरिया मिट्टी को अपने साथ लाता है और मिट्टी ही तलहटी को ऊंचा उठाती है, इसीलिए बहता पानी अपने आप सरकटा हुआ आगे बढ़ने लग जाता है। यमुना भी पूर्व दिशा की ओर लगातार सरकती ही जा रही है और यह सिलसिला इसके उद्गम से ही निरंतर जारी है. हाकिम जो शहर का प्रशासक हो और  जिसके बगैर व्यवस्था नहीं चलाई जा सके।
जहाँनाबाद दिल्ली की 'जामा मस्जिद जहांनुमा'

      1240 ई.पूर्व सूफ़ी संत हज़रत तुर्कमान शाह का हुजरा यमुना के किनारे पर ही हुआ करता था। बाद में उनका मक़बरा भी उसी स्थान पर बनवाया गया जहाँ पर वह दफन थे. आज का तुर्कमान गेट उन्हीं की स्मृति की याद ताजा करता है। यहीं से कुछ दूर यमुना किनारे बेगम रज़िया सुल्तान का मक़बरा हुआ करता था। अब न दरिया है, न पुराने वक़्तों का तुर्कमान गेट. आज दरियाये-यमुना तुर्कमान गेट से मीलों दूर छिटक चुकी है।
बेगम रज़िया सुल्तान का मक़बरा बाजार सीताराम से पहाड़ी भोजला की ओर मुड़ने वाली पहाड़ी सड़क की गुंजन आबादी वाले मोहल्ले की शुरुआत में ही अवस्थित है.
      बात  शाहजहाँ के दौर की है.  लाल किले के सामने फतेहपुरी मस्जिद तक जो नहर बनी हुई थी, उसके इर्द-गिर्द बसाये गए बाजार का नाम मीना बाजार था जिसमें केवल शाही व संभ्रांत परिवार की महिलाओं को ही जाने की अनुमति थी. यह बाजार इतना खूबसूरत था कि चीनी सैलानी निकोलाई मिनोची भी इसकी प्रशंसा किये बगैर नहीं रह सका.
         
     
चीनी यात्री निकोलाई मिनोची (1650) जब दिल्ली पहुंचा तो उसने शाही फ़रमान सुना कि शाही नहर में ऐसी सुनहरी मछलियों को छोड़ा जाये जिनके उठे हुए सिफ़नों को सोने की अंगूठियां पहनाई जाएं और हर अंगूठी में एक अलग ही नग हो जैसे याकूत, मोती और दूसरे रत्न। 
      तत्कालीन ब्रिटिश यात्री फ्रैक्विंस ब्रिने ने भी अपनी पुस्तक ट्रैवलर्स इन द मुग़ल्स इम्पॉयर (एडी.1656-1668) में शाहजहांनाबाद का वर्णन किया है। अपने दिल्ली प्रवास के दौरान उसने शाहजहांनाबाद को बहुत निकट से देखा और जाना था। 
      वह लिखता है,‘किले के हर ओर बाग़ों और विश्राम-स्थलों में पीने के पानी की समुचित व्यवस्था थी तथा किले को खूबसूरत व बुलंद इमारतों ने तीन ओर से घेर रखा था। चौथी ओर यमुना बहती थी।
      चौड़ी और साफ-सुथरी सड़कों के किनारे हौज़, फ़व्वारे और बाग़ आंखों को ताज़गी प्रदान करते थे। किले के तहखाने में इतनी ठंडक होती थी कि नींद आजाये। किले से शहर को जोड़ती नहर को किले की बोली में नहरे-बहिश्त कहा जाता था। यह बात और है कि किले में एक और नहर है जो संगेमरमर में तराशी गई निर्माण-कला के इतिहास की अद्भुत मिसाल कही जा सकती है। उसे देखकर लगता था मानो कुदरत ने अपने हाथों से उसे तराशा हो।
      उसके अनुसार नहर शाहे-बुर्ज की बारादरी में आकर गिरती थी । मस्जिद जहांनुमा के निर्माण का कार्य शाहजहांनाबाद के बस जाने के बाद प्रारंभ हुआ था और इसमें सुरक्षा की दृष्टि से सुरंग के रास्ते तब केवल बादशाह और उसके हाली-मवाली ही नमाज़ पढ़ने आते थे । इसका पहला नाम जामा मस्जिद जहांनुमा था। वर्षों तक दुनिया की श्रेष्ठ मस्जिदों में इसकी गणना की जाती थी।

