इतिहास के झरोखे से--रंजन ज़ैदी* ( 11 )



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दिल्ली
 (इतिहास के झरोखे से ) --रंजन ज़ैदी* ( 11 ) 
बात तो होगी ही                                                   
‘Gahe-Gahe baz khwan een qissae-parinah raa’/गाहे-गाहे बाज़ ख्वां ईं क़िस्स--पारीनह रा। (क़िस्सों को कभी-कभी दोहराते रहना चाहिए।)



माम सोच-विचार के बाद अंततः 1912 ई. में ऐडविन लुईटन को दिल्ली टाउन प्लानिंग कमेटी
अतीत के झरोखे से:चांदनी चौक
में शामिल कर लिया गया। कमेटी के अध्ययन से पता चला कि शाहजहांनाबाद लगभग 30 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ था और उसकी कुल आबादी लगभग ढाई लाख की थी। इसे ध्यान में रखते हुए नई दिल्ली के लिए 52 वर्ग किमी के क्षेत्र की पैमाइश की जानी ज़रूरी थी, जिसमें 60 हज़़ार की आबादी का निर्धारण किया जाना था किन्तु कालांतर में इस परिकल्पना का भी मानचित्र बदल गया।  
      
      समय की बात, कार्य ने गति पकड़ना ही चाहा था कि प्रथम विश्व-महायुद्ध की आग भड़क उठी। भीषण युद्ध में अंग्रेज़ी सेना को बहुत नुकसान उठाना पड़ गया। राज-कोश लगभग खाली हो गया। यही नहीं बल्कि वह दौलत भी जो अंग्रेज़ों की सेना ने हिन्दुस्तान के महाराजाओं, नवाबों, जागीरदारों, दमनकारी नीति के अंतर्गत सैनिकों द्वारा विद्राहियों के घरों और अनेक किलों से लूटी थी, सब हथियार खरीदने में खर्च हो गई। 
     इन परिस्थियों में नई दिल्ली की बसावट का स्वप्न अधूरा रह गया, लेकिन 1929 में जब स्वप्न
अतीत के झरोखे से:किले के सामने चांदनी चौक
साकार हुआ तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हो रहे बदलावों को ध्यान में रखते हुए तब अंग्रेज़ों को भारतीय उप-महाद्वीप में भी इस बात का
भय सताने लगा कि विद्रोह की चिंगारी कहीं फिर से न भड़क उठे और अंग्रेज़ी साम्राज्य जलकर राख हो जाये । कारण स्पष्ट थे कि प्रथम विश्व-महायुद्ध के बाद की अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक, सामाजिक और अंग्रेज़ों की बिगड़ती आर्थिक स्थिति अत्यंत कमज़ोर हो चुकी थी और 1857 के विद्रोह की दबी चिंगारियां कभी भी हवाके झोंके से एकाएक भड़क सकती थीं। कहीं कोई राजनीतिक विस्फोट अंग्रेज़ी साम्राज्य की तबाही का कारण न बने, इस नज़रिये से  विद्रोहियों के दमन की कार्यवाई तेज़ कर दी गई. 
      तब अंग्रेजी हुकूमत ने कल्पना भी नहीं की थी कि 20 वर्ष बाद जिस आज़ादी के आन्दोलन को उनकी सशस्त्र सेना और पुलिस ने पूरी शिद्दत से कुचलने की कोशिश की थी वही ताक़त कालांतर में बेकार साबित हो जाएगी और आज़ादी के आन्दोलन के वशीभूत उन्हें इस देश को आज़ाद कर अपने मुल्क लौट जाना पड़ेगा।
         
