मेरा दोस्त बृजेश्वर मदान/ रंजन ज़ैदी
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| प्रतिभा के धनी बृजेश्वर मदान |
'वर्तमान
साहित्य' में बृजेश्वर
मदान पर शशिभूषण
द्विवेदी का संस्मरण
छपा है, जिसे
प्रभात रंजन की
वेब ‘जानकी पुल’
ने भी साभार
प्रकाशित किया है.
हो सकता है
औरों ने भी
ऐसा किया हो.
इसलिए संस्मरण पर
मेरी प्रतिक्रिया इसलिए
ज़रूरी है क्योंकि बृजेश्वर मदान हिंदी का
एक प्रतिभाशाली कथाकार
है और पत्रकार
भी. दुर्भाग्य से
वह भी शुरू से ही हिंदी
साहित्य के स्वार्थी
व पेशेवर गुटों
तथा अवसरवादी कथित
मठाधीशों के अनेक
पूर्वग्रहों का शिकार
रहा है जैसे
कभी राही मासूम
रज़ा, गुलशेर अहमद
खां शानी, प्रोफ़ेसर
शैलेश ज़ैदी और
देवेन्द्र
सत्यार्थी जैसे अनेक
बड़े साहित्यकार रह
चुके हैं.
शशिभूषण द्विवेदी के संस्मरण
की ओर मैं
ध्यान इसलिए दिलाना
चाहता हूँ कि
कुछ आरोपित भ्रम
कम किये जा
सकें. शशिभूषण के
संस्मरण में हरे
प्रकाश उपाध्याय की एक
'बदमाशी' का ज़िक्र
किया गया है.
यह कथित बदमाशी हरेप्रकाश
उपाध्याय ने बृजेश्वर
मदान को बेवक़ूफ़
बनाकर १००० रूपये
रुपये ऐंठ लेने
पर ख़त्म की.
१९९० में बृजेश्वर मदान ने जब
इस घटना का
ज़िक्र किया तब
मैं साप्ताहिक जनाधार
भारती का संपादक
था और उस
समय कवि शलभ
श्रीराम, राजेंद्र जैन, कुबेर
दत्त और कुछ
अन्य लोग बैक-रूम में
बैठे किसी विषय पर कर रहे थे. इसी बीच बृजेश्वर
मदान अचानक बहुत
भावुक हो गए. शलभ श्रीराम
से उन्होंने सवाल
किया,'क्या
नई पीढ़ी आने
वाले समय में
अपने सामाजिक मूल्यों
को भी लिक्विड
सोप से धोकर
रख देगी?' उन्होंने कुछ याद करते हुए बताया कि वे
लड़के उन्हें मूर्ख
बनाकर पैसे ऐंठ
रहे थे और
एक कथाकार बदलते
मूल्यों का भविष्य
आंक रहा था. है न एक अजीब विडम्बना. कुछ हासिल करने
के लिए कुछ तो खोना ही पड़ता
है. एक हज़ार ही सही.'
शशिभूषण द्विवेदी के
तब के अट्ठास मेरे
कानों को आज
भी भेदते रहते
हैं जबकि मैंने
मात्र वे अट्टहास
मदान की मार्फ़त
सुने भर थे.
मदान पर तब
क्या गुज़री होगी,
इसकी मैं कल्पना ही कर सकता हूँ.
संस्मरण में बृजेश्वर
मदान के बारे
में बहुत ग़लत और
अनर्गल बातें बताई गई
हैं. ऐसी बातें अनेक बार कुबेर दत्त को
लेकर भी कही
गई थीं लेकिन
वहां कहीं तक
सच्चाई थी, यहां
सच्चाई कम सतही गप्प
ज़्यादा लगीं.
बृजेश्वर मदान को
मैं तब से
जनता हूँ जब
मैं डीएवी स्कूल
छात्र हुआ करता था. पहली शिफ्ट की क्लासेस कर दूसरी शिफ्ट में
मैं 'नीलम'
(फिल्म) पत्रिका (पार्ट टाइम
संपादन) के संपादक
(गुरू) श्याम सुन्दर मुनव्वर
को असिस्ट करने चला जाता था. वह मुझे
बदले में १००
रूपये पर्स-मनी
के दिया करते थे. पहले नीलम पत्रिका वैद्य मणिशंकर शर्मा निकाला करते थे. उस समय उसका कार्यालय खारी बावली में था लेकिन खरीद लिए जाने के बाद 'नीलम' का दफ्तजयहिंद र भगीरथ पैलेस स्थित
एसएस फिल्म्स में आ गया. सामने फिल्म जंगली
के वितरक छाबड़ा फिल्म्स का दफ्तर
था. बाद में ख़ाली पड़े रहने वाले इस एसी दफ्तर में मैं अपने लिखने-पढ़ने का बहुत सा काम करने लग गया था. उदाहरणार्थ विजय दिवान मुझ से अपने प्रकाशन जासूसी मंज़िल के लिए विनोद-हमीद के उपन्यास लिखवाता, मैं भी उस नई ज़िम्मेदारी को क़ुबूल कर एक के बाद एक कुल ५ नावेल लिख गया.