 
      1707 र्ई.पू से मुगलों के पतन की जो शुरुआत हुई, मुहम्मद शाह रंगीला (1718.48 ) के शासन काल तक पहुंचते-पहुंचते दिल्ली इतिहास के एक नये अध्याय का नया मर्सिया बन गई। ईर्ष्या, द्वेष, वैमनस्य और अधिकार की लड़ाई ने मुग़ल शाहज़ाादों और हरमसराओं की साज़िशों को एक ऐसे वातावरण में पहुंचा दिया जहां से वापस लौटने की उम्मीद समाप्त हो जाती थी।
      खज़ाने खाली हो चुके थे, सीमाएं सिकुड़ती जा रही थीं और अधिकार-क्षेत्र न्यून होते जा रहे थे। दूरदराज़ के राज्यों में जो मुग़ल साम्राज्य के प्रतिनिधि तैनात थे, वे अवसर का लाभ उठाकर एक-एककर आज़ाद होते जा रहे थे। यह एक भयानक त्रासदी शुरुआत थी।   
      इस प्रकार के हालात ने मुल्क की सरहदों की फसीलों को कमज़ोर कर दिया। यही कारण था, सरहदों के पार 1739 ई.पू. नादिरशाह ने हिन्दुस्तान पर हमला कर दिया और करनाल होता हुआ दिल्ली में दाखिल हो गया। दिल्ली को फ़तह करने में उसे कोई दिक़्क़त नहीं हुई. उसने जी भरकर दिल्ली को लूटा, कत्ले-आम किया और लाल किले से शाहजहां का बेशक़ीमती तख्त तख्ते-ताऊस  उठा ले गया। इसमें 1250 किलो सोना और बेशक़ीमती हीरे-जवाहरात का इस्तेमाल किया गया था। लूट के सामान को ले जाने के लिए नादिरशाह को 700 ऊंटों और हाथियों का सहारा लेना पड़ा था।1631 ई.पू. की मुग़ल करंसी के हिसाब से तत्कालीन मुद्रा के रूप में 50 लाख रुपये खर्च किये गये थे जिसे  नादिरशाह लूटकर ईरान लौट गया. भारतीय तख्ते-ताऊस आज भी ईरान के पास है और उसने भारत को वापस नहीं किया है. 

        नादिरशाह की लूट के बाद अवाम की समझ में आगया था कि अब मुग़लों की तारीख का सूरज डूबने जा रहा है. अँगरेज़ व्यापारी सियासत में हिस्सेदारी कर लगातार अपनी ताक़त बढ़ाता जा रहा है. उसने नई हुकूमतों का एक नया मिकैनिज़्म डेवलप कर कोलकत्ता को अपना केंद्र बना लिया था. उस समय कोई भी ज्योतिषी यह भविष्यवाणी नहीं कर पाया था कि आकाश के पश्चिमी क्षितिज से भावी इतिहास का एक नया सूर्य  उदय होने जा रहा है जो हिदुस्तान को दो सौ वर्षों तक अपनी तपिश से झुलसाता रहेगा और इस देश के अवाम गुलामी की ज़ंजीरें पहने जलती ज़मीनों की पैमाइश करते रहेंगे।

