मेरा दोस्त बृजेश्वर मदान/ रंजन ज़ैदी ( 2 )

मेरा दोस्त बृजेश्वर मदान-2/ रंजन ज़ैदी 
'र्तमान साहित्य' में बृजेश्वर मदान पर शशिभूषण द्विवेदी का संस्मरण छपा है, जिसे प्रभात रंजन की वेब ‘जानकी पुल’ ने भी साभार प्रकाशित किया है. इस संस्मरण पर मेरी प्रतिक्रिया इसलिए ज़रूरी है क्योंकि बृजेश्वर मदान हिंदी का एक प्रतिभाशाली कथाकार है और वरिष्ठ पत्रकार भी. दुर्भाग्य यह कि वह भी शुरू से ही हिंदी साहित्य के स्वार्थी व पेशेवर गुटों तथा अवसरवादी कथित मठाधीशों के अनेक पूर्वग्रहों का शिकार रहा है.  (और अब…) 
नौवें दशक के प्रारम्भ से ही समकालीन रचनाकार बेहद ज़मीन से जुड़े हुए लोग हुआ करते थे. उससे भी पहले के लोग फक्कड़ होते हुए भी बड़े दिल के लोग हुआ करते थे. एक दिन बहुत भूख लगी तो प्रेस एन्क्लेव के बाहर गाड़ी पार्क कर मैं सोसायटी के अंदर चला गया. ममेरे भाई का घर था, पर वहां न जाकर वरिष्ठ पत्रकार रामसेवक श्रीवास्तव जी के घर की बेल बजा दी. श्रीमती नीलम श्रीवास्तव बाहर आईं तो मैं घर के अंदर। फ्रिज खोलकर देखा, शायद कुछ हो. पीछे से नीलम ने हँसते हुए बताया, 'सब कुछ है. जितनी देर में हाथ-मुंह धोकर आओगे, मेज़ पर प्लेटें लग जाएंगीं. तभी सामने से रामसेवक श्रीवास्तव जी बरामद हुए,'अरे, कब आ गये.?" मैंने कहा, 'भूख लगी थी, आ गया.'एक बार जगदीश चतुर्वेदी जी ने फ़्लैट के नीचे से आवाज़ लगाई। बाहर निकला तो चतुर्वेदी जी हाथ पकड़कर गाड़ी तक ले आये. कहा, राजघाट चलना है. गाड़ी में नगेन्द्र जी के साथ कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय (हिंदी विभाग) के एक प्रोफ़ेसर भी बैठे हुए थे. रास्ते में गाड़ी पेट्रोल पम्प पर रुकी तो नगेन्द्र जी ने कहा,'ज़ैदी, १०० रूपये निकालो. मैं शर्म से पानी-पानी। बेसरोसामानी में घर से निकले थे, जेब खाली थी. चतुर्वेदी जी ने जेब से १०० का नोट निकाला, कान में कहा, दे दो!' ,नगेन्द्र जी राजघाट पहुँचने से पहले बोले,'हिंदी  साहित्य के इतिहास में इस बार तुम्हें एक नया चैप्टर जोड़ना है, हिंदी ग़ज़ल.… यह बात और है कि वह अध्याय मेरी अपनी कमज़ोरी के कारण आजतक पूरा नहीं हो सका.
          'वामा, हो या 'सारिका', दफ्तर जैसे घर. लंच का समय, कैंटीन में जमावड़ा। हर टिफिन से हर कोई खा रहा है.  सफ़ाई का कोई कांसेप्ट नहीं। प्रगतिशीलिये वैसे भी लिए-दिए कहाँ रहते हैं. पता ही नहीं चलता था कि लंच का पेमेंट कौन कर रहा है-महेश दर्पण, रमेश बत्रा, सुरेश उनियाल, सुधीर पचौरी या कोई और. बृजेश्वर मदान ने एक बार कहा  था,'ये लोग जिस लोक-कथा के पात्र  हैं, उन्हें अगर पिंजरे में भी बंद कर दिया जाये तो भी समय का राक्षस इनके भीतर के तोते को कभी मार नहीं पायेगा. 
          तोते से याद आया. बात १९८४ की है. सारिका का लोक-कथा विशेषांक निकल रहा था. सितम्बर (भाग-१) के अंक में बृजेश्वर मैदान का एक आलेख जाने वाला था. उसके बारे में मुझे रमेश बत्रा ने बताया था।  तब वह प्रेस-एरिया में स्थित पानस्टाल पर खड़े मदन से बातें कर रहे थे कि तभी वीर अर्जुन के दफ्तर से मैं बाहर निकला देखा, पान की  दुकान पर जमावड़ा है. मदान लगातार बोले जा रहे हैं. रमेश बत्रा मुझे एक और लेजाकर बोले,' इस समय मदान पत्रकार नही, एक साहित्यकार के रूप में है. मुझे जाना है, तुम्हें पता चल जाये कि पिंजरे वाला तोता कौन सी शक्ति का प्रतीक है तो आकर बता जाना, अभी तो मैं चला क्योंकि मैं लोक साहित्य को पिंजरे में बंद करके  आया था, जाकर खोलना है.'
