सिलसिला, यादों का-4/ रंजन ज़ैदी
सिलसिला, यादों का-3/ रंजन ज़ैदी
जैसे मुलायम सिंह यादव को विरोधी पार्टियों के लोग मौलाना मुलायम सिंह पुकारते हैं, ठीक वैसे ही हेमवती
नंदन बहुगुणा मुस्लिम खेमे के समर्थक होने के कारण उन्हें भी मौलाना बहुगुणा कहकर सम्बोधित किया जाता था.
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| बहुगुणा जी मानते थे कि..... |
यदि सोचने का नज़रिया गलत न हो तो 'मौलाना' शब्द विद्द्वान व विद्वता का प्रतीक है लेकिन देश के सांप्रदायिक चरमपंथियों ने इस शब्द को व्यंग्य की परिधि में संकुचित कर उसे तुष्टिकरण से जोड़ दिया जो घटिया राजनीति को खाद-पानी देता रहता है.
बहुगुणा जी सभ्य, सुसंकृत, प्रतिभाशाली व योग्य राजनेता थे
और जानते थे कि मुसलमानों का भविष्य इस देश के उतार-चढाव से जुड़ा हुआ है. यही कारण है कि इस देश का लोकतंत्र बेहद मज़बूत और दूसरे देशों के लिए अनुकरणीय है।
बहुगुणा जी मानते थे कि देश का मुस्लमान संकीर्ण विचारधारा के पोषक चरमपंथियों के फैलाये हुए सांप्रदायिक ज़हर के कारण बहुसंख्यकों के शक और उनके अविश्वास का शिकार बनता आ रहा है. निश्चय ही इस सोच की वजह से इस देश को उन होनहार मुस्लिम युवाओं से हाथ धोना पड़ा है जो देश की मिली-जुली सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान, खोज और हर तरह के विकास को नए आयाम दे सकते थे लेकिन उन्हें बैक-फुट पर पहुंचा दिया गया।
वह मानते थे कि सियासी सत्तह पर मुसलमानों का आगमन हुआ है लेकिन सरकारी नौकरियों और दूसरी आर्थिक योजनाओं में उनको उनका जायज़ हिस्सा नहीं मिला है. ‘इसकी जड़ें हमें इतिहास में नज़र आती हैं.
अंग्रेजी हुकूमत के दौर में अपने प्रशासनिक उद्देश्यों की सम्पूर्ति के लिए अंग्रेज़ों ने अल्पसंख्यक-वर्गों को बढ़ावा दिया और बहुसंख्यक समुदाय को अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भड़काते रहने की पॉलिसी पर अमल किया जिससे दोनों समुदायों के बीच गाढ़ी नफरत पनपने लगी और जब देश का विभाजन हुआ तो नफरतें दलदलों में तब्दील हो गईं जिसका नतीजा आज़ादी के बाद मुसलमानों को बड़े पैमाने पर भुगतना पड़ा.’
बहुगुणा जी का मानना था कि बहुसंख्यक समुदाय की सांप्रदायिक सोच खतरनाक होती है. इससे अल्पसंख्यक समुदाय की सोच साम्प्रदायिक बनती है. साम्प्रदायिकता मानवी-समाज के सम्पूर्ण विकास को बाधित करती है.
वह उस आरोप का अकसर खंडन करते थे जिसमें कहा जाता था कि बहुगुणा
जी मुसलमानों को कुछ नहीं कहते। सफाई में बहुगुणा जी कहते, घर में अगर बड़ा भाई
गलती करता है तो उसे अधिक डांटा जाता है. हिंदुओं से अगर फ़िरक़ापरस्ती मिटती है
तो मुसलमानों से अपनेआप मिट जायेगी। वह आगाह करते कि इस मुल्क पर मुसलमानों का
बड़ा अहसान है. हर मैदान में उनका बड़ा योगदान रहा है. १८५७ का विद्रोह हो या जंगे-आज़ादी
की लड़ाई, दोनों जंगों में हिंदुओं के साथ मुसलमान भी जेलों में गये,
फांसियों पर लटके, शहीद कहलाये। इसीलिए ये मुल्क सैक्युलरिज़म
को पसंद करता है. अंततः चुनावों
में जीत भी इसी सोच की होती है.
बहुगुणा जी कहा करते थे,'जिस तरह एक तेज़ रफ़्तार नदी अपने दामन में तमाम गंदिगी बहाकर ले जाती है, उसी तरह अगर सियासत की रफ़्तार तेज़ हो तो इसमें कूड़ा-करकट खुद-ब-खुद बह जाता है.……' (जारी -/४) alpsankhyaktimes94gzb.com
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