@ranjanzaidi786 हिंदी-उर्दू का भारतीय लेखक भी मानसिक रूप से ग़ुलाम होता है. उसे अपने देश की भाषा का साहित्य नहीं सुहाता है. विदेशी भाषाओँ का नाम और उसके साहित्य का नाम लेकर बड़केँ हांकना उसकी प्रवृति है. भारतीय भाषाओँ में बहुत ऊंचे क़द का भी साहित्य है. देखें तो सही.
      कैसी अजीब विडम्बना है कि उर्दू को सांप्रदायिक ज़हनियत ने दौड़ा-दौड़ाकर बेदम कर दिया, तब कांग्रेस थी, अब बीजेपी की सरकार है जिसके शासनकाल में इस देश के अल्पसंख्यकों के अखलाक़ (सदाचार) की भी हत्या की जाने लगी है.

जहांगीर और औरंगज़ेब के ज़माने में जब मुल्लाइज़्म का ग्राफ चढ़ गया था जिसके शिकार आगरा में जहांगीर के शासनकाल में उसी के आदेश पर ('हज़रत अली' पर लिखी गई पुस्तक 'अल जलालिया' के विद्वान लेखक मशहद निवासी आव्रजक) क़ाज़ी नूरुल्लाह शुश्तरी (आगरा-1599) शिकार हुए, औरंज़ेब के समय शीयों पर इस सीमा तक ज़ुल्म हुआ कि उन्हें आलमे-तक़य्या (आपातकाल में धर्म-परिवर्तन) में सुन्नी
      समुदाय की शरण में जाना पड़ा. बिजनौर (.प्र.) में पाये जाने वाले 'सुन्नी ज़ैदी' उसी परिस्थिति की देन हैं.
      मोहन भागवत कहते हैं कि समय-काल सभी को हिन्दू बना देगा. एक अच्छा सपना है. दुनियाभर में पहले मूर्तिपूजक ही तो थे, फिर वैचारिक द्वंदों के बीच युद्ध शुरू हुए तो बहुत से बाज़ार सामने गए. गुलामों की मंडियां लगने लगीं. मिट्टी, मिट्टी को खाने लगी. प्रकृति कितनी रहस्यमयी है. खेत घमंड करता है तो टिड्डियाँ जाती हैं. संस्कृतियाँ टकराती हैं तो कथित सभ्य शहर समुद्र में विलीन हो जाते हैं.
      काश, भागवत यह बात समझ पाते कि जंगलों से निकलकर करोड़ों देवी-देवता आजतक किसी भी धर्म, आस्था और विश्वास का अंत नहीं कर पाये. मोहन भगवत (जो मुझे किन्हीं कारणों से बहुत पसंद हैं), काश! एक नीम का पौधा उगाने की ताक़त रख रहे होते, नीम की पत्ती को वह डिज़ाइन कर पाते. वह एक मिटटी का जिस्म लिए दुनिया की तहज़ीबें बदलने का स्वप्न यह जाने बग़ैर क्यों देख रहे हैं कि तहज़ीबें भी मिटती हैं, तारीखें भी. कल कोई और आएगा. उसका दीन-इलाही कुछ और होगा. फिर अखलाक़ (सदाचार) के ही जनाज़े क्यों? ज़रा सोचिये तो!

