इतिहास के झरोखे से--रंजन ज़ैदी* ( 10 )
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(इतिहास के झरोखे से ) --रंजन ज़ैदी* ( 10 )
बात तो होगी ही
‘Gahe-Gahe baz khwan een qissae-parinah raa’/गाहे-गाहे बाज़ ख्वां ईं क़िस्स-ए-पारीनह रा।’ (क़िस्सों को कभी-कभी दोहराते रहना चाहिए।)
गतांक से आगे-10
वॉरेन हेस्टिंग्स ने 1785ई. से पहले तक कल्पना भी नहीं की थी कि राजधानी के रूप में कलकत्ता के स्थान पर किसी अन्य शहर को लेकर सोचा जा सकता है। ईस्ट इंडिया कम्पनी के बड़े और ताक़तवर अधिकारी कलकत्ता को राजधानी के रूप में अब नापसंद करने लगे थे क्योंकि उन्हें इस शहर में व्यावसायिकता का अहसास होने लगा था।
वे हिन्दुस्तान जैसे विशाल उप-महाद्वीप की राजधानी ऐसी जगह बनाना चाहते थे जहां खुलापन, सुन्दर वातावरण और सभ्य व सुसंस्कृत परिवेश हो तथा वहां रहने योग्य ऐम्बियंस भीे। कलकत्ता में कुछ दूसरे कारण भी थे जो अंग्रेज़ों को वहां से उखड़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे लेकिन बंगाल के अधिक प्रभावशाली लोग राजधानी के स्थानांतरण के नितांत विरुद्ध थे। अंग्रेज़ों में भी एक ऐसा वर्ग था जो नई राजधानी का विरोध कर रहा था।
उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को देखा जाये तो उनमें लॉर्ड करज़न कलकत्ता के स्थान पर उत्तर प्रदेश के शहर आगरा और लॉर्ड लारेंस दिल्ली को राजधानी बनाने के पक्षधर थे। लॉर्ड हार्डिंग, लारेंस का समर्थन करता था। इनके आलावा हिन्दुस्तान में अंग्रेज़ी सरकार का प्रशासनिक-तंत्र एक कौंसिल के द्वारा संचालित होता था जिसके एक महत्वपूर्ण सदस्य सर जॉन जैकेंज़ थे जिन्होंने लॉर्ड हार्डिंग को इसी विषय पर 1911 ई. में एक पत्र लिखा था- ‘ताज बरतानिया को इस समय एक महत्वपूर्ण और साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता है जिससे न केवल विश्व सहमत होगा बल्कि एशिया उप-महाद्वीप में एक नये युग की शुरुआत भी होगी। हिन्दुस्तान के अवाम के मन-मस्तिष्क में सदैव से दिल्ली शक्ति और अधिकार का केद्र रहा है, उन्हें यह निर्णय पसंद आयेगा और वे प्रसन्न भी होंगे।’
लॉर्ड हार्डिंग भी महसूस कर रहा था कि कलकत्ता में अंग्रेज़ी हुकूमत को लेकर बंगाल में दबी-घुटी राजनीतिक
बेचैनी पाई जा रही है जिसका उदाहरण शायद वहां की विधान-सभा में बंगाली प्रतिनिधियों का बढ़ता हुआ राजनीतिक वर्चस्व था। इसलिए उसने ब्रिटिश प्रबंधन सलाहकार समिति की स्वीकृति के लिए अपनी कुछ अनुशंसाएं भेजीं- वे हिन्दुस्तान जैसे विशाल उप-महाद्वीप की राजधानी ऐसी जगह बनाना चाहते थे जहां खुलापन, सुन्दर वातावरण और सभ्य व सुसंस्कृत परिवेश हो तथा वहां रहने योग्य ऐम्बियंस भीे। कलकत्ता में कुछ दूसरे कारण भी थे जो अंग्रेज़ों को वहां से उखड़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे लेकिन बंगाल के अधिक प्रभावशाली लोग राजधानी के स्थानांतरण के नितांत विरुद्ध थे। अंग्रेज़ों में भी एक ऐसा वर्ग था जो नई राजधानी का विरोध कर रहा था।
उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को देखा जाये तो उनमें लॉर्ड करज़न कलकत्ता के स्थान पर उत्तर प्रदेश के शहर आगरा और लॉर्ड लारेंस दिल्ली को राजधानी बनाने के पक्षधर थे। लॉर्ड हार्डिंग, लारेंस का समर्थन करता था। इनके आलावा हिन्दुस्तान में अंग्रेज़ी सरकार का प्रशासनिक-तंत्र एक कौंसिल के द्वारा संचालित होता था जिसके एक महत्वपूर्ण सदस्य सर जॉन जैकेंज़ थे जिन्होंने लॉर्ड हार्डिंग को इसी विषय पर 1911 ई. में एक पत्र लिखा था- ‘ताज बरतानिया को इस समय एक महत्वपूर्ण और साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता है जिससे न केवल विश्व सहमत होगा बल्कि एशिया उप-महाद्वीप में एक नये युग की शुरुआत भी होगी। हिन्दुस्तान के अवाम के मन-मस्तिष्क में सदैव से दिल्ली शक्ति और अधिकार का केद्र रहा है, उन्हें यह निर्णय पसंद आयेगा और वे प्रसन्न भी होंगे।’