     स्ट इंडिया कम्पनी प्रशासन के लिए इंग्लैंड की सरकार ने वॉरेन हेस्टिंग्स (1774 ई.पूर्व)  को हिन्दुस्तान का गवर्नर जनरल बनाकर भेजा। उन दिनों ईस्ट इंडिया कम्पनी की सभी तरह की गतिविधियों और अंग्रेज़ों की सत्ता का केंद्र कलकत्ता हुआ करता था। वॉरेन हेस्टिंग्स अपने पद पर बने रहकर 11 वर्षाें तक कोस्टल एरिया में ईस्ट इंडिया कम्पनी के व्यापारिक हितों की ओर ध्यान देता रहा। मद्रास, बम्बई और समुद्री तटों पर बसे शहरी क्षेत्रों व बंदरगाहों से व्यापारिक हितों के आलावा  उसके सामरिक हित भी जुड़े हुए थे। संयोग से ईस्ट इंडिया कम्पनी के हितों को देखते हुए ही ब्रिटेन की हुकूमत को भरतीय उप-महाद्वीप के रूप में एक ऐसा हीरा मिल गया था जो क्वीन ऑफ़ इंग्लैंड के ताज को सुशोभित करनेजा रहा था।   
      वॉरेन हेस्टिंग्स ने 1785ई. से पहले तक कल्पना भी नहीं की थी कि राजधानी के रूप में कलकत्ता के स्थान पर किसी अन्य शहर को लेकर सोचा भी जा सकता है। बदलती परिस्थितियों के बीच ईस्ट इंडिया
'जामा मस्जिद जहांनुमा' दुनिया की श्रेष्ठ मस्जिदों में से एक
कम्पनी
के बड़े और ताक़तवर अधिकारी कलकत्ता को राजधानी के रूप में अब दबे-छुपे महलों में नापसंद करने लगे थे क्योंकि उन्हें इस शहर में कहीं न कहीं व्यावसायिकता का अहसास होने लग गया था।
      अब वे हिन्दुस्तान जैसे विशाल उप-महाद्वीप की राजधानी ऐसी जगह बना लेना चाहते थे, जहां खुलापन, सुन्दर वातावरण और सभ्य व सुसंस्कृत परिवेश हो तथा वहां रहने योग्य ऐम्बियंस भीे। 

      कलकत्ता से ऊबते जाने के कुछ दूसरे कारण भी पनपते जा रहे थे जो अंग्रेज़ों को वहां से उखड़ने के लिए प्रेरित करने लगे थे. वे चाहते थे कि दिल्ली अब मुग़लों की गिरफ़्त से कमज़ोर होता जा रहा है और वह ईस्ट इंडिया कम्पनी के हितों को ध्यान में रखते हुए एक बेहतर केंद्रीय विकल्प के रूप में निशाने पर रखा जा सकता है. लेकिन सच्चाई यह  भी है कि बंगाल के अधिक प्रभावशाली लोग राजधानी के स्थानांतरण के नितांत विरुद्ध थे। उधर कलकत्ता में अपनी जड़ें जमा चुके संभ्रांत अंग्रेज़ों में भी एक ऐसा वर्ग विरोध में उभर रहा था जो नहीं चाहता था कि  वे कलकत्ता से उखड़कर किसी नए शहर में जाकर बसें और उसे नई राजधानी का दर्ज दें। (क्रमशः जारी /-10)
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पाठकों से- अपने इस ब्लॉग के माध्यम से मेरा उद्देश्य है कि मैं लिखित/अलिखित इतिहास से सम्बंधित अधिक से अधिक मौलिक जानकारियां पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास करूं । इसी के सन्दर्भ में अगले पड़ावों पर हम शीघ्र ही आपको दिल्ली के बारे में ऐसी दिलचस्प जानकारियां  उपलब्ध कराने का प्रयास करेंगे जो अभी तक प्रकाश में नहीं आई  हैं.अपनी प्रतिक्रिया से हमें निरंतर अवगत कराते रहें , यही मेरे श्रम का मूल्य है. पाठक सीधे तौर पर भी मुझसे इस नंबर +91 9350934635 पर संपर्क भी  कर सकते हैं . 
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