इतिहास के झरोखे से --रंजन ज़ैदी* (1 2 )



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इतिहास के झरोखे से --रंजन ज़ैदी*

गतांक से आगे-12   
विद्रोह का अंकुर चूंकि किले में ही फूटा था, इसलिए अंग्रेजी सरकार की रणनीति में इस बात को प्रमुखता दी गई कि सर्व-प्रथम मुग़ल-बादशाहत के ज़िंदा अवशेषों और उसके फुसले को सदैव के लिए समाप्त करना ज़रूरी है ताकि अवाम में आज़ादी की कोई भी बारीक से बारीक उम्मीद भी बाकी न बच सके।
      अतः विद्रोह की विफलता के बाद अंग्रेज़ों ने बड़े इत्मीनान से मुस्लिम समुदाय का दमन करना शुरू किया।बहादुर शाह ज़फ़र को अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने और विद्रोहियों का नेतृत्व करने के अपराध में गिरफ़तार कर एक विशेष जांच आयोग के सामने पेश किया गया. विशेष जांच आयोग ने सोची-समझी योजना के अंतर्गत बादशाह के विरुद्ध जांच किये जाने के आदेश दिये। इसके तहत 31 दिनों तक बादशाह को जांच आयोग के सामने अपनी पेशी लगवानी पड़ी और गवाहों की लम्बी कतार का सामना करना पड़ा. सबूत इतने थे कि समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहे थे. 'बादशाह सलामत' रफ्ता-रफ्ता फाईलों के बोझ के नीचे दबते चले गए. उन्हें मुक़दमे की सुनवाई के दौरान लगातार पेश होना पड़ता, तरह तरह से अपमान सहना पड़ता, वह अलग।                                                 आखिरी मुग़ल : बहादुरशाह ज़फ़र रंगून की जेल में 
मुग़लों के अंतिम बादशाह
      अंततः मुकदमे के फैसले की घडी आ गई । फैसले में मुग़ल बादशाह को जिलावतन कर उन्हें  रंगून की जेल में भेजे जाने का हुक्म सुना दिया गया। यही नहीं बल्कि बादशाह के वालीअहद मिरज़ा जवांबख्त को भी उनके साथ ही जेल में भेज दिया  गया।

     हादुर शाह 
ज़फर  का जन्म  दिल्ली में ही 24अक्टूबर 1775 में हुआ था.  उनकी माँ का नाम लाल बाई और पिता का नाम अकबर  शाह सानी था. अपने पिता की मृत्यु (28 सितम्बर1837) के बाद वह 62वर्ष की उम्र में दिल्ली की गद्दी पर तख़्त-नशीन हुए. तबतक  मुग़ल सल्तनत की हदें किले की  दीवारों के बाहर नहीं रही थीं.  बादशाह बूढा हो चुका था. नेतृत्व की क्षमता और हुकूमत करने की इच्छाशक्ति लगभग ख़त्म सी हो चुकी थी। फिर भी बागी सेनाऍ अपने बादशाह के नेतृत्व में अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक बड़ी और निर्णायक जंग जीतना चाहते थे. वे चाहते थे कि बादशाह उनका नेतृत्व करे. लेकिन बादशाह खुद को इस ज़िम्मेदारी के योग्य नहीं समझता था. इसके बावजूद उसने अपने मुकुट की लाज रखने के उद्देश्य से 12 मई को आखरी मुग़ल ने दरबारे-आम को सम्बोधित कर आज़ादी की जंग को उचित ठहराते हुए आह्वान किया कि हमलावर अंग्रेज़ों से मुल्क को आज़ाद किया जाये।
        हुक्मे-शाही के बाद बाग़ी फौजियों ने आज़ादी की जंग की शुरुआत 52 यूरोपीय बंदियों को बादशाह के महल के सामने उनकी इच्छा के विरुद्ध क़त्ल कर देने से की। इस वारदात का सन्देश अंग्रेज़ों तक ऐसा गया मानो मुग़ल बादशाह हिंदुस्तान से अंग्रेज़ों का पूरी तरह से सफाया कर देना चाहता हों. परिणाम यह हुआ (जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है)  कि ईस्ट इंडिया कंपनी  ने बादशाह पर मुक़दमा दायर कर उन्हें अदालत के कटघरे में घसीट लिया।
        जिस समय बहादुरशाह ज़फर  के सामने अदालत ने उम्र-कैद की सजा और जिलावतनी का हुक्म सुनाया,  बादशाह ने गहरी सांस लेकर अपनी ऑंखें मूँद लीं.  इस जिलावतनी के सफर में जिस समय कोलकता से पानी के रास्ते बादशाह को रंगून भेजा जा रहा था, उस समय परिवार के रूप में ३५ स्त्री-पुरुषों का काफला भी उनके साथ कर दिया गया।
      उस दिनों रंगून का प्रशासक  अंग्रेजी सरकार के न्यायविद की ज्यूरी के इस फैसले से स्तब्ध था. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि बादशाह के इतने बड़े परिवार को वह कहाँ रखे। निश्चय ही वह विवेक की एक दुर्लभ घड़ी रही होगी. काफी सोच-विचार के बाद तत्कालीन सम्बधित अंग्रेज़ अधिकारी ने कंपनी बहादुर के कानून की परवाह किये बिना बहादुरशाह ज़फर को अपने ही बंगले के गेराज में रहने की अनुमति प्रदान कर दी जहाँ अपदस्त बादशाह अपने परिवार के साथ 1858  से 1862 तक सजा काटता रहा.  दुर्भाग्य यह कि रंगून के उसी छोटे से गेराज में आखिरी मुग़ल बहादुरशाह ज़फर का 7 नवम्बर 1862 को देहावसान हो गया. उस समय उनके पास पुरुषों में शहज़ादा जवाँबख्त और उनके गुरू हाफिज मुहम्मद इब्राहीम देहलवी मौजूद थे जिन्होंने वहीं उनके जनाज़े की नमाज़ अदा की. कारण यह था कि तत्कालीन अँगरेज़ अधिकारी नहीं चाहता था कि बादशाह के शव यानि जनाज़े को शहर के बीच से होकर कब्रिस्तान तक ले जाया जाये, इसलिए उसने उन्हें उसी गेराज में दफ्न करने की अनुमति दे दी.