लॉर्ड हार्डिंग भी महसूस कर रहा था कि कलकत्ता में अंग्रेज़ी हुकूमत को लेकर बंगाल में दबी-घुटी राजनीतिक
नई राजधानी दिल्ली के लिए स्वीकृति प्रदान की जाये।
कलकत्ता को प्रेसिडेंसी की श्रेणी में लिया जाये और विभाजित बंगाल को पुनः एक कर दिया जाये।
बिहार और उड़ीसा के लिए लेफ़िटेंट गवर्नर को नियुक्त करने की अनुमति प्रदान की जाये तथा पटना को इन दोनों प्रदशों की राजधानी बनाई जाये। एक उच्चायुक्त (प्रशासनिक-प्रबंधन) की नियुक्ति कर वहां के प्रशासन को अपने हाथ में वापस ले लिया जाये। अनुशंसाओं की तुरंत स्वीकृति देते हुए लंदन स्थित ब्रिटिश गृह-मंत्रालय ने किंग जार्ज पंचम
के दरबार की सूचना को गुप्त रखने का आदेश देते हुए मिस्ट्री-कैम्प के गठन
किये जाने की भी हिदायत दी और कहा गया कि शीघ्र ही इसे सेना और पुलिस का
सुरक्षा-कवच भी उपलब्ध कराया जाये।
1803 ई. तक दिल्ली पर अंग्रेज़ों का लगभग आधिपत्य हो चुका था लेकिन इसके बावजूद 1850 ई. तक तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने मुग़ल-शासन के अधीनस्थ इमारतों और गुंजान आबादी वाले मुहल्लों को ध्वस्त नहीं किया था। तत्कालीन सरकार जानती थी कि अधिक सख्ती से अंग्रेज़ी प्रशासन को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है जैसे 1830-48 ई. के दौरान पैरिस में जो हिंसक विद्रोह हुआ था और उसके बाद बॉयरन हरसमैन ने जो नीति अपनाई थी उसके अंतर्गत उस दमनकारी नीति के परिणाम स्वरूप काफ़ी तोड़-फोड़ की गई थी जिससे वहां के 15 हज़ार मकानों को ध्वस्त कर दिया गया था। इसके बाद ही सड़कों को चौड़ा और मुहल्लों को विस्तार देना पड़ा था ताकि भविष्य में सैनिक कार्यवाई के दौरान बाधाएं न खड़ी हो सकें।
इस तरह एक प्रकार से ब्रिटिश ऐडमिनिस्ट्रेशन ने पैरिस की घटना से नसीहत ली और बहुत सोच-समझकर कदम उठाये। जब समय आया तो 1857ई. के विद्रोह और उसके दमन के बाद मूलतः सामरिक दृष्टि से अंग्रेज़ी सरकार ने शहजहांनाबाद का मानचित्र तैयार कराया ताकि गुंजान इलाकों में सेना घुसकर विद्रोहियों को अपना निशाना बना सके। उस कार्यवाई के अन्तर्गत लाल किले के सामने और इर्द-गिर्द जो हज़ारों की संख्या में सम्भ्रांत लोगों के आलीशान महल, उनकी हवेलियां और कोठियां थीं, उन्हें बेहद निर्ममता और निष्ठुरता के साथ ध्वस्त कर दिया गया। आज उन्हीं जगहों पर रामलीला मैदान और पार्क बने हुए हैं। 15 अगस्त के दिन झंडा रोहण के समय इन्हीं खाली जगहों पर स्कूली छात्रों को लाया जाता है और किले की प्राचीर से देश के प्रधान मंत्री राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं।
1803 ई. तक दिल्ली पर अंग्रेज़ों का लगभग आधिपत्य हो चुका था लेकिन इसके बावजूद 1850 ई. तक तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने मुग़ल-शासन के अधीनस्थ इमारतों और गुंजान आबादी वाले मुहल्लों को ध्वस्त नहीं किया था। तत्कालीन सरकार जानती थी कि अधिक सख्ती से अंग्रेज़ी प्रशासन को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है जैसे 1830-48 ई. के दौरान पैरिस में जो हिंसक विद्रोह हुआ था और उसके बाद बॉयरन हरसमैन ने जो नीति अपनाई थी उसके अंतर्गत उस दमनकारी नीति के परिणाम स्वरूप काफ़ी तोड़-फोड़ की गई थी जिससे वहां के 15 हज़ार मकानों को ध्वस्त कर दिया गया था। इसके बाद ही सड़कों को चौड़ा और मुहल्लों को विस्तार देना पड़ा था ताकि भविष्य में सैनिक कार्यवाई के दौरान बाधाएं न खड़ी हो सकें।
