सोनू निगम को भी अवाम को बताना चाहिए कि उसकी सोच..../ डॉ. ज़ैदी ज़ुहैर अहमद

सोनू-निगम परिवार सहित प्रधान मंत्री  नरेंद्र मोदी के साथ 
मैंसमझता हूँ कि सोनू निगम को अगर सियासत में नहीं जाना है तो इस दलदल से दूर रहें. सोनू निगम एक बड़ा गायक-कलाकार है. 
पिछले सप्ताह मैं मुंबई में था. सोनू और दिल्ली के अपने उस प्यारे गायक व गीतकार यानि कैलाश खेर  (जिसने 'टूटा-टूटा एक परिंदा ऐसे टूटा.'.लिखा और गाया था) से मिलने की योजना बना रहा था. मैं चाहता था कि मेरा एक गीत 'अल्ला बस, बाक़ी हवस' इन दोनों में से कोई गाये. जब सोनू निगम का अज़ान-विवाद सुना तो बढ़ते पाँव रुक गए. कष्ट भी हुआ. मेरे विचार से सोनू निगम  को  इस तरह के विवाद में नहीं पड़ना चाहिए था, लेकिन जिस तरह से मीडिआ इस मुद्दे को उछाल रही है उससे मामला पेचीदह लगता है. संदेह भी होता है कि कहीं सोनू निगम राजनीति (राज्य-सभा)  में जाने की तैयारी तो नहीं  कर रहे हैं क्योंकि सूत्रों की माने तो रेखा और सचिन शायद बहुत जल्द इस्तीफ़ा दे दें. इसपर कांग्रेस अभी तक मौन है. सूत्र यह भी बताते हैं कि बीजेपी के एक गायक युवा केंद्रीय मंत्री की सलाह पर सोनू निगम ने इस तरह का विवादित बयान दिया था और उसे गाढ़ा करने के लिए बंगाल के एक युवा मौलाना को साथ लिया गाया था. यह एक सोची-समझी कांसप्रेंसी लगती है. बंगाल की सरकार के विरुद्ध वैसे भी बीजेपी राजकीय चुनाव 

को देखते हुए ममता के विरुद्ध अलोकप्रिय प्रचार करने में व्यस्त है. अभी हाल में ही ममता के विरुद्ध अफवाह
उड़ाई गयी थी की वह हिन्दू नहीं है और वह गाय का गोश्त खाती हैं, तिरुपती-मंदिर ने उनकी आमद पर रोक लगा दी है. निश्चय ही यह एक घटिया प्रचार बंगाल के आम हिन्दुओं  और मुसलमानों के बीच किया जा रहा है, ताकि वहां भी बीजेपी नफरत की राजनीती करके ममता के विरुद्ध हिन्दुओं को एकजुट करने में कामियाब हो. सोनू निगम का अज़ान का मुद्दा इसके आगे की कड़ी जान पड़ती है. 

      सवाल यह है कि अज़ान क्या सचमुच लोगों की नीदें हराम करती है? क्या उन्होंने कभी भी अज़ान के समय अपने गायन के रियाज़ को नहीं रोका? क्या उन्हें सचमुच अज़ान और मुसलमानों से नफ़रत है? जितना मैं जनता हूँ, उसके हिसाब से मैं कह सकता हूँ कि सोनू निगम साम्प्रदायिक ज़हनियत के हो ही नहीं सकते. क्योंकि वह मुस्लिम-शराब में गले-गले तक डूबे हुए हैं.
     
तब? क्या अब सोनू निगम ने राजनीति में जाने का मन बना लिया है? यदि यह सही नहीं है तो उन्होंने पास के थाने में उस आसमान से टपके तथाकथित मौलवी के विरुद्ध प्रथम प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं कराई जