'हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है,"/ डॉ रंजन ज़ैदी

                        'हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा."/ डॉ रंजन ज़ैदी 
           शे' युगुरुष, योग गुरु स्वामी बाबा रामदेव के जीवन और उनके व्यक्तित्व पर सीधे चस्पा होता है.कौन जानता था कि हरियाणा राज्य के महेंद्रगढ़ जनपद के अंतर्गत आने वाले गाँव अलीपुर के एक ग़रीब घर में 1965 को रामकिशन यादव नाम से एक ऐसा योगऋषि जन्म लेगा जो भारतीय आयुर्वेद और भारतीय योग को एक नया सम्मान और अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता ख्याति से अलंकृत कर देगा. योग-ऋषि बाबा रामदेव द्वारा स्थापित 'दिव्य योग मंदिर संस्थान' से दीक्षित एक योगी सतीश पाराशर बताते हैं कि इस संस्थान ने उनके जीवन को नया प्रकाश दिया है. जीवन से निराश, हताश और नियति पर अटक जाने वाले पाराशर बताते है कि बाबा के योग ने उनके जीवन की गति ही बदल दी. जब
स्वामी बाबा रामदेव 
         बाबा, खानपुर का गुरुकुल हो या  कलवा का गुरुकुल, वह संस्कृत का अध्ययन करते हुए योग का प्रशिक्षण लिए बिना नहीं रहे. आयुर्वेद में योग का समावेश उनके जीवन की एक घटना से हुआ. बाबा रामदेव के शरीर का बाया हिस्सा बचपन में पक्षाघात से ग्रस्त हो गया थाकिसी ने उन्हें बताया कि पक्षाघात को केवल योग के माध्यम से ही  सक्रिय किया जा सकता है | इसके बाद से ही वह अपने उपचार के लिए योग का गहन अध्ययन करने लगे और योगभ्यास भीकाफी योगाभ्यास के बाद उनके पक्षाघात वाला हिस्सा सक्रिय हो गया, यह उनके जीवन की सबसे बड़ी सफलता थी | अपने उपचार के दौरान ही उन्हें योग का सही अर्थ समझ में आया कि किस तरह योग के माध्यम से असाध्य रोगों का भी इलाज किया जा सकता है | इसके बाद से ही उन्होंने योग के प्रसार को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था | यही योग कालांतर में उनके जीवन का साध्य बन आयुर्वेद की मीमांसा का साधन बन गया. योग शरीर को स्वस्थ रखने का साधन है, आयुर्वेद उसी शरीर के भीतर के रुग्ण संसार को सुचारु रूप से अनुशासित बनाये रखने और उसके यंत्रों को परिष्कृत करते हुए संचालित करते रहने का साधन है.
     गुरुकुल में योगाभ्यास करते रहने के दौरान बाबा ने जाना दुनिया में बदलाव लाने की मीमांसा. जिसमें सांसारिक जीवन के त्याग और बलिदान का उत्स छुपा हुआ था. संसार से वैराग्य ले लेने के बाद बाबा का जीवन
सन्यासी हो गया. पिता राम यादव और माँ गुलाबो देवी का यह पुत्र जब सन्यासी बन स्वामी रामदेव बना तो कायनात की हर वास्तु मुस्कुरा दी. तब शायद किसी ने भी अंदाज़ा नहीं लगाया था कि यह स्वामी एक दिन योग और आयुर्वेद की नया इतिहास रच देगा
          उनके योग की शुरुआत हरियाणा के जींद जिले में आचार्य धर्मवीर के गुरुकुल क्लब में शामिल होने के से हुई थी. तब बाबा हरियाणा के लोगो को योग की शिक्षा देने लग गये थे | इसके बाद से ही उनका संपर्क देश के बड़े योगाचार्यों से हुआ. योगियों से मिलने की खोज में वह हिमालय की यात्रा पर निकल पड़े | गंगोत्री ग्लेशियर ने उन्हें ध्यान में लीन होने का संगीत  दिया. उस प्राकृतिक संगीत ने बाबा को तब  असली योग का अभ्यास करने का हौसला प्रदान किया. कुछ समय रहने के बाद उनको एहसास हुआ कि 'यदि योग का अभ्यास करते हुए जीवन यहीं समाप्त हो गया तो ज्ञान और योगाभ्यास का क्या होगा?’
          चिंतन का यही वह समय था जब उन्हें होनहार शिष्यों के सामीप्य का अहसास हुआ. होनहार  शिष्यों के पास नई सोच थी और कुछ कर गुजरने का उत्साह भी. आचार्य बालकृष्ण और आचार्य बालवीर ने उनके मिशन और बाबा की परिकल्पना को साकार करने का बीड़ा उठायावहीं हिमालय पर ही उनकी भेंट आचार्य मुक्तानन्द और आचार्य वीरेन्द से हुईइन्ही आचार्यो की मदद और सलाह पर अमल करते हुए वह   हिमालय छोडकर हरिद्वार में गये | यहीं से उन्होंने अपने जीवन की एक नई शुरुआत की.
       पुरा-आयुर्वेद एक लुप्त  होता हुआ संसार था जो बूढी दादियों और नानियों की पोटलियों में आकर सिमट गया था, योगऋषि  बाबा रामदेव ने बूढी दादियो-नानियों की गठरियाँ खोलीं और आयुर्वेद के जिन्न को निकालकर भारतीय पुरासंस्कृति और परम्पराओं  की गठरियाँ उसे सौंप दीं ताकि वह हरिद्वार में पतंजलि योगपीठ की प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिकों और शोधार्थियों को बिना खोये शोध के लिए दे सके. ऐसा उपकार 'कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रीयल टेक्नालॉजी' यानि 'किट' विश्वविद्द्यालय ने देख योगऋषि की वैज्ञानिक साधना और अद्भुत योगदान को देखते हुए उन्हें डॉक्ट्रेट की उपाधि से सम्मानित कर उनकी प्रथम पाठशाला शहजादपुर को भी गौरवान्वित कर दिया.
          पुरा-आयुर्वेद का चलन पिछड़ी, जंगली जातियों आदिवासी ग्रामीणों में अभी तक जीवित था. गांव-क़स्बों में अभी भी वैद्य और ओझाओं का वर्चस्व बना हुआ था. जबकि वैज्ञानिक क्रांति के आजाने और अंग्रेजी औषधियों की बाढ़ के बाद आयुर्वेद को आमजन तक पहुँचाना टेढ़ी खीर से कम नहीं था. आयुर्वेद भारतीय इतिहास, सभ्यता और उसकी अस्मिता को बनाये रखने के लिए भी जन-जन तक  उसका पहुंचना आवश्यक था. बाबा के इसी संघर्ष ने आज सस्ती जेनरिक औषधियों को एक नया बाजार मुहैया करा दिया है, लेकिन जेनरिक औषधियों के प्रचार-प्रसार में आज भी डाक्टरों की एक बड़ी फ़ौज लोहे की दीवार बनकर खड़ी हुई है क्योंकि  जेनरिक दवाइयां सस्ती होती हैं जबकि एलोपैथिक दवाइयों में डाक्टरों का भारी कमीशन होता है और बड़ी कंपनियों का अरबों का कारोबार लाभान्वित होता है. यह एक बड़ी लड़ाई है जिसे बाबा को आगे भी लड़ते रहना होगा. हालाँकि योगऋषि ने अपने संकल्प को जिस प्रकार अमली शक्ल दी है उससे लगता है कि बाबा इस लड़ाई में भी अंततः विजयी होंगे.
          
