प्रोफ़ेसर बुद्धसेन शर्मा 'नीहार' नहीं रहे-2/ रंजन ज़ैदी
प्रोफ़ेसर बुद्धसेन शर्मा 'नीहार' नहीं रहे./ रंजन ज़ैदी ://alpst-poltics.blogspot.com/2022/01/blog-post_08.html
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और जब वह गुलाब बनकर नया जन्म लेने वाले हों तो मेरे गमले को ज़रूर याद रखें कि इस गमले में जो पौधा है उसकी मिट्टी में मेरा शिष्य दफ़्न है और वह भी एक नयी स्थाई क्रांति का स्वप्न देख रहा है.
नीहार जी के देहावसान ने मुझे हिलाकर रख दिया है.
1977 में इस महान स्वप्न-दृष्टा से अलीगढ की एक बंद गली के आखरी छोर पर स्थित छोटे से स्कूल में मेरी भेट हुयी थी और उसे लगा था कि उसके मस्तिष्क में जन्म ले रहे भूमण्डल के ताप में मैं ही शायद किसी ज्वालामुखी का रूप लेकर उनकी स्थायी-क्रांति का विस्फोट कर सकूंगा ....और इसके बाद से ही वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में मेरे प्रथम बौद्धिक मित्र बन गए थे. तब वह फैकल्टी ऑफ़ आर्ट के हिंदी विभाग में वरिष्ठ प्राध्यापक थे और मैं एम.ए. हिंदी का छात्र. काश! राजनीति से इतर मैं उनके अंडर ही शोध कर पाता.
छात्र जीवन में नीहार जी ने एएमयू में मुझे बहुत कुछ सोचने के नए ज़ाविये दिए। मेरी साहित्यिक सोच को नयी रचनात्मकता प्रदान की. समझाया कि मैं एएमयू में ही रहूँ, यहीं रहकर हिंदी विभाग को नए आयाम दूँ. प्रथम श्रेणी का छात्र हूँ ...., लेकिन मैं वहां हिंदी विभाग की आतंरिक उठा-पटक से कॉफ़ी चिंतित रहा करता था. 'प्राध्यापक' के पास पीएचडी के टॉपिक थे. नीहार जी की भी यही इच्छा थी लेकिन....? अचानक डॉ. ज़ैदी जाफ़र रज़ा के पीछे से मेरी ज़िन्दगी में राही मासूम रज़ा आ गए और डॉ. ज़ैदी जाफ़र रज़ा ने मुझसे प्रतिशोध ले लिया. उसकी तपन में मेरा भविष्य न केवल झुलस गया बल्कि शोध के नाम पर मुझ से उन्होंने मेरे 7वर्ष भी छीन लिए.
इन द्वंद्वात्मक वर्षों में भी डॉ. बुद्धसेन शर्मा निहार और उनका परिवार गले-गले तक मेरे साथ रहा. अंततः विभागीय उठा-पटक से तंग आकर मैंने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से ही अपना नाता तोड़कर स्थाई रूप से दिल्ली आकर भारत सरकार की पत्रिका 'समाज कल्याण' का संपादक बन गया.
डॉ. नीहार ने तब कहा था, इस महाद्वीप पर अकेले तुम ही शिकार नहीं हुए हो, लाखों वर्षों से खरबों होमोसेपियंस के अरबों घर उजाड़ दिए गए है. इस सोच के बाद ही मैंने डॉ. नीहार के विचारों का अध्ययन करना प्रारम्भ किया और इस सच्चाई को स्वीकारना पड़ा कि सचमुच होमो सेपियंस ने हमारे हरे-नीले ग्रह को अपनी कुंठित सोच के वशीभूत कंक्रीट के जंगल में बदलकर रख दिया है।साहित्य व राजनीति के दलदल सूखने लगे हैं, मैदान पानी से भरते जा रहे हैं. जंगल कटते गए हैं. ढाई लाख बचे चिंपैंजिज़ होमोसेपियंस से डर कर छुपने लगे हैं और पृथ्वी के इस महाद्वीप की सरहदों को सात अरब घरों ने एक बड़ी जेल में तब्दील करके रख दिया है.
इसी दर्द ने उस जीवंत बुद्धिजीवी को भी बेचैन कर दिया था जिसे हम इंसानी शक्ल में बुध्दसेन शर्मा के नाम से जानते हैं. जो अब हमारे बीच नहीं है जो कवि भी था, आलोचक भी था. जो औद्योगिक क्रांति की भीड़ में पिसते हुए एक नयी वैश्विक स्थायी क्रांति का ख्वाब देखने लगा था, लेकिन जानकार उस पर हंसते रहते थे.
जब हम किसी साहित्यकार के सम्बंध में कुछ जानना चाहते हैं, कुछ लिखना चाहते हैं तो हमें उसके पूरे ओरा का अध्ययन व अवलोकन करना पड़ता है. हडसन ने कहा था, 'A great book is born of the brain and heart of its author.' यानि एक श्रेष्ठ रचना लेखक के मन- मस्तिष्क से जन्मी उसकी अपनी सर्जनात्मक अभिव्यक्ति है, he has put himself into its pages, partake of his life, and are instinct with his individuality... जिसमें उसकी अपनी स्वभावगत विशेषताएं और वैयक्तिक प्रेरणाएं शामिल होती हैं.*
डॉ. बुद्धसेन शर्मा 'नीहार' की रचनात्मक धर्मिता को समझने के लिए हमें ऐसे ही ओरा से गुज़रना होगा क्योंकि वह न केवक एक कुशल अध्येयता थे बल्कि कवि भी थे, आलोचक भी. कवि निराला पर उनका बहुत काम था. डॉ. बुद्धसेन शर्मा 'नीहार' ने अपने शोध-प्रबंध में निराला के जीवन के जो डायग्राम रेखांकित किये हैं, वे न केवल अद्भुत हैं बल्कि अत्यंत सराहनीय भी हैं.
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और जब वह गुलाब बनकर नया जन्म लेने वाले हों तो मेरे गमले को ज़रूर याद रखें कि इस गमले में जो पौधा है उसकी मिट्टी में मेरा शिष्य दफ़्न है और वह भी एक नयी स्थाई क्रांति का स्वप्न देख रहा है. https://alpst-poltics.blogspot.com/2022/01/2.html
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