प्रोफ़ेसर बुद्धसेन शर्मा 'नीहार' नहीं रहे./ रंजन ज़ैदी

रंजन ज़ैदी  
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          डॉ. नीहार  मूलतः अपनी कविताओं के खुद भी प्रशंसक थे और खुद ही आलोचक भी. कहते थे, मैं ही वेद                         हूं, मैं ही ग़ालिब, मैं ही निराला, मैं ही टैगोर. मैं ही गीतांलि हूँ, मैं ही बहती नदी का समय हूँ.

 अलीगढ़ के एक साहित्यिक मित्र हैं भाई सुरेश कुमार, उनकी ही एक दुखद खबर से पता चला कि हिंदी के वरिष्ठ कवि-आलोचक  प्रोफ़ेसर बुद्धसेन नीहार अब इस दुनिया में नहीं रहे.
 
      प्रोफ़ेसर बुद्धसेन नीहार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर थे. जब मैं एम. ए. का छात्र था तब वह  हमें प्राध्यापक के रूप में 'हिंदी काव्य' फर्राटेदार अंग्रेजी में निराला और नई कविता के सोपान पढ़ाया करते थे. 

      देखते-देखते वह कब मेरे अभिन्न-मित्र बन गए और मैं कब उनके परिवार का एक महत्वपूर्ण सदस्य बन गया, पता ही नहीं चला. उनके संपर्क में आने के बाद ही मुझे पता चला कि मानवीय चरित्र का विशेष गुण और उसका तत्व 'परस्पर विश्वास' में होता है.

      डॉ. नीहार  मूलतः कवि थे. वह बड़े कवि थे, या साधारण, इसके लिए सर्व-प्रथम हमें उनके काव्य के भीतर की अंतरंगता के  परिदृश्य में समान वैचरिक चिंतन का अध्ययन करना होगा. पता करना होगा कि क्या उनकी रचनाओं में जिस प्रकार का औत्सुक्य, उत्साह, दृष्टिकोण, और उसमें भी कोई आतंरिक तनाव पाया जाता है,  कहीं उसके तार शेक्सपियर के पोएटिक-ड्रामों में इस्तेमाल की गई लिरिकल-पोएट्री से तो नहीं जुड़ जाते हैं. यह बात मैं इस लिए कह रहा हूँ कि डॉ. नीहार ने एक बार मुझसे कहा भी था कि उनके भीतर के काव्य में शेले, वर्ड्स-वर्थ और ब्लैक की पोएट्री इस तरह से मथ गई है मानो दही में राब घुली हो और मक्खन के बुलबुलों ने पूरी मिठास को अपनी शॉल से  ढक दिया हो.       
      
      डॉ. नीहार  मूलतः अपनी कविताओं के खुद भी प्रशंसक थे और खुद ही आलोचक भी. कहते थे, मैं ही वेद हूं, मैं ही ग़ालिब, मैं ही निराला, मैं ही टैगोर. मैं ही गीतांलि हूँ, मैं ही बहती नदी का समय हूँ. ऐसी सोच हिंदी विभाग के प्राध्यापकों में किसी की भी नहीं थी. न  डॉ.के.पी. सिंह की, न डॉ. ज़ैदी जाफ़र रज़ा की और न ही दूसरे बौद्धिक प्रोफ़ेसरों की. इसी आत्मविश्वास से प्रभावित होकर मैं निहार जी के क़रीब से क़रीबतर (दोस्तों की श्रेणी में) पहुँचता चला गया. तभी मैंने उन्हें राय दी कि वह निराला से आगे बढ़ें. उनका काव्य-संग्रह 'समय बहती नदी' उसी कोशिशों का नतीजा था. जिसका कालांतर में दिल्ली की एक साहित्यिक संस्था 'समग्र विचार मंच के तत्वाधान में लोकार्पण किया गया. वह एक ऐतिहासिक क्षण था जब समारोह में हिंदी के दिग्गज साहित्यकार शामिल हुए थे और डॉ. नीहार अपने परिवार सहित इसमें उपस्थित हुए थे. 

      इस सफल आयोजन के बाद नीहार जी आत्मविश्वास से भर गए थे. यहीं से उनकी रचनात्मकता में एक नया मोड़ आया और वह साहित्य के इतिहास में एक नए आंदोलन का सपना देखने लगे.  (क्रमशः /-2 
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