रचनात्मक विकास की महायात्रा अनवरत है/ रंजन ज़ैदी
रचनात्मक विकास की महायात्रा अनवरत है. रचना की प्रगति रचनाकार के चिंतन,दर्शन और दृष्टिकोण के भाव-बोध पर आश्रित होती है. जहाँ रचनाकार का वैचारिक चिंतन तार्किक कसौटी पर खरा न होकर 'वाद-सम्मत' हो जाता है, वह कालजयी नहीं हो पाता है, न ही रचनाकार अपने समय की सीढियां फलाँगकर जीवित रह पाता है, शायद इसीलिए उर्दू साहित्य के युवा समालोचकों में डॉ.मिर्ज़ा शफ़ीक़ हुसैन 'शफ़क़' को (त्रिय-मासिक पत्रिका के विशेषांक 'इत्तिला' लखनऊ) अपने संपादकीय में तर्क के साथ समझाने का प्रयास करना पड़ा कि ग़ालिब अपनी ग़ज़लों से पहचाने जाते हैं, अपने कलात्मक पत्रों के लिए नहीं. मीर को हम ग़ज़लों का शायर मानते हैं, मसनवियों का शायिर कम. नज़ीर अकबराबादी नज़्मों के लिए जाने जाते हैं, ग़ज़लों के लिए नहीं. इसी तरह डिप्टी नज़ीर अहमद अपने उपन्यासों के लिए पहचाने जाते हैं, मुफ़स्सिर-कुरआन यानि 'कुशल भाष्यकार ' के रूप में नहीं. मोहसिन नक़वी हों या इरफ़ान हैदर आब्दी, खतीब अकबर हों या दूसरे धार्मिक विद्वान, पाठकों या उनके चाहनेवालों ने उनके जिस रूप को पसंद किया वे उसी में इतने शीर-शकर होकर घुल गए कि पता ही नहीं चला, आईने का एक दूसरा रुख भी है जिसे देख लेना ग़लत नहीं है.
खतीब अकबर एक शायिर भी थे, विचारक भी. धार्मिक विद्वान भी थे और आधुनिक विज्ञानं के प्रड पंडित व सामाजिक प्रवक्ता भी. अपने आलेख 'अहदे-हाज़िर यानि आधुनिक युग और इस्लाम' (उर्दू मासिक 'अल इल्म' लखनऊ के अप्रैल-मई 1958 में प्रथम बार प्रकाशित) में मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद अतहर ने 'मज़हब' को परिभाषित करते हुए लिखा है कि मज़हब यानि चंद नियमों और सिद्धांतों की वह सड़क जिसपर बिना थके चलकर मनुष्य अपने गंतव्य तक सरलता से पहुँच सके. उनके अनुसार, इस्लाम कुछ विश्वासों और सद-कर्मों का ऐसा समाहार या संकलन है जिसमें सामाजिक अवरोध भी हैं और नैतिक आदेश भी. इसकी अंतरपरिधि में कुछ ऐसा ज़रूर है जो बन्दे को इहलोक से परलोक की भव्यता और उसके आश्चर्यों से साक्षात्कार कराते हुए दिव्य-ज्योति के दर्शन कराता है.आलेख में इस्लामिक विश्वासों की श्रृंखला में सर्वप्रथम तौहीद यानि अद्वैतवाद (एकेश्वरवाद) का उल्लेख किया गया है, जो बन्दे को अनुशासित रखना चाहता है.
