महिला हिंसा...२ /डॉ. रंजन ज़ैदी
यह सच है कि सामाजिक परिवर्तन और विकास के चलते हमारे सामाजिक मूल्यों का भी ह्रास हुआ है. ऐसा मात्र भारत में ही हुआ हो, कहना गलत होगा. दूसरे विश्व महायुद्ध के बाद समस्त विश्व में आमूलचूल परिवर्तन हुए. महिला हिंसा का वैश्वीकरण इस बात का ज्वलंत प्रमाण है. ढाका सम्मलेन में भी गैरी के माध्यम इसकी ध्वनि सुनाई दी.
उनके अनुसार इसका कारण पारंपरिक व्यवसायों का ह्रास, खेती के संसाधनों का संकुचन और किसानों की गरीबी भी एक कारण माना जा सकता है. बढ़ते वैश्विक आर्थिक दबावों के कारण परिवारों के स्थायित्व का संतुलन लगातार असंतुलित होता जा रहा है. बढती ज़रूरतों के पूरा न होने और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के कारण जन्म लेती मानसिक उदद्विग्नता महिला हिंसा को बढ़ावा दे देती है. ऐसे में यदि महिला अपने पति या लड़कियां अपने परिवार की सहायता के लिए घर से बाहर निकलती हैं तो बाहर उनकी असुरक्षा उनके विकास पर अंकुश लगा देती है. महिला मजदूर का यौन शोषण ठेकेदार करता है, कंपनी या कारखाने में कार्यरत महिला अपने संपर्क सुपरवायिज़र या मालिक या सहयोगी कर्मचारी के हाथों छली जाती है. यह एक वीभत्स सामाजिक विडम्बना है और सामाजिक चुनौती है जिसका मुकाबला करते हुए ऐसी समस्याओं पर अंकुश लगाये जाने की ज़रुरत है. सम्मलेन में महिला हिंसा को बढाने में वर्ल्ड-मीडिया को भी कम दोषी नहीं माना गया. अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, बढ़ते युद्धोन्माद और अप्रत्याशित घट रही प्राकृतिक घटनाओं का घरेलू महिलाओं पर बुरा प्रभाव पड़ते देखा जा सकता है. दूसरे विश्व महायुद्ध से लेकर अबतक जब भी और जहाँ भी युद्ध हुए हैं, या वे क्षेत्र जो आतंकवाद से प्रभावित रहे हैं, उनका प्रभाव उस देश की महिलाओं और उनके बच्चों पर पड़े बिना नहीं रहा है. हिंसा से बच्चों के मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है जिसके दूरगामी परिणाम समाज में दिखाई दे सकते हैं. ऐसे माहौल में पलने और बड़े होने वाले बच्चे किशोरावस्था में ही घरों में काम करने वाली कमसिन नौकरानियों का बलात्कार कर उनकी हत्या तक कर डालते हैं. ऐसे अनेक उदाहरणों से भारत के क्राईम-रिकार्ड भलीभांति खंगाले जा सकते हैं क्योंकि भारत के शहरी इलाकों में सस्ती कामगार कमसिन नौकरानियों की मांग लगभग ७५% तक बढ़ चुकी है और गत वर्ष यह आंकड़ा २१.२०% की गति से आगे बढ़ता देखा गया था जो कि शहरीकृत समाज की बदलती भौतिकवादी विचारधारा की सूचक है. दुःख की बात यह भी है कि अधिकतर बलात्कारिक महिलाओं और बच्चियों की रपटें पुलिस दर्ज ही नहीं करती है जैसा कि अभी हाल में उत्तर प्रदेश में सामूहिक बलात्कार का मामला प्रकाश में आया लेकिन पुलिस ने उसकी प्रथम प्राथमिकी दर्ज नहीं की. पिछले रिकार्ड को देखें तो हम पाएंगे कि इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट १९५६ के अंतर्गत उत्तर प्रदेश की पुलिस ने जो गिरफ्तारियां कीं उनमें ८७% महिलाएं थीं लेकिन पुरुष एक भी नहीं..., क्यों.? Mob:+91 9350934635 alpsankhyaktimes94gzb.com, www.dw-world.de/hindi
उनके अनुसार इसका कारण पारंपरिक व्यवसायों का ह्रास, खेती के संसाधनों का संकुचन और किसानों की गरीबी भी एक कारण माना जा सकता है. बढ़ते वैश्विक आर्थिक दबावों के कारण परिवारों के स्थायित्व का संतुलन लगातार असंतुलित होता जा रहा है. बढती ज़रूरतों के पूरा न होने और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के कारण जन्म लेती मानसिक उदद्विग्नता महिला हिंसा को बढ़ावा दे देती है. ऐसे में यदि महिला अपने पति या लड़कियां अपने परिवार की सहायता के लिए घर से बाहर निकलती हैं तो बाहर उनकी असुरक्षा उनके विकास पर अंकुश लगा देती है. महिला मजदूर का यौन शोषण ठेकेदार करता है, कंपनी या कारखाने में कार्यरत महिला अपने संपर्क सुपरवायिज़र या मालिक या सहयोगी कर्मचारी के हाथों छली जाती है. यह एक वीभत्स सामाजिक विडम्बना है और सामाजिक चुनौती है जिसका मुकाबला करते हुए ऐसी समस्याओं पर अंकुश लगाये जाने की ज़रुरत है. सम्मलेन में महिला हिंसा को बढाने में वर्ल्ड-मीडिया को भी कम दोषी नहीं माना गया. अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, बढ़ते युद्धोन्माद और अप्रत्याशित घट रही प्राकृतिक घटनाओं का घरेलू महिलाओं पर बुरा प्रभाव पड़ते देखा जा सकता है. दूसरे विश्व महायुद्ध से लेकर अबतक जब भी और जहाँ भी युद्ध हुए हैं, या वे क्षेत्र जो आतंकवाद से प्रभावित रहे हैं, उनका प्रभाव उस देश की महिलाओं और उनके बच्चों पर पड़े बिना नहीं रहा है. हिंसा से बच्चों के मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है जिसके दूरगामी परिणाम समाज में दिखाई दे सकते हैं. ऐसे माहौल में पलने और बड़े होने वाले बच्चे किशोरावस्था में ही घरों में काम करने वाली कमसिन नौकरानियों का बलात्कार कर उनकी हत्या तक कर डालते हैं. ऐसे अनेक उदाहरणों से भारत के क्राईम-रिकार्ड भलीभांति खंगाले जा सकते हैं क्योंकि भारत के शहरी इलाकों में सस्ती कामगार कमसिन नौकरानियों की मांग लगभग ७५% तक बढ़ चुकी है और गत वर्ष यह आंकड़ा २१.२०% की गति से आगे बढ़ता देखा गया था जो कि शहरीकृत समाज की बदलती भौतिकवादी विचारधारा की सूचक है. दुःख की बात यह भी है कि अधिकतर बलात्कारिक महिलाओं और बच्चियों की रपटें पुलिस दर्ज ही नहीं करती है जैसा कि अभी हाल में उत्तर प्रदेश में सामूहिक बलात्कार का मामला प्रकाश में आया लेकिन पुलिस ने उसकी प्रथम प्राथमिकी दर्ज नहीं की. पिछले रिकार्ड को देखें तो हम पाएंगे कि इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट १९५६ के अंतर्गत उत्तर प्रदेश की पुलिस ने जो गिरफ्तारियां कीं उनमें ८७% महिलाएं थीं लेकिन पुरुष एक भी नहीं..., क्यों.? Mob:+91 9350934635 alpsankhyaktimes94gzb.com, www.dw-world.de/hindi

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