      गुजरात दंगों ने सामुदायिक सोच को मज़बूत दिशा देने के लिए सांप्रदायिक पहचान सुनिश्चित की, मुज़फ्फर नगर के दंगों में इसी सोच को यथार्थ का रूप दिया गया. विश्व हिन्दू परिषद् हिंदुत्व को संगठित धर्म का रूप देना चाहता है, जबकि इस देश का हिंदुत्व, संगठित धर्म नहीं, विभिन्नताओं से भरी मिली-जुली संस्कृतियों का गुलदान है. संगठित धर्म का दर्शन पिछले दरवाजे से वर्चस्व के भाव को प्रभावी होने का अवसर देता है. इसी अवधारणा ने पाकिस्तान को जन्म दिया, पाकिस्तान ने बंगला देश को जन्म दिया, अफगानिस्तान गृहयुद्ध का शिकार बना जहाँ संगठित धर्म के मतावलंबी दर्जनों देशों के आतंकवादी एक जगह मिलकर लड़े लेकिन उनमें कोई भी भारतीय मुसलमान युवक संगठित धर्म की रक्षा के लिए नहीं गया. ऐसा इसलिए हुआ कि भारत का हिंदुत्व संगठित धर्म के दर्शन से आप्लावित नहीं है, उसने संगठित धर्म के अनुयायियों में जहाँ एक ओर इस्लाम सूफीवाद के दर्शन को सम्मान दिया वहीँ सिक्खिज्म जैसे संगठित धर्म को भी स्वीकार कर लिया। समस्या ये है कि अरएसेस और विश्व हिन्दू परिषद् जैसे संगठन अब हिंदुत्व को संगठित धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित करने के प्रयास में उसका राजनीतिकरण कर मुस्लिम समुदाय को हाशिये पर डाल देना चाहते हैं, यह एक खतरनाक सोच है जिसे भारत का सहिष्णु नागरिक शायद ही कभी स्वीकार कर पायेगा।

      गुजरात दंगों ने सामुदायिक सोच को मज़बूत दिशा देने के लिए सांप्रदायिक पहचान सुनिश्चित की, मुज़फ्फर नगर के दंगों में इसी सोच को यथार्थ का रूप दिया गया. विश्व हिन्दू परिषद् हिंदुत्व को संगठित धर्म का रूप देना चाहता है, जबकि इस देश का हिंदुत्व, संगठित धर्म नहीं, विभिन्नताओं से भरी मिली-जुली संस्कृतियों का गुलदान है.

      संगठित धर्म का दर्शन पिछले दरवाजे से वर्चस्व के भाव को प्रभावी होने का अवसर देता है. इसी अवधारणा ने पाकिस्तान को जन्म दिया, पाकिस्तान ने बंगला देश को जन्म दिया, अफगानिस्तान गृहयुद्ध का शिकार बना जहाँ संगठित धर्म के मतावलंबी दर्जनों देशों के आतंकवादी एक जगह मिलकर लड़े लेकिन उनमें कोई भी भारतीय मुसलमान युवक संगठित धर्म की रक्षा के लिए नहीं गया. ऐसा इसलिए हुआ कि भारत का हिंदुत्व संगठित धर्म के दर्शन से आप्लावित नहीं है, उसने संगठित धर्म के अनुयायियों में जहाँ एक ओर इस्लाम सूफीवाद के दर्शन को सम्मान दिया वहीँ सिक्खिज्म जैसे संगठित धर्म को भी स्वीकार कर लिया। समस्या ये है कि अरएसेस और विश्व हिन्दू परिषद् जैसे संगठन अब हिंदुत्व को संगठित धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित करने के प्रयास में उसका राजनीतिकरण कर मुस्लिम समुदाय को हाशिये पर डाल देना चाहते हैं, यह एक खतरनाक सोच है जिसे भारत का सहिष्णु नागरिक शायद ही कभी स्वीकार कर पायेगा।

कभी किसी को 'बहुत ख़ास' मत कहना, कोई भी चीज़ कभी जाविदां नहीं होती.
कभी ज़िन्दगी की किताब को न पढ़ा हो पढ़ के सुनाओ तो, जो तुम्हारे ज़ख्म भरे न हों, वही ज़ख्म हमको दिखाओ तो.

तलब थी जिसकी मगर  वो ही दस्तियाब न थी,       
न  थी   शराब , न    साक़ी   न  कोई मयख़ाना.
बहुत   तलाश   किया   क़ब्र   में   'ज़ुहैर' हमने, 
नहीं   था  ताक़,  तिजोरी  न   कोई   तहखाना.

तुम्हारा हाकिम जरायम-पेशा है. तुम किसे तलाश करते हो?


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