      अंग्रेज़ी सरकार अब कोई चूक नहीं करना चाहती थी. अपनी हताशा को छुपाने और आर्थिक
नुकसान की भरपाई को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध तरीके से एक नये शहर की योजना को अमल में लाने के काम को वरीयता देना ज़रूरी हो गया. योजना जोखिम भरी ज़रूर थी, लेकिन सरकार को खतरे उठाने के लिए खुद को तैयार करना पड़ा। इसके लिए तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने सर्वप्रथम दिल्ली टाउन प्लॉनिंग कमेटी से अलग तीन अत्यंत महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त आर्किटेक्ट और कुशल शहरी योजनाकारों की सेवाएं लेने का फैसला लेना पड़ा। ये तीन नाम थे-पैट्रिक गेट्स, ल्यूस मम फ़ोर्ड, एबी नेज़र हॉवर्ड।    
      इन तीनों विशेषज्ञों के प्रयासों से एक ऐसे शहर की रूपरेखा तैयार करने का कार्य शुरू किया गया जहां (औद्योगिक उत्पादन वर्जित हो, जहां आबादी की सीमा निश्चित प्रतिशत से अधिक न हो, जहां स्तरीय सामाजिक व्यवस्था के निकाय सक्रियता से कार्य करते रह सकें। स्वास्थ्य और साफ-सफ़ाई के साथ ही नागरिकों में जागरूकता हो और वे अपने शहर के सौंदर्य को बढ़ाते रहने में अपना सहयोग दे सकें। जहां कानून-व्यस्था का आधार मज़बूत हो और प्रशासनिक व्यवस्था में कोई झोल न हो। इसके लिए ततकालीन सरकार अपने प्रशासनिक अधिकारियों का इस्तेमाल कर सकती है ताकि समाज के बीच भ्रष्टाचार न पनप सके।’ (अंग्रेजों ने तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारी (आई.सी.एस.यानि आज का आईएएस) की नियुक्तियों की सर्जना तब इसलिए की थी ताकि समाज और प्रशासनिक व्यवस्था में फैलने वाले भ्रष्टाचार पर तुरंत और सख्ती से अंकुश लगाया जा सके।)   

      404 ई. में प्रसिद्ध दार्शनिक अफ़लातून ने अपनी पुस्तक The Republic में जिस नये शहर की परिकल्पना की थी, उसमें लोगों की समस्याओं के निवारण और उनकी बीमारियों को लेकर की गई चिंता पर काफ़ी बल डाला गया था। कारण यह था कि उस युग में युद्ध मूलतः शहरों में हुआ करते थे जिसके परिणामस्वरूप शहर बरबाद हो जाते थे और युद्धोपरांत वहां जिस प्रकार की सामाजिक समस्याएं और बीमारियां जन्म लेती थीं, उनसे निपटना कठिन हो जाता था। उसका विचार था कि शहरों की हदें मज़बूत हों तो वहां युद्ध की संभावना न केवल कमज़ोर पड़ सकती है बल्कि ऐसी समस्याओं का सामना ही न करना पड़े, तो बेहतर है। 
     एबी नेज़र हॉवर्ड की परियोजना अंग्रेज़ों को अधिक पसंद आई और इस पर काम शुरू कर दिया गया।

