कांग्रेस की करिश्माई ताक़त पलायन की ओर\रंजन ज़ैदी

प्रियंका : समय कभी इंतज़ार नहीं करता.
रंजन ज़ैदी:गरीबी अभिशाप है, पिकनिक नहीं.
समय बदल रहा है. मनुष्य को समय के साथ चलना चाहिए. समय के साथ बहुत कुछ बदलता रहता है. धरती का भूगोल बदलता है, राजनीति का इतिहास बदलता है, हुकूमते बदलती हैं और हाकिमों की तकदीरें भी समय के साथ बदल जाती हैं. ज़ालिमों का दौर आता है तो मज़लूमों का भी. गरीब अमीर बन जाता है और अमीर गरीब. धरती घूमती रहती है. वह भी अपनी कीली पर घूमते हुए भी कभी एक जगह नहीं ठहरती  है. वह अंतरिक्ष के जिस सफ़र से गुज़रती है, उसका प्रभाव भी अपने आप में  आत्मसात करती चलती है. लेकिन धरती पर रहने वाला मानस खुद को बदलने के लिए राज़ी नहीं होता है, जबकि वह जनता है कि न वह अजेय है, न अमर. एक निश्चित समय तक उसकी यात्रा विभिन्न पड़ावों से होकर गुजरेगी. फिर सब कुछ समाप्त हो जायेगा. कांग्रेस भी अपने उत्तरार्द्ध की यात्रा पर गमन कर रही है.                                                                                                      एक समय आया था जब देश की राजनीति ने नेहरू परिवार की ओर देखकर आमजन और गरीब अवाम के दिलों में उम्मीद जगाई थी कि प्रियंका गाँधी अपनी तकदीर के कलम से इस देश की राजनीति का इतिहास बदलेगी लेकिन वह प्रियंका वढेरा हो गई.                                                                                              उम्मीद ने फिर भी राजनीति  के आंचल  के सिरे को उसकी तकदीर की गांठ से बांधने की कोशिश की तो नेहरू परिवार ने राहुल गाँधी को मैदान में उतार दिया जिसने कभी गरीबी  देखी ही  नहीं थी.                                                                                                                                                           युवराज जब गरीबों के बीच आया तो जिस तरह गरीब राजकुमार को देखकर आनंदित  होता है, वैसे ही राजकुमार गरीब और गरीबी को देखकर आनंदित हो उठा.                                                                           भारत इन दोनों वर्गों के बीच एक पिकनिक-स्पोट बनकर रह गया. राहुल ने सोचा कि यह देश ब्राह्मणों का है. इस देश का ब्रहाम्हण  प्रधानमंत्री अल्पमत में भी  ५ साल तक हुकूमत चला ले जाता  है. नान-ब्रह्महन प्रधानमंत्री संसद में अपने ६ माह भी नहीं गुजार सकता है . कहीं कोई विरोध भी नहीं करता है.  ब्रह्मण  सवर्ण है, वर्ण-व्यवस्था में भी सर्वोच्च है. शंकराचार्य  के पास ५ लाख नागाओं की अघोषित सेना है. देशभर में ब्राहमणों के करोणों  ट्रस्ट और करोणों  की कमाई वाले मंदिर हैं. ढोंगी-अधोंगी बाबा लोगों के पंचतारा आश्रम हैं, भक्तों की १०० नामों की सेनाएं हैं, असंख्य विद्यापीठ है, उनके प्रबंधक और  देश-विदेश, मीडिया तथा  सेना-पुलिस., संस्कृति, साहित्य, कमीशन, बोर्ड्स, गरज कि सभी जगह सर्वोच्च-पदों पर उनके ब्रह्मण प्रतिनिधि पदासीन हैं. ऐसे में यह घोषित कर देना कि राहुल गाँधी ब्रह्मण हैं, २०१४ के आम चुनाव के लिए यह सन्देश काफी उम्मीद भरा हो सकता है. उत्तर प्रदेश के समाजवादी नेता मुख्या-मंत्री श्री अखिलेश, जाति-समुदाय से हिन्दू-यादव हैं और यादव  भगवान कृष्ण के वंशज बताये जाते हैं, इसलिए जब तक उत्तर प्रदेश में जनमत कृष्णभक्तमय  रहेगा, उन्हें कोई खतरा नहीं रहेगा, २०१४ के चुनाव में भी नहीं. ज्ञातव्य हो कि यदुवंशी चरवाहे थे, मुसलमानों के नबी (स) भी (कमलीवाले)  चरवाहे ही थे, हज़रत ईसा (स) भी, किन्तु पूरे अरब के पुरातन मंदिरों के काहन (अरबी भाषा का शब्द: अर्थ-मंदिरों के पुरोहित) कभी भी चरवाहे नहीं रहे, मिस्र के मंदिरों से पलायनकर भारत आने वाले मिश्र  ब्रह्महन भी नहीं.  लेकिन समय निर्मम होता है, उसकी कोई जाति नहींहुआ करती है.               जंगली पशुओं का उसूल होता है कि जब शेर बूढा हो जाये तो उसके मरने तक का इंतजार करो लेकिन मक्खियों पर निगाह रखो. कमज़ोर शेर को जब मक्खियाँ ढक लेती हैं तो आसमान से गिद्धों की फ़ौज हमला कर देती है कि शिकार अब नुक्सान नहीं पहुंचा सकेगा. ऐसे में  कोई भी करिश्मा गिद्धों को शिकार तक पहुँचने से नहीं रोक सकता है, यही प्रकृति की नियति है.                         alpsankhyaktimes94gzb.com

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