          जब मैं यह कहता हूँ कि बृजेश्वर मदान 'एक मल्टी डाइमेंशनल पर्सनालिटी' का नाम है तो उसका सीधा मतलब यह निकलता है कि वह लोक कथाओं की दुनिया में भी उस अज्ञात परिंदे को खोज निकालता है जो लोक-शक्ति का प्रतीक होता भी है और नहीं भी, क्योंकि जब होता था तब आसमान बहुत  नीचे तक फैला हुआ था. इसीलिए आदमी झुककर जानवरों  तरह चलता था. फिर परिंदों ने तिनकों की शहतीरों से उसे ऊंचा उठा दिया। आसमान उठा तो सूरज भी सामने आ  गया और आदमी सीधा  होकर चलने लगा.लोक-कथा के बहाने बृजेश्वर मदान पाठकों को विकास के किन अध्यायों तक ले जाने में कामियाब हो जाता है, यह  नहीं है. 'कब्रिक की फिल्म स्पेस ओडिसी २००१' में बन-मानुस आकाश की ओर हड्डी फेंकता है और उसे स्पेस-शिप के साथ कट करता  है. पलक झपकते ही आदमी स्पेस युग में पहुँच जाता है. लेकिन वनमानुष के आसमान की तरफ हड्डी फेंकने से स्पेस-युग तक पहुँचने में युगों का फ़ासला है. अपनी बात साबित करने के लिए मदान पाकिस्तान में उर्दू के कथाकार इंतज़ार हुसैन की कहानी के एक पात्र का हवाला देकर पाठक को कहाँ से कहाँ तक ले आते हैं,'पहले सफ़र इतने लम्बे होते थे कि एक जगह से दूसरी जगह  पहुँचने में हुकूमतें बदल जाती थीं.' इसी कहानी का दूसरा पात्र कहता है,'आज भी ट्रेन से आप अमृतसर से लाहौर पहुंचें  तो पता चलता है कि हुकूमत बदल गई.'
          लोक-साहित्य की जीवंतता का ज़िक्र करते हुए जब बृजेश्वर मदान उपन्यास 'बस्ती' (इंतज़ार हुसैन) का ज़िक्र करते हैं तब उनका नज़रिया कितना बेबाक होकर सामने आ जाता है,'…उनके उपन्यास में दरख़्त सदियों में सांस लेता हैं और परिंदों की आवाज़ में युग बोलते हैं तो वह लफ़्फ़ाज़ी नहीं लगती। वे अपनी रचनाओं में यथार्थ के साथ लोक कथाओं को इस खूबी के साथ पिरोते हैं कि न केवल उनकी बस्ती जैसी रचनाएँ देश-काल लांघ जाती हैं, बल्कि परिँदीँ के माध्यम से वह वर्तमान सभ्यता के राक्षस भी पढ़ने वालों के सामने उपस्थित कर देते हैं.
          बृजेश्वर मदान  ने यह बताने की कोशिश की कि संथालों की लोक-कथाओं का आसमान कभी बहुत नीचे झुका हुआ होता था. इसी तरह मध्य प्रदेश की लोक कथाओं का अन्न देवता पहले बहुत क़द्दावर हुआ करता था लेकिन पूजा करते-करते उसे आदमी ने पौधे का रूप देकर अपनी कमर तक  ले आया. बृजेश्वर मदान बताते हैं कि हमारी लोक कथाओं की विशेषता यह है कि अन्न देवता की कहानी हमेशा ऐसी ही नहीं रहती है, मानव इतिहास और प्रगति के साथ बदलती रहती है. देवेन्द्र सत्यार्थी ने एक कहानी लिखी,'अन्न देवता'. लोक कथा पर आधारित उनकी एक कहानी और भी है, 'सांप और बांसुरी'. अद्भुत व्याख्या. भगीरथ कैसे गंगा लाया, उसी लोक कथा से प्रेरित होकर ख्वाजा अहमद अब्बास की एक कहानी का नायक राजस्थान में नहर ले जाता है. बृजेश्वर मदान के भीतर का लेखक लोक कथाओं में भी आदमी के साहस और लोक-शक्ति के प्रतीकों को अंततः तलाश ही कर लेता है. वाही बताता भी है कि हिंदी का लेखक पढता कम है, बातें ज़्यादा करता है.उसका सवाल करना जायज़ है कि क्या फणीश्वर नाथ रेनू को आंचलिक उपन्याकर से इतर एक लोक कथाकार के रूप में भी देखा गया है, जबकि लोक कथाओं में उनका योगदान अक्षुण्य है. इसी तरह मृणाल पाण्डेय के उपन्यास पटरंगपुर पुराण को कितने लोगों ने पढ़ने कि कोशिश की है?                                                   [क्रमशः जारी/-3]
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