 19वीँ शताब्दी के उत्तरार्द्ध में खबर है कि हावड़ा (कोलकत्ता) क्षेत्र में अवस्थित झोपड़-पट्टी में रह रही सुल्ताना बेगम खुद को शाही परिवार से सम्बन्ध रखने वाली राज-वधू  बताती हैं.  60 वर्षीय सुल्ताना बेगम पर भरोसा किया जाये तो उनका निकाह 1965 में आखिरी मुग़ल बहादुरशाह ज़फर के पड़पोते मिर्ज़ा बेदार बख्त से हुआ था जिनका  1980 में देहावसान हो गया था. बताते हैं कि अपने जीवन में वह साईकिल पर गश्त लगाते हुए चाकू-छुरियों पर धार रखने का काम किया करते थे.  घर का खर्च चल जाता था लेकिन जब वह नहीं रहे तो सुल्ताना बेगम के हाथों से तोते उड़ गए.  घर की ज़िम्मेदारी उनके अपने कन्धों पर आ गई. अब बच्चों की आजीविका के लिए जनता-नल पर झूठे बर्तन मांजने और साँझा चूल्हे पर रोटियां सेंकने में उन्हें शर्म नहीं आती है.            
1857 का विद्रोह : दिल्ली कैन्टोमेंट एरिया
       
          बताते हैं कि 2010 तक सरकार उन्हें मात्र ४०० रूपये पेंशन के  देती थी लेकिन काफी प्रयास के बाद उन्हें सरकार 6000 रूपये देने पर रज़ामंद हो गई.  अब वह अपनी अविवाहित बेटी मधु बेगम के साथ रहती हैं. दूसरी बेटी विवाहित है और उसकी 5 बेटियाँ हैं.  वह भी अपने परिवार के साथ अभावग्रस्त जीवन जीने के लिए अभिशप्त है.  अत्यधिक प्रयास के बाद केंद्रीय सरकार ने अब कहीं जाकर इस परिवार की  पोती रोशन आरा को नौकरी दी है जिससे परिवार का खर्च चलता है. अंतराष्ट्रीय स्वयंसेवी संगठनों के दबाव पर सुल्ताना बेगम के परिवार को रेड-लाईट  एरिये में रहने की जगह दी गई जहाँ से वहाँ के दलालों ने उन्हें भगा कर उनके आवास पर ही कब्ज़ा कर लिया। ऐसी स्थिति में वे पुनः अपने पुराने ठिकाने पर लौट आये लेकिन यहाँ भी उनकी जवान बच्चियों को असामाजिक तत्त्व ठीक से रहने नहीं दे रहे हैं.
          खानदाने-मुग़लिया के बहुत से परिवार पाकिस्तान में आज भी कहीं न कहीं रहते हैं.  इसी उम्मीद पर 2010 में सुल्ताना बेगम पाकिस्तान भी  गयीं लेकिन उन्हें रिश्तेदारों के बारे में खास जानकारी नहीं मिली। अलबत्ता इस्लामाबाद प्रवास के दौरान पति मिर्ज़ा बेदार बख्त के दोस्त से अवश्य मुलाकात हुई जिनसे पता चला कि मुग़ल बादशाह के रिश्तेदार दुनियाभर में है लेकिन कोई किसी से संपर्क नहीं करता है. सुल्ताना बेगम उस राज़ पर से भी पर्दा हटाती हैं जिसमें बताया जाता है कि मौलाना अबुलकलाम आज़ाद और सुभाष चन्द्र बोस के निजी प्रयासों से अंग्रेज़ों ने बेदार बख्त को हिदुस्तान में इस शर्त पर आने की अनुमति दी थी कि वह इस बात का रहस्योद्घाटन नहीं करेंगे कि उनका सम्बन्ध खानदाने-मुग़लिया से है और वह दिल्ली के स्थान पर कोलकता में अपनी रिहाईश का प्रबंध करेंगे।        
          १९२० में उन्हें गुज़र-बसर के लिए ब्रिटिश सरकार की ओर से १० रूपये वसीक़ा भी दिया जाने  लगा था, बाद में यही वसीक़ा १६ रूपये कर दिया गया. रौनक़ ज़मानी बेगम (बेदार बख्त की बेटी) अपनी वालिदा के हवाले से अपने संस्मरण सुनाते हुए बताती हैं कि उनके वालिद को १९२५ में फूलों की टोकरी में छुपाकर रंगून से हिंदुस्तान लाया गया था.               (क्रमशः जारी/-13)  
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पाठकों से- ब्लॉग पर यह मेरा पहला प्रयोग है. मेरा उद्देश्य है कि मैं अपने कार्य के माध्यम से अधिक से अधिक पाठकों तक अपनी पहुँच बना सकूँ। अगले पड़ावों पर हम शीघ्र ही आपको दिल्ली के बारे में ऐसी दिलचस्प जानकारियां देने जा रहे हैं कि आप भी आश्चर्य-चकित रह जाएंगे, शर्त यही है कि इस पुस्तक की हर कड़ी को आप पढ़ना न भूलें। पाठक सीधे तौर पर भी मुझसे इस नंबर +91 9350934635 पर संपर्क कर सकते हैं -कापीराईट : लेखकाधींन.

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