नए फीनिक्स के जन्म के लिए पुराने फीनिक्स को मरना ही होता है./ -रंजन ज़ैदी

      जो हो रहा है उसे होने दो. तुम उसे नहीं बदल सकते. यदि बदल सकने का तुममें साहस होता या क्षमता
रंजन ज़ैदी    
होती तो नियति बदलाव की प्रक्रिया का नियंता तुम्हें चुनती. लेकिन उसने तुम्हें नहीं चुना. तुम मात्र एक घटना के नियंता हो. वह घटना जो रास्ते निर्मित करती है. 

      हर रास्ते पर हर व्यक्ति सफर नहीं कर सकता. एक ही मंज़िल के अनेक रास्ते हो सकते हैं. अनेक रास्तों की विभिन्न मंज़िलें हो सकती हैं. तुमने सुना होगा, व्यक्ति एकांत में बड़बड़ाता है, 'काश मैंने उस समय यह रास्ता न चुना होता....' 
      'काश मैंने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सही रास्ता चुन लिया होता,'
      'काश मैंने उस समय अपने आक्रोश को रोक लिया होता..'
      'काश मैंने अपने माता-पिता का कहना मान लिया होता..' 
      'काश मैंने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन ली होती.' 
       काश मैं अपने भीतर के जानवर को पहचान गया होता,'
      'काश मैंने अपने हमदर्दों की सलाहें मान ली होतीं....' 
      यानि कोई ऐसा क्षण ज़ोर होता है जो हमारे विवेक की परीक्षा लेता है. उस क्षण का 'क्षणिक-आवेश' हमें भ्रमित कर देता  है. ओडल्फ़ हिटलर के मस्तिष्क में किसी एक क्षण यह विचार ज़रूरआया होगा कि जर्मन श्रेठ आर्य हैं. इसी विचार ने उसके विवेक को दूसरे विश्व महायुद्ध का नायक बना दिया. ज़मीन के बंकरनुमा तहखाने में आत्महत्या करने से पूर्व उसने अवश्य सोचा होगा कि क्या उसके फैसले सही थे? हिटलर के एक जर्मन जनरल ओडल्फ़ ऐशमन को भी घृणा के साथ विचार आया होगा कि यहूदियों को जीवित रहने का अगर अधिकार दे दिया गया होता तो विश्व महायुद्ध के दौरान गैस चेंबर में 5 लाख निर्दोष यहूदी नागरिक मौत के घाट शायद न उतारे जाते. शायद भारत का विभाजन भी किसी एक लम्हे की भूल भरी कहानी का महाभारत है. शायद कश्मीर भी कुछ सियासतदानों की किसी एक भूल का मर्सिया है. शायद उसी एक भूल ने महाराजा हरी सिंह को अकूत ख़ज़ाने के साथ कश्मीर से भागने पर मजबूर किया था.
      तुम किसी के सिर पर ताज नहीं रख सकते. किसी से उसका रिज़्क़ यानि दाना-पानी भी नहीं छीन सकते, नियति यदि देती है तो छीनती भी है। कुछ घटनाओं की तस्वीरें हमें  विचलित कर सकती हैं, कुछ जोश भी भरती हैं, इसमें प्रकृति का सन्देश छुपा होता है. जब हम घटनाओं-दुर्घटनाओं से विचलित होते हैं तो हमारे लिए नियति का सन्देश होता है. 'मानवता का अंत मत करो. कहीं दूर आंख से ओझल, अदृश्य 'काल' तुम्हारी ओर आने के लिए आतुर है'. सन्देश देता प्रतीत होता है, 'ग़रीब, निर्दोष, गर्भवती महिलाओं को भालों से मत छेदों, ये लोग मर जायेंगे,जीवित रहे तो तुम्हारा दिया दुःख सह जायेंगे'  लेकिन नियति तुम्हें रास्ते पर ही रोक लेगी. तुम शीघ्र अति शीघ्र किसी अव्यवस्थित भीड़ या भगदड़ में मारे जाओगे, क्योंकि प्रकृति की एक सशक्त व्यवस्था है. जो व्यक्ति इस व्यवस्था से टकराता है, वह देर-सवेर निश्चित रूप से दंडित होता है. हुसैनियत को कर्बला से निकलने के बाद भी आजतक यज़ीद समाप्त नहीं कर पाया? सद्दाम हुसैन का वंश समाप्त हो गया. क्या हम पूछ सकते हैं कि आस्ट्रेलिया ने हंगरी के निवासियों और रूस ने पोलैंड के नागरिकों को बड़े पैमाने पर फाँसियाँ दीं, किन्तु समस्या का निदान वे तब भी नहीं खोज पाए. क्या जर्मन नस्लवाद यहूदियों का अंत कर सका ? 
      तो मालूम हुआ कि जो प्रकृति के विवर में है, वह हम देख नहीं पाते. जो नहीं है, उसकी परिकल्पना करते रहते हैं. कौन जानता था,  इस देश के  प्रधान मंत्री नरेंद्रभाई  दामोदर दास मोदी होंगे. ढाई साल में ही देश का इतिहास बनना शुरू हो जायेगा. करोङों का काला धन लुटेरे लूटकर देश से बाहर भाग जायेंगे और काला पैसा उबलकर बाहर आ जायेगा. 
      हम मोदी को कितनी ही गालियां दें, कोसें,  टैम्पिल माफिया के प्रकांड पंडित नुक्सान पहुँचाने वाले यज्ञ कराएं, नियति अभी उनके साथ है. जनता को दुःख भोगना है क्योंकि  परिवर्तन की आंधी में  कमज़ोर परिंदे पेड़ों पर देर तक नहीं बैठे रह सकते, ऊँचाई से नीचे की ओर गिरकर अपने आप मर जाते हैं. यही प्राकृतिक की नियति है. नए फीनिक्स के जन्म के लिए पुराने फीनिक्स को मरना ही होता है. 
 -रंजन ज़ैदी     
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