जब हमें इस बात की अनुभूति हो जाती है कि कोई हमारे इर्द-गिर्द ऐसा है जिसने हमें भी जन्म दिया है और जो सर्व-शक्तिमान है, हमारे अच्छे-बुरे क्रिया-कलापों को देख रहा है और हमें दण्डित करने की ताक़त रखता है, वही से हमें नियंत्रित भी करता है, तो हमें समाज और परिवार में अत्यंत अनुशासन के साथ रहना होगा. अद्वैतवाद की यह पहली सीख हमें प्रकृति का संतुलन बनाये रखने का भी पाठ पढ़ाती है. अद्वैतवाद की यह पहली सीख हमें प्रकृति का संतुलन बनाये रखने का भी पाठ पढ़ाती है. [जारी -/2]
पत्रिका : इत्तिला
(आल इंडिया शिया पर्सनल ला बोर्ड की आवाज़, (उर्दू त्रै-मासिक-विशेषांक), लखनऊ।
संपादक : मीर्ज़ा शफ़ीक़ हसन 'शफ़क़'
वार्षिक शुल्क: रूपये 200. 00
https://shafiquehusain@rediffmail.com/
______________________________________________________
नई जंग वेब' यह 'ब्लाग-मंच' आपका है। इस मंच से उठने वाली हर आवाज़ देश और समाज के बदलते राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक
समीकरणों को दिशा प्रदान करती है. यह 'नई जंग' एक नये युग को नया इतिहास दे सकती है. आइये! सब कंधे से कंधा मिलाकर प्रगतिशील और जागरूक भारत और उसके विकासशील समाज व राष्ट्र को अप्रदूषित, भयमुक्त, स्वच्छ और सशक्त लोकतंत्र का नया स्वर प्रदान करें। आपकी रचनाएं आमंत्रित हैं। ContactID:https://zaidi.ranjan20politcs1@blogger.com,facebook.com/ranjanzaidi786 -लेखक
खतीब अकबर एक शायिर भी थे, विचारक भी. धार्मिक विद्वान भी थे और आधुनिक विज्ञानं के प्रड पंडित व सामाजिक प्रवक्ता भी. अपने आलेख 'अहदे-हाज़िर यानि आधुनिक युग और इस्लाम' (उर्दू मासिक 'अल इल्म' लखनऊ के अप्रैल-मई 1958 में प्रथम बार प्रकाशित) में मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद अतहर ने 'मज़हब' को परिभाषित करते हुए लिखा है कि मज़हब यानि चंद नियमों और सिद्धांतों की वह सड़क जिसपर बिना थके चलकर मनुष्य अपने गंतव्य तक सरलता से पहुँच सके. उनके अनुसार, इस्लाम कुछ विश्वासों और सद-कर्मों का ऐसा समाहार या संकलन है जिसमें सामाजिक अवरोध भी हैं और नैतिक आदेश भी. इसकी अंतरपरिधि में कुछ ऐसा ज़रूर है जो बन्दे को इहलोक से परलोक की भव्यता और उसके आश्चर्यों से साक्षात्कार कराते हुए दिव्य-ज्योति के दर्शन कराता है.आलेख में इस्लामिक विश्वासों की श्रृंखला में सर्वप्रथम तौहीद यानि अद्वैतवाद (एकेश्वरवाद) का उल्लेख किया गया है, जो बन्दे को अनुशासित रखना चाहता है.
जब हमें इस बात की अनुभूति हो जाती है कि कोई हमारे इर्द-गिर्द ऐसा है जिसने हमें भी जन्म दिया है और जो सर्व-शक्तिमान है, हमारे अच्छे-बुरे क्रिया-कलापों को देख रहा है और हमें दण्डित करने की ताक़त रखता है, वही से हमें नियंत्रित भी करता है, तो हमें समाज और परिवार में अत्यंत अनुशासन के साथ रहना होगा. अद्वैतवाद की यह पहली सीख हमें प्रकृति का संतुलन बनाये रखने का भी पाठ पढ़ाती है. अद्वैतवाद की यह पहली सीख हमें प्रकृति का संतुलन बनाये रखने का भी पाठ पढ़ाती है. [जारी -/2]
पत्रिका : इत्तिला
(आल इंडिया शिया पर्सनल ला बोर्ड की आवाज़, (उर्दू त्रै-मासिक-विशेषांक), लखनऊ।
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