          पतंजलि योगपीठ  की स्थापना हरिद्वार में साल 2007 में  की गयी. 10 वर्ष में ही आज भारत में फैली बहुराष्ट्रीय कंपनियां पतंजलि के विस्तार से एकाएक सिहर उठी हैपीठ के दो कैम्पस हैं.
          पतंजलि योगपीठ-1         
          पतंजलि योगपीठ-2.
          इसकी अनेक शाखाएं विदेशों में भी काम कर रही हैं जैसे, यूके, यूएस. नेपाल, मारीशस, कनाडा अदियोग प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से पीठ को स्कॉटिश में ज़मीन भी उपलब्ध करने का बाबा को वादा किया गया था. आज योगऋषि का योग उद्द्योग की परिधि में प्रवेश कर चुका है. पीठ के उत्पाद ने आज भारत के बाजार पर अपना अम्ब्रेला तान दिया है. भारत में जहां पहले फ़ास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स यानि एफएमसीजी का बोलबाला था आज योगऋषि ने अपने उत्पादित 'उत्पाद' दंतकांति (टूथपेस्ट) को घर-घर पहुँचाकर कॉलगेट के एकाधिकार को लगभग नकार दिया है. आज योगऋषि बाबा रामदेव उद्द्योग के क्षेत्र में 10,651 करोड़ की पूँजी के मालिक  बन चुके हैं.
          आयुर्वेद का अर्थ होता है, जीवन का ज्ञान. 'चरक संहिता' आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है। मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया के अध्ययन से पता चलता है कि 'इसके उपदेशक अत्रिपुत्र पुनर्वसु, ग्रंथकर्ता अग्निवेश और प्रतिसंस्कारक चरक हैं।चरकसंहिता की रचना शायद 7वीं या 8वीं शताब्दी में की गई थी. कालांतर में समय-समय पर आयुर्वेदिक चिकित्सा सिद्धांत के नए-नए अनुसंधानों को इसमें शामिल किया जाने लगा. नए सिद्धांत हों या नए उपचार के विकल्पों की तलाश, अग्निवेश तंत्र  के संशोधन की बात हो या चरक-संहिता के संपादन की बात, यह सब नवीं शताब्दी के मध्य में किया गया जिसका पुन: संपादन संशोधन कश्मीरी पंडित द्रधबल ने किया. इस विशाल ग्रन्थ में हमें केवल प्राचीन काल में चिकित्सा-शास्त्र की पूरी जानकारी मिलती है बल्कि आयुर्वेदिक चिकित्साशास्त्र के विभिन्न पहलुओं का वर्णन  भी इसमें पाया जा सकता है.