     
1857 के विद्रोह को सीधे-सरल अंदाज़ में नहीं लिया जा सकता है. हमारे देश के इतिहास का यह एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है क्योंकि इसी विद्रोह ने एक बड़े आन्दोलन का रूप लिया था जिसके  भयानक परिणाम हम कालांतर में देख सकते हैं। 
     अंग्रेज़ों का अपनी इस नौआबादी रियासत के अवाम से शंकित रहना स्वाभाविक था. उन्होंने आंदोलन को जिस कठोरता से विद्रोह का नाम लेकर उसका दमन किया था, वह बेहद हिंसक और क्रूरता से भरा हुआ था. 
हुआ यूं था कि मेेरठ की सैनिक छावनी में 10 मई, 1857 को हिन्दुस्तानी सैनिक घुड़सवार औैर प्यादा पलटनों ने विद्रोह कर सर्व-प्रथम जेल पर हल्ला बोलने के बाद वहां बंद अपने साथियों को आज़ाद करा लिया था, इसके तुरंत बाद बागी सैनिकों ने अंग्रेज़ अफ़सरों की कोठियों पर धावा बोलकर अपने आक्रोश का प्रदर्शन किया।
      हुआ यह था कि 1857 में जिस तेज़ी से बाग़ी सैनिकों ने अंग्रेज़ों से बदले लिये और आगे जाकर जिस तरह से लाल किले पर अपना झंडा फहराया, उसे अंग्रंज़ों द्वारा विश्वभर में खूब बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया गया। इसके बावजूद इस बात में भी कुछ सच्चाई ज़रूर थी कि बागियों ने अंग्रेज़ों से बदले लिए. उनकी असंगठित
सेना के अधिकतर शिकार अंग्रेज़ परिवार हुए थे। 
      मन की भड़ास निकालकर जब बाग़ी सैनिकों ने दिल्ली की ओर कूच किया तब वे आत्मविश्वास से इतने भरे हुए थे कि सामने आ जाने वाला हर अंग्रेज अब उन्हें किसी भुनगे की तरह दिखाई देने लगा था जिसे मसल देने में उन्हें देर नहीं लगती थी। तब उन्हें इसका अंदाज़ा नहीं था कि किले का आखिरी मुग़ल बादशाह एक ऐसा कमज़ोर और लाचार सेनापति साबित होने वाला है जिसे अंग्रेज़ न केवल आसानी से गिरफ़्तार करने में कामियाब हो जाएंगे बल्कि मुग़ल सल्तनत के आखिरी चिराग़ को ही बुझाकर रख देंगे।
      देखा जाये तो दुनियाभर में शाही बग़ावतों के बाद के नतीजे कुछ इसी तरह के ही बरामद होते रहे हैं। 18वीं शताब्दी में जमैका द्वीप के गुलामों को 1824 में  विद्रोह करने पर उन्हें ज़िंदा जला दिया गया था। ऐसे ही 1864 में विद्रोहियों को फांसियों पर चढ़ाया गया। यही नहीं बल्कि इन जैसी अनेक घटनाओं से असंख्य ब्रिटिश उपनिवेशवादी बग़ावतें पटी पड़ी हैं। डेविड चेम्बरलेन की पुस्तक स्मिथ आफ़ डिमेरारा में ऐसी घटनाओं के अनेक वृतांत बहुतायत में पाये जाते हैं जो पाठकों को रोमांचित करने के लिए काफ़ी है।
     जनरल निकल्सन की सेना ने जब दिल्ली पर पुनः कब्ज़ा किया तो उसने सर्व-प्रथम गिरफ़तार
बाग़ी सैनिकों के नामों की सूची बनवानी शुरू की। सूची से पता चला कि बागी सैनिकों में मुस्लिम सैनिकों की तादाद बहुत है। यही नहीं बल्कि खबर यहाँ तक पहुंची कि मुस्लिम बाग़ियों के हाथेां अंग्रेज़ी सेना के पारिवारिक सदस्यों का नुकसान सबसे ज़्यादा हुआ है। इसपर जनरल निकल्सन गुस्से से आगबगूला हो गया। उसने अपने एक अधिकारी एडवर्ड्स को पत्र लिखा-
      ‘दिल्ली में अंग्रेज़ औरतों अैर बच्चों के हत्यारों के विरुद्ध हमें एक ऐसा कानून पास करना चाहिए जिसके अनुसार हम उन्हें जिन्दा जला सकें या गर्म सिलाखों से तड़पा-तड़पा कर मौत के घाट उतार सकें। ऐसी बर्बर कौम के बाग़ियों को सिर्फ फांसी देकर मार डालने की कल्पना ही मुझे पागल किये दे रही है।’  
      1857 ई. के सैनिक विप्लव के दमन के बाद तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधियों को महसूस हुआ कि दिल्ली नई राजधानी के रूप में इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि अंग्रेजों के विरुद्ध भविष्य में जब भी कोई विद्रोह होगा, उसके अंकुर इसी शहर में फूटेंगे क्योंकि यही मुग़लों की भी राजधानी रही है और अभी मुग़ल-नेतृत्व समाप्त नहीं हुआ है। (क्रमशः जारी/-12)



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