कश्मीर o अब्दुल्ला को अंदाजा नहीं था कि उनकी अपील हुर्रियत नेताओं पर असर नहीं छोड़ेगी / -नाज़िम नक़वी
श्रीनगर (जे एंड के) हजरतबल में हुए नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ताओं के बीच अपने पिता शेख़ अब्दुल्ला की फ़ारुख अब्दुल्ला ने कहा कि हमारी पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के खिलाफ नहीं है, हम भी कश्मीरियों के मौलिक अधिकारों का समर्थन करते हैं लेकिन इसे पाने के लिए गलत रास्तों पर नहीं चल सकते'. उन्होँने कहा कि अलग राह मत अपनाओ, एक हो जाओ, हम भी तुम्हारे साथ खड़े हैं.'
111वीं सालगिरह पर बोलते हुए
हुर्रियत कांफ्रेंस की जड़ों को समझने के लिए हमें 1988-89 के बीच कश्मीर की आजादी को लेकर जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट या जेकेएलएफ की सियासी सुरंगों में झांक कर देखना होगा की किस तरह से कश्मीर की बर्फीली वादियों में तत्कालीन सियासत ने गर्माहट पैदा की कि जिसने जल्दी ही आग बनकर चिनार को झुलसाना शुरू कर दिया. नतीजतन इस आग की तपिश से जहाँ एक ओर भारत झुलसा वहीं पड़ोसी पकिस्तान ने भी अपने हाथ तापने शुरू कर दिए. दुनिया ने इसे भलीभांति महसूस भी किया.
पहले जेकेएलएफ के नौजवानों ने कश्मीर की आजादी के लिए भारतीय सुरक्षा सेना से लड़ना शुरू किया. फलस्वरूप सेना की कार्यवाई की खबरें सुर्खियां बनने लगीं. उसके खिलाफ मानवाधिकार संगठनों की बयानबाजियां भी मुखर हो गईं. इसके बावजूद सेना के द्वारा जेकेएलएफ की ताकत को ना केवल कहीं तक ख़त्म कर दिया गया बल्कि दूसरी ओर उसे आतंकी संगठन घोषित कर उसे हाशिये पर डाल दिया गया. इससे पहले की जेकेएलएफ के झंडे तले जमा हुई कश्मीरी जनता अपने घरों को लौटती इस्लामी-अतिवादियों के गिरोहों ने उनका स्थान ले लिया. इन्हें पकिस्तान की आईएसआई का समर्थन हासिल था. इसी स्थिति के गर्भ से हुर्रियत का जन्म होता है, जिसने अलगाववाद के लिए लड़ रहे अलग-अलग संगठनों को एक परचम तले इकठ्ठा किया. नाम दिया ‘ऑल पार्टीज़ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस’.
फारूख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री बने एक दशक से ज्यादा हो चुका था. इस एक दशक में 'शेरे-कश्मीर’ फ़ारुख अब्दुल्ला के बेटे ने गोल्फ खेलने में महारत हासिल कर ली थी. खुशवंत सिंह की कहानियों ने भी उनकी कई खूबियों को उजागर किया था. खुशवंत सिंह, अब्दुल्ला के बारे में बताते, 'वह जब वादी-ए-कश्मीर से बिलकुल सुर्ख और ताजे सेब की तरह दिल्ली आते हैं तो उनपर लुट जाने वाले हसीन चेहरों का उन्माद उन्हें कश्मीर की समस्याओं पर सोचने का मौका ही नहीं देता है.' नाज़िम नक़वी
उस समय
89 से 93 यानी पांच वर्षों में लापरवाहियों की खाद से ताकत हासिल करता यह छोटा सा पौधा 25 वर्षों में एक ऐसा दरख्त बन चुका है, जिसे उखाड़ पाना अब लगभग 80 बरस के फ़ारूख अब्दुल्ला के लिए मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है. फ़ारूख अब्दुल्ला के नारे, 'हुर्रियत वालों!...' को सुनते ही वर्तमान मुख्य-मंत्री महबूबा मुफ़्ती ने तुरंत पलटवार किया 'फ़ारूख अब्दुल्ला के बयान से साबित हो गया कि जम्मू-कश्मीर सरकार का प्रमुख विरोधी दल, पृथकतावादी हुर्रियत संगठन से अलग नहीं है और ये बात भी साबित होती है कि पिछले महीनों की हिंसक वारदातों को उसका मौन समर्थन हासिल था.' महबूबा यहीं नहीं रुकी. उन्होंने कहा 'ये वही फ़ारूख अब्दुल्ला हैं, जो कहा करते थे कि हुर्रियत नेताओं को झेलम में फेंक देना चाहिए.'