इस तरह एक प्रकार से ब्रिटिश ऐडमिनिस्ट्रेशन ने पैरिस की घटना से नसीहत ली और बहुत सोच-समझकर कदम उठाये। जब समय आया तो 1857ई. के विद्रोह और उसके दमन के बाद मूलतः सामरिक दृष्टि से अंग्रेज़ी सरकार ने शहजहांनाबाद का मानचित्र तैयार कराया ताकि गुंजान इलाकों में सेना घुसकर विद्रोहियों को अपना निशाना बना सके। उस कार्यवाई के अन्तर्गत लाल किले के सामने और इर्द-गिर्द जो हज़ारों की संख्या में सम्भ्रांत लोगों के आलीशान महल, उनकी हवेलियां और कोठियां थीं, उन्हें बेहद निर्ममता और निष्ठुरता के साथ ध्वस्त कर दिया गया। आज उन्हीं जगहों पर रामलीला मैदान और पार्क बने हुए हैं। 15 अगस्त के दिन झंडा रोहण के समय इन्हीं खाली जगहों पर स्कूली छात्रों को लाया जाता है और किले की प्राचीर से देश के प्रधान मंत्री राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं।
1898 ई. में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ब्रिटिश चिंतक-विचारक और तत्कालीन चर्चित आर्किटेक्ट हॉवर्ड की एक पुस्तक प्रकाशित हुई,Tomorrow : A peaceful path to social reform इसी तरह उसकी एक दूसरी पुस्तक 4 साल बाद प्रकाशित हुई जो पहली प्रकाशित पुस्तक का सम्पादित और संशोधित संस्करण था। उसका नाम था Garden cities of tomorrow. इन
पुस्तकों का अध्ययन कर तत्कालीन ब्रिटिश आर्किटेक्ट ऐडविन लुईटन बहुत
प्रभावित हुआ। वह वैसे भी अकसर उससे मिलकर विभिन्न शहरी योजनाओं पर
विचार-विमर्श कया करता था। हॉवर्ड की शहरी विकास सम्बंधी परियोजनाओं की
परिकल्पना को लुईटन साकार करना चाहता था. तब तक उसे मालूम हो चुका था कि 'इंडिया' की राजधानी बदलने वाली है. उसने तुरंत अपने कुछ विश्वासपात्र अंग्रेज़ मित्रों
से संपर्क कर पता किया तो मालूम हुआ कि खबर गलत नहीं है. अंग्रेज प्रशासक हिन्दुस्तान की राजधानी कलकत्ता के
स्थान पर दिल्ली को बनाना चाहते हैं। कारण बहुत से थे। जैसे-
शिमला दिल्ली से दूर नहीं है और वहां गर्मियों में राजधानी को आसानी से शिफ्ट किया जा सकता थी।
दिल्ली मुगलों की राजधानी थी। उनके पतन के बाद अंग्रेज़ नहीं चाहते थे कि देश अब उनके उनके आगे कोर्निश
करे, झुके।
वे चाहते थे कि अब एक ऐसी दिल्ली बसे जहां मुगलों का कोई नामलेवा न हो, कोई इमारत न हो, कोई मुहल्ला, गलियां-चौबारे न हों। हर कण से जो किरण फूटे, वह इंग्लैंड की महारानी के मुकुट में जड़े हीरे की चमक का अहसास कराये।
1857 के विद्रोह के भयानक नतीजों का अंग्रेज़ेां को शिद्दत से अहसास था। वे जानते थे कि आग बुझी नहीं है, राख के नीचे ज़रूर आई है, जिसे मुगल-समर्थक कभी भी हवा दे सकते हैं। इसलिए उन्हें अब मुग़ल-युग और मुग़लों के गुरूर का ही अंत करना होगा।
चूंकि दिल्ली, सैकड़ों वर्षों से राजनीति और सत्ता का केंद्र रही थी, इसलिए अंग्रेज़ दिल्ली को ही एक नये अरूसुल्बलाद बनाने और उसे बसाने पर दृढ़ संकल्प थे।
सामरिक दृष्टि से भी पुराने
शाहजहांनाबाद को काफ़ी ध्वस्त करने के बाद भी अंग्रेज़ी हुकूमत इस क्षेत्र
की गलियों, सड़कों और चौराहों को चौड़ा नहीं कर पाई थी.
इस नई परिकल्पना ने लुईटन को नई ऊर्जा से शराबोर कर दिया। (जारी /क्रमशः/-11)
पाठकों से- ब्लॉग पर यह मेरा पहला प्रयोग है. मेरा उद्देश्य है कि मैं अपने कार्य के माध्यम से अधिक से अधिक पाठकों तक अपनी पहुँच बना सकूँ। अगले पड़ावों पर हम शीघ्र ही आपको दिल्ली के बारे में ऐसी दिलचस्प जानकारियां देने जा रहे हैं कि आप भी आश्चर्य-चकित रह जाएंगे, शर्त यही है कि इस पुस्तक की हर कड़ी को आप पढ़ना न भूलें। पाठक सीधे तौर पर भी मुझसे इस नंबर +91 9350934635 पर संपर्क कर सकते हैं -*कॉपीराइट: डॉ. रंजन ज़ैदी/- लेखक


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