लगातार बढ़ती महिला हिंसा की वारदातें / डॉ. रंजन जैदी
| डॉ. रंजन ज़ैदी (लेखक) |
महिला हिंसा की वारदातें लगातार बढ़ती जा रही हैं. दिल्ली हो या उत्तर प्रदेश, या देश के दूसरे भाग, महिला हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है. पिछले दिनों भारत के पड़ोसी देश (बांग्लादेश) की राजधानी ढाका में भी दक्षिण एशियाई देशों के प्रतिनिधियों द्वारा भी इस ज्वलंत समस्या पर चिंता व्यक्त की गई. यह चिंता संयुक्त राष्ट्र संगठन की विभिन्न एजेंसियों के परस्पर सहयोग और संवाद-समन्वय से आयोजित सम्मलेन के दौरान व्यक्त की गई थी. जिसमें जेंडर समानता और महिला हिंसा को लेकर परस्पर संवाद स्थापित किया गया और विशेष रूप से महिला हिंसा परअंकुश लगाने के विकल्पों पर अधिक बल दिया गया था. इस कार्यक्रम में भारत ने भी अपनी भागीदारी दर्ज कराई थी. इसमें महिलाओं की समस्याओं से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर शोध करने वाली संस्था बार्कर इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन, वाशिंगटन के गैरी बार्कर जेंडर समानता पर अपने विचार रखते हुए समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता को प्रमुख कारण मानते हैं. निश्चय ही यह एक महत्वपूर्ण बिंदु बन सकता है. आर्थिक असमानता ने ही भारत के विभिन्न् राज्यों में महिलाओं की आर्थिक स्थिति को बेहद दयनीय बना दिया है. इस स्थिति का लाभ वह पुरुष-वर्ग आसानी से उठा लेता है जो आर्थिक रूप से सक्षम होता है और अपने बनाये हुए कानून की बैसाखी पर समाज को चलाते रहने के लिए जाना जाता है. दक्षिण एशियाई देशों में भी महिलाओं की स्थिति भारत की महिलाओं की स्थिति से बेहतर नहीं है. इसलिए जेंडर समानता और महिला-हिंसा जैसी सामान समस्याएं बंगलादेश के ढाका-सम्मलेन पर लगातार छाई रहीं. भारत की पुरजोर वकालत दक्षिण-एशियाई देशों के लिए संबल का काम करती रही. भारत की सामाजिक व्यवस्था में पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था का इतिहास काफी समृद्ध और पुराना है. इसके साथ ही इसी देश के कुछ राज्यों की आदिवासी जाति व जनजातियों में मातृ-सत्तात्मक व्यवस्था भी अपनी संस्कृति, परम्पराओं, संस्कारों, और रीति-रिवाजों के साथ आज भी जीवित है. यदि इसे ध्यान में रखा जाये तो हमें समझ में आयेगा कि समाज में जिसकी आर्थिक प्रमुखता होती है, उसी का वर्चस्व उसके समाज और समुदाय को दिशा देता है. यदि समाज में सामाजिक-व्यवस्था पुरुष-प्रधान है तो निश्चय ही समाज को पुरुष-प्रधान व्यवस्था के बनाये हुए कानून का पालन करना होगा. यदि व्यवस्था मातृ-सत्तात्मक है तो उसके कानून उसके अपने अनुसार होंगे. पुरुष-प्रधान (या स्त्री-प्रधान) समाज में परिवार के मुखिया पर परिवार की आवश्यकताओं का बोझ पड़ते ही वह एक तरह के नैतिक दबाव में आ जाता है. आर्थिक विपन्नता परिवार के मुखिया को पलायन की ओर ले जाता है. मुखिया होते हुए भी दायित्व का निर्वाह न कर पाने की हताशा उसे शराबखानों, जुएँ के अड्डों और वेश्यालयों तक पहुंचा देती है जहाँ से और भी अपराधों के दरिया मिल जाते हैं. शुरू की हताशा घरेलू हिंसा को जन्म देती है. बाद में सही रस्ते से भटक जाने की हताशा मनुष्य को महिला हिंसा की ओर अग्रसर करती है. यही स्थिति जब नियति में परिवर्तित हो जाती है तो व्यक्ति सेक्स की खरीद-फरोख्त को भी अश्लील, अवैध और अपराध नहीं मानता. जो संवेदनशील व्यक्ति इन कृतियों को अपराध मान लेता है वह डिप्रेशन की हालत में पहुंचकर आत्महत्या कर लेता है, इसमें पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी. यही गैर बराबरी का अनुपात जब समाज में गड़बड़ फैलाने लग जाता है तो हिंसा फूट पड़ती है जिसका प्रभाव महिला-हिंसा में अधिक देखा जा सकता है. बाल-यौन-शोषण, बाल-मजदूरी, दहेज़-हिंसा, बाल-तस्करी, वूमेन-ट्रैफिकिंग जैसी सामाजिक बुराइयाँ अकेले भारत में ही नहीं हैं बल्कि दक्षिण एशियाई देशों में भी हैं. बाल-मजदूरों का वीभत्स-रूप हम भारत-बंगलादेश से सटे सीमावर्ती इलाकों जैसे हरिपुकुर, गोविंदपुर, दक्षिण पाड़ा, हिली आदि गाओं के बच्चों को मजदूरी के बहाने उन्हें तस्करी के लिए इस्तेमाल किये जाते देख सकते हैं. क्षेत्रीय तस्कर इन्हें साबुन, दालें, चावल और कफ़-सिरिप व अन्य सामान सौंपकर लगभग एक किलोमीटर की सड़क पर लाकर छोड़ देते हैं. यह सड़क बांग्लादेश स्थित एक डेरे तक जाती है जहाँ इन बच्चों को सामान पहुंचा देना होता है. इस जोखिम में भारतीय सीमा पर तैनात बीएसेफ़ सैनिकों को बच्चों पर फायर खोलने या पकड़कर उन्हें जेल भेज देने में संकोच होता है. वे उन्हें चेतावनी देकर छोड़ देते हैं लेकिन वही बच्चे पुनः उनकी आँख से बचकर तस्करी करने में व्यस्त हो जाते हैं. इसी प्रकार मजदूर महिलाएं भी लुका-छुपाकर भारतीय साड़ी और फेसडील बांग्लादेश ले जाती हैं और पकड़े-जाने पर अपनी गरीबी का रोना रोने लग जाती हैं. इन सब कार्यों में उन्हें बहुत कम मजदूरी मिलती है फिर भी वे तस्करी करती हैं. ढाका-सम्मलेन में इस समस्या पर भी संजीदगी के साथ विचार-विमर्श किया गया और तलाशा गया कि इन समस्याओं से हमें मिलकर किस तरह से निपटा जा सकता है... जारी-/२) , Mob:0-9350934635 http://alpsankhyaktimes94gzb.com
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