वास्तविकता यह है कि कश्मीर का समाधान कोई नहीं चाहता. अपने-अपने हिस्से के कश्मीर पर सबकी
अपनी नजर है. भारतीय राजनीति गलत या सही जिन भी तेवरों के साथ आगे बढ़ रही है, उसमें छोटी-छोटी भूमिकाओं के सहारे कहानी में बने रहने की कोशिश भर हैं. बदलाव यदि शिकारा खींचते लोगों के हक में होता है तो 'पथराव करने तक को' रोजगार की तरह देखने पर मजबूर कश्मीरी, अपने लीडरों से दो-टूक सवाल अवश्य करेगी. -नाज़िम नक़वी : फर्स्ट पोस्ट)
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नई जंग यह 'ब्लाग-मंच' आपका है। इस मंच से उठने वाली हर आवाज़ देश और समाज के बदलते राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक समीकरणों को दिशा प्रदान करती है. यह 'नई जंग' एक नये युग को नया इतिहास दे सकती है. आइये! सब कंधे से कंधा मिलाकर प्रगतिशील और जागरूक भारत और उसके विकासशील समाज व राष्ट्र को अप्रदूषित, भयमुक्त, स्वच्छ और सशक्त लोकतंत्र का नया स्वर प्रदान करें। आपकी रचनाएं आमंत्रित हैं। ContactID:https://zaidi.ranjan20politcs1@blogger.com,facebook.com/ranjanzaidi786 -लेखक
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| जेकेएलएफ के फाउंडर अमानुल्लाह ख़ान. |
हुर्रियत कांफ्रेंस की जड़ों को समझने के लिए हमें 1988-89 के बीच कश्मीर की आजादी को लेकर जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट या जेकेएलएफ की सियासी सुरंगों में झांक कर देखना होगा की किस तरह से कश्मीर की बर्फीली वादियों में तत्कालीन सियासत ने गर्माहट पैदा की कि जिसने जल्दी ही आग बनकर चिनार को झुलसाना शुरू कर दिया. नतीजतन इस आग की तपिश से जहाँ एक ओर भारत झुलसा वहीं पड़ोसी पकिस्तान ने भी अपने हाथ तापने शुरू कर दिए. दुनिया ने इसे भलीभांति महसूस भी किया.
पहले जेकेएलएफ के नौजवानों ने कश्मीर की आजादी के लिए भारतीय सुरक्षा सेना से लड़ना शुरू किया. फलस्वरूप सेना की कार्यवाई की खबरें सुर्खियां बनने लगीं. उसके खिलाफ मानवाधिकार संगठनों की बयानबाजियां भी मुखर हो गईं. इसके बावजूद सेना के द्वारा जेकेएलएफ की ताकत को ना केवल कहीं तक ख़त्म कर दिया गया बल्कि दूसरी ओर उसे आतंकी संगठन घोषित कर उसे हाशिये पर डाल दिया गया. इससे पहले की जेकेएलएफ के झंडे तले जमा हुई कश्मीरी जनता अपने घरों को लौटती इस्लामी-अतिवादियों के गिरोहों ने उनका स्थान ले लिया. इन्हें पकिस्तान की आईएसआई का समर्थन हासिल था. इसी स्थिति के गर्भ से हुर्रियत का जन्म होता है, जिसने अलगाववाद के लिए लड़ रहे अलग-अलग संगठनों को एक परचम तले इकठ्ठा किया. नाम दिया ‘ऑल पार्टीज़ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस’.
फारूख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री बने एक दशक से ज्यादा हो चुका था. इस एक दशक में 'शेरे-कश्मीर’ फ़ारुख अब्दुल्ला के बेटे ने गोल्फ खेलने में महारत हासिल कर ली थी. खुशवंत सिंह की कहानियों ने भी उनकी कई खूबियों को उजागर किया था. खुशवंत सिंह, अब्दुल्ला के बारे में बताते, 'वह जब वादी-ए-कश्मीर से बिलकुल सुर्ख और ताजे सेब की तरह दिल्ली आते हैं तो उनपर लुट जाने वाले हसीन चेहरों का उन्माद उन्हें कश्मीर की समस्याओं पर सोचने का मौका ही नहीं देता है.' नाज़िम नक़वी
उस समय
89 से 93 यानी पांच वर्षों में लापरवाहियों की खाद से ताकत हासिल करता यह छोटा सा पौधा 25 वर्षों में एक ऐसा दरख्त बन चुका है, जिसे उखाड़ पाना अब लगभग 80 बरस के फ़ारूख अब्दुल्ला के लिए मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है. फ़ारूख अब्दुल्ला के नारे, 'हुर्रियत वालों!...' को सुनते ही वर्तमान मुख्य-मंत्री महबूबा मुफ़्ती ने तुरंत पलटवार किया 'फ़ारूख अब्दुल्ला के बयान से साबित हो गया कि जम्मू-कश्मीर सरकार का प्रमुख विरोधी दल, पृथकतावादी हुर्रियत संगठन से अलग नहीं है और ये बात भी साबित होती है कि पिछले महीनों की हिंसक वारदातों को उसका मौन समर्थन हासिल था.' महबूबा यहीं नहीं रुकी. उन्होंने कहा 'ये वही फ़ारूख अब्दुल्ला हैं, जो कहा करते थे कि हुर्रियत नेताओं को झेलम में फेंक देना चाहिए.'
वास्तविकता यह है कि कश्मीर का समाधान कोई नहीं चाहता. अपने-अपने हिस्से के कश्मीर पर सबकी
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| कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बल के जवान |
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नई जंग यह 'ब्लाग-मंच' आपका है। इस मंच से उठने वाली हर आवाज़ देश और समाज के बदलते राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक समीकरणों को दिशा प्रदान करती है. यह 'नई जंग' एक नये युग को नया इतिहास दे सकती है. आइये! सब कंधे से कंधा मिलाकर प्रगतिशील और जागरूक भारत और उसके विकासशील समाज व राष्ट्र को अप्रदूषित, भयमुक्त, स्वच्छ और सशक्त लोकतंत्र का नया स्वर प्रदान करें। आपकी रचनाएं आमंत्रित हैं। ContactID:https://zaidi.ranjan20politcs1@blogger.com,facebook.com/ranjanzaidi786 -लेखक



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