सिलसिला, यादों का-१/ रंजन ज़ैदी
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| हेमवती नंदन बहुगुणा। |
सिलसिला, यादों का-१/ रंजन ज़ैदी
बहुगुणा जी, यानि हेमवती नंदन बहुगुणा।
एक ऐसा नेता जिसे देखकर शरीर रोमांचित हो उठता था। जलसे-जुलूसों में उनका राजनीतिक भाषण सुनकर रोमांच सा होने लग जाता था.
बचपन से उन्हें देखा था, पर उनकी तरह बनने की लालसा भी जगी थी लेकिन विश्वविद्यालय तक पहुँचते -पहुँचते नज़रिये अपने-आप बदलते चले गए.
दिल्ली पहुंचा तो कहानीकार बनने के साथ-साथ हिंदी का पत्रकार भी बन गया। बहुगुणा जी से जब भेंट हुई तब वह राजनीती के हाशिये पर अपनी ज़िन्दगी के फुटनोट लिखने में मसरूफ थे.
मामूली से परिवार में जन्में थे बहुगुणा जी. माँ, विलेज-स्तर की समाज-सेविका थीं. पिता गांव के इज़ज़तदार लोगों में से एक. बहुत सम्मान था उनका। लोगो की मदद करते रहना उनकी आदत बन गई थी।
गांव बुघाणी (ज़िला गढ़वाल) में पानी की तंगी थी। बारी-बारी से पानी मिलता था। पिता ने न केवल पानी-वितरण की समस्या का समाधान तलाशा बल्कि गांव की साफ़-सफाई की ओर भी अपना ध्यान केंद्रित किया। शायद यही कारण रहा होगा जिससे प्रभावित होकर छटी क्लास में पढ़ने वाले बहुगुणा जी ने अपने गांव में 'गांव सुधार कमिटी' बनाई जिसकी भूमिका ने भावी राजनेता की नीव रखी और लोगों की तजुर्बेकार नज़रों ने भविष्यवाणी की कि पूत के पाँव पालने में साफ़ नज़र आने लगे हैं.
बहुगुणा जी क्रीमी-लेयर के स्टूडेंट थे, इसलिए वह आईसीएस बनकर देश के तत्कालीन प्रशासनिक सेवा में जाना चाहते थे. चाहते थे कि वह बड़े पद पर पहुंचकर गरीब लोगों की मदद कर सकें।
जूनून ने उन्हें ऐसा घेरा कि हर किताब और कापी के पन्ने पर वह फूल-पत्तियां डिज़ाइन करते और फिर उनके बीच अपना नाम लिखकर आगे आईसीएस लिख देते।
देहरादून में बुआ रहती थीं, बहुगुणा जी वहीं उनके पास रहकर गवर्नमेंट कालेज में पढ़ने लगे.
वहीं उनका पहला दोस्त बना रामप्रसाद नम्बूदरी। शर्मीला, बला का पढ़ाकू, बाहर की दुनिया से बेखबर, कालेज-लाइब्रेरी में गुम रहने वाला, मेरी प्रेरणा का स्रोत। आईसीएस के सपने को साकार करने में रामप्रसाद नम्बूदरी सारथी जैसा लगा। वह भी कालेज-लाइब्रेरी जाने लगे. वहीं नम्बूदरी ने उन्हें कांग्रेस के इतिहास पर लिखी गई डॉ.पट्टा भई सीतारमैया की पुस्तक पढ़ने को दी तो बहुगुणा जी उसपर बरस पड़े. उन दिनों उन्हें पॉलिटिशियन पसंद नहीं थे. आईसीएस का भूत सवार था, वैसी ही जीवन-शैली अपना रखी थी। नम्बूदरी ने खिन्न होकर सफाई दी कि उसने किताब पढ़ने की सिफारिश इसलिए की वह अपनी अंग्रेजी दुरुस्त कर लें, न कि कांग्रेस की आइडियालोजी का संवरण करें।
दशहरे के दिनों में बहुगुणा जी ने पुस्तक पढ़ने की शुरुआत की तो नजरिया ही बदल कर रह गया. बहन ने पूछा, इतना गुस्सा क्यों? ऐसा क्या है इसमें भूख तक उड़ा दी है? बहुगुणा जी जलियां वाले बाग़ का चैप्टर सुनाने लगे. निहत्थों पर गोलियों की बारिश, एक दरवाज़ा, भागने का दूसरा रास्ता नहीं। अंग्रेज़ इतना ज़ालिम हो सकता है कि लाशे बिछा दे. बहन फफककर रो पड़ी. बहुगुणा जी का नजरिया बदल गया. नहीं, वह आईसीएस में नहीं जायेंगे। इंक़लाब की दस्तक पर अपनी आवाज़ भी बुलंद करेंगे। रामप्रसाद नम्बूदरी बहुगुणा जी की नज़रों में महान बन गया.। (/----२ जारी) contact@samagravichar.in, alpsankhyaktimes94gzb.com, info@samagravichar.in, +91 9350 934 635
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