एक दिन मैंने विजय से कहा, क्या लिखवाता है मुझसे, फिल्म पत्रिका क्यों नहीं निकालता. इसमें बहुत फायदा है. नीलम में प्रकाशित हो रहे विज्ञापनों को देख विजय इस प्रस्ताव पर विचार करने लगा. न्यु लाजपत राय मार्किट में जयहिंद न्यूज़ एजेंसी का शोरूम था. मेरी वहीं बैठक भी थी. एक दिन वहीं पता चला कि अब फ़िल्मी मैगज़ीन निकलेगी। सर्व-सम्मत से नाम रखा गया, फ़िल्मी कलियां. यह नाम फ़िल्मी दुनिया के मुकाबले में लाया गया था. ज़िक्र इसलिए कि बृजेश्वर मदान की लेखनी ने कालांतर में पत्रिका को जो ऊंचाइयां और बिज़नेस दिया, उसके लिए मैं शायद कभी योग्य साबित नहीं हो सकता था।
एसएस फिल्म्स के दफ्तर में फिल्म निदेशकों, कलाकारों, फ़िल्मी पत्रकारों
और मीडिया से
जुड़े दूसरे लोगों
का काफी आना-जाना लगा
रहता था. बृजेश्वर
मदान तब भगीरथ
पैलेस से ही
निकलने वाली एक
बहुचर्चित पत्रिका 'चित्रलेखा' के
अलिखित संपादक हुआ करते
थे. उसके प्रकाशक पूरी या केसरी साहब मेरे
गुरू एसएस मुनव्वर
के गहरे मित्र
थे और उनके आते ही ठीक
६ बजे से
दफ्तर में बोतलें
खुलनी शुरू हो
जाती थीं. तब
मुझसे कह दिया
जाता था, ' जा
पुत्तर, पढाई-शढाई
कर.'
उन
दिनों फाइव-स्टार
होटलों में फ़िल्मी पार्टियां बहुत होती थीं, मुनव्वर
साहब उनका प्रबंध
करते थे क्योंकि अधिकतर फिल्मों के वही पीआर हुआ करते थे. ऐसी पार्टियों में नन्हे
फिल्म पत्रकार के
रूप में मुझे
भी शामिल
होने का अवसर
मिल जाता था.
ख्वाजा अहमद अब्बास
की फिल्म 'बम्बई
रात की बाँहों
में' की पार्टी
का प्रबंध एसएस
फिल्म्स् कर रहा
था. ६ बोतलें
मुझे कनॉट प्लेस
से लाने को
कहा गया. तब
अंग्रेजी
अख़बार 'थाट' के
फिल्म जर्नलिस्ट मिस्टर
एसएस अरोड़ा मेरे
साथ हो गए थे. उन्हीं
के साथ होटल
क्लरेजिस में पहली
बार मेरी से बाक़ायदा
दोस्ती हुई थी. फिर
चाहे ओबराय में फिल्म आबरू की पार्टी हो या कहीं रामानंद सागर के साथ फिल्म ऑंखें का जश्न हो, केवल पी कश्यप की फिल्म परिवार हो या और दूसरी फ़िल्में, मौर्या शेरेटन हो या होटल क्लेरेजिस हो या
कोई और....ब्रजेश्वर
मदान जहाँ भी
मिलते, दिल खोलकर
मिलते. ताज्जुब यह है कि
मैंने उन्हें कभी आउट ऑफ़ सेन्स होते नहीं
देखा. कुमुद छुगानी और राज कुमार से मेरा परिचय बृजेश्वर मदान ने ही कराया था. उस समय
तक मदान फ़िल्मी
दुनिया के बड़े
पत्रकारों में शुमार
किये जाने लगे थे. हर बड़ी पत्रिका में उनके आलेख, समीक्षाएं और इंटरवियु हुआ करते थे. तब नवभारत टाइम्स
में रंगनाथ
पाण्डेय और बच्चन श्रीवास्तव का जलवा था लेकिन पॉपुलेरिटी में बृजेश्वर मदान आगे थे, 'फ़िल्मी कलियाँ' की अत्यंत व्यस्तता के कारण उनका पार्टियों में जाना लगभग बंद सा हो गया था. लेकिन शशिभूषण द्विवेदी का यह गैर-ज़िम्मेदाराना आरोप सिरे से मन घडन्त है कि 'फ़िल्मी कलियाँ' के प्रकाशक विजय दीवान उन्हें वेतन न देकर शराब की बोतल दे दिया करते थे. वह शराब तो पीते थे लेकिन इतने एडिक्ट नहीं थे कि वह बोतल और वेतन के लिफाफे के बीच का अंतर ही न कर पाएं। विजय दीवान को मैं बचपन से जनता हूँ, यही नहीं, अपने बचपन के उस दोस्त और उसके समूचे परिवार से मैं भली-भांति परिचित रहा हूँ. बड़े भाई प्रेम दीवान हों या बाबू जी (जयहिंद न्यूज़ एजेंसी के मालिक) कभी शराब छूते तक नहीं थे. किसी को गिफ्ट करने की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है......[क्रमशःजारी/-2]___________________________________________________________________________
पाठकों से- पाठक सीधे तौर पर भी मुझसे इस नंबर +91 9350934635 पर संपर्क कर सकते हैं -लेखक

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