          योगऋषि  बाबा रामदेव ने आयुर्वेद की महत्ता को अपने अध्ययन और शोध के दौरान ही समझ लिया था और भारतीय योग की महत्ता को उन्होने राजीव दीक्षित के साथ मिलकर स्वदेशी के प्रचार-प्रसार के दौरान जाना | जब श्री राजीव दीक्षित की मृत्यु हो गयी तब उसके बाद स्वदेशी आन्दोलन की जिम्मेदारी स्वतः ही बाबा के कन्धो पर गयी. तबसे अब तक उन्होने उस ज़िम्मेदारी से कभी भी अपना मुंह नहीं मोड़ा
____________________________________________________________
'Alpsankhyak Times' Group 'ब्लाग-मंच' आपका है। इस मंच से उठने वाली हर आवाज़ देश और समाज के बदलते राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक समीकरणों को दिशा प्रदान करती है. यह 'नई जंग' एक नये युग को नया इतिहास दे सकती है. आइये! सब कंधे से कंधा मिलाकर प्रगतिशील और जागरूक भारत और उसके विकासशील समाज व राष्ट्र को अप्रदूषित, भयमुक्त, स्वच्छ और सशक्त लोकतंत्र का नया स्वर प्रदान करें। आपकी रचनाएं आमंत्रित हैं। 
Contact: https://zaidi.ranjan20@bloggar.com, facebook/ranjanzaidi.../ twitter@786ranjanzaidi... लेखक Add:AlpsankhyakhyakTimes Web News Group of Publications, Indirapuram-201014, GHAZIABAD (UP) NCR, India

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पुस्तक : इतिहास के झरोखे से ( 3 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी

महाभारत युद्ध नहीं, एक युग था./ रंजन ज़ैदी

ज़मीं खा गयी आसमान कैसे-कैसे/रंजन ज़ैदी