अरविन्द केजरीवाल राजनीतिक परिवर्तन की आँधी है /रंजन ज़ैदी


हो सकता है लोग विश्वास न करें, लेकिन जो स्थाई रूप से मुझे निरंतर पढ़ते आ रहे हैं, वे विश्वास कर सकते हैं कि अब तक मैंने अन्ना-आन्दोलन, विचारधारा और योजना पर जो भी लिखा है वह अक्षरशः सत्य ही सिद्ध हुआ है। 23/4/12 और उससे भी पहले मैंने अन्ना-टीम को आगाह किया था कि इस देश के युवाओं को सामाजिक-क्रांति की ज़रुरत है जिसे राजनीती के मैदान पर उतरना होगा। मैंने कहा था, केजरीवाल को समझना चाहिए कि इस देश का पढ़ा-लिखा वर्ग (युवा वर्ग सहित) उनसे उम्मीदें लगाये हुए है. उसे  बाबा रामदेव की फैक्ट्रियों के कैप्सूल नहीं, बेहतर शैक्षिक भविष्य और स्थाई रोज़गार की गारंटी चाहिए. वह हताश और निराश है, अपने माता-पिता की मंहगाई से झुकती हुई कमर और डूबती आशाओं से दुखी है. वह अपने परिवार, समाज और देश के लिए कुछ करना चाहता है लेकिन बाबाओं की महत्वकांक्षाएं और लूट उन्हें आगे बढ़ने नहीं दे रही  है. मैं ने यह भी लिखा था, अरविन्द केजरीवाल और साथियों  को इस वर्ग से सीधे संवाद करना होगा. युवा वर्ग, रामदेव से अपनी शुगर का इलाज नहीं कराना चाहता और न ही उसके पास इतना समय है कि उस जादुई काले धन पर चिंतन-मनन करे. वह जानता है कि इस देश में ही अकूत काला धन नव-धनाड्यों की कोठियों, फार्म हाउसों और किराये के गुप्त फ्लैटों में दबा हुआ है. आज के आन्दोलन ने युवाओं को यह विश्वास दिला दिया है कि अब एक बड़े आन्दोलन की भूमिका बन चुकी है और अरविन्द केजरीवाल उसका नेतृत्व कर सकता है। आज का आन्दोलन राजनीती के भावी इतिहास के दरवाजे की वह  दस्तक है जिसे बहरे कथित राजनेता नहीं सुन पाएंगे लेकिन देश ने सुन लिया है। अब इस आंधी की गति को कोई नहीं रोक पायेगा। यह हो सकता है कि पकी हुई क्रांति की कमान अचानक पीछे से कोई शुक्ला, त्रिपाठी, द्वेदी, मोदी, अडवाणी और मायाएं बढ़कर छीन ले। क्योंकि श्यामाप्रसाद मुखर्जी जब राष्ट्रीय सन्दर्भ में महत्वपूर्ण बन गए थे तो उन्हें चलती ट्रेन से बाहर फ़ेंक दिया गया था। आजतक उनके असली हत्यारे को सामने नहीं लाया जा सका है। राजनीती में ऐसे करिश्में भी होते रहते हैं। अरविन्द केजरीवाल को अब पीछे हटना नहीं, आगे बढ़ना चाहिए। आगे का रास्ता बेहद बीहड़ों से भरा हुआ है। किरण बेदी शायद इस उम्र में राजनीतिक बीहड़ों में जाना पसंद न करें। वह जानती हैं कि देश का भ्रष्ट वर्ग कभी भी लक्ष्मी का मोह त्याग नहीं पायेगा। उसे बदलना आसान भी नहीं होगा. मैंने लिखा था, अन्ना-टीम को देर-सवेर अपनी एक अलग राजनीतिक पार्टी बनानी ही होगी  जो संसद और राज्य-सभा में पहुंचकर बेहतर काम कर सके. यही लोकतान्त्रिक तरीका कारगर सिद्ध हो सकता है. लेकिन ये कम भी कानून के दायरे में हो तो बेहतर होगा।  हालाँकि इस कम में भी सालों लग सकते हैं। इस बीच तो कुछ चमत्कारी चेहरे भी राजनीती में आकर अपने जलवे दिखा सकते हैं> ज़रुरत बेताबी की नहीं, राजनीतिक चमत्कारों के इंतजार की है, इतजार तो करना ही चाहिए.                                     
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टिप्पणियाँ

  1. खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर आधारित है जो कि
    खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में कोमल
    निशाद और बाकी स्वर शुद्ध
    लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित है, पर हमने इसमें अंत में
    पंचम का प्रयोग भी किया है, जिससे इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.

    ..

    हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने
    दिया है... वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट से
    मिलती है...
    Feel free to surf my web-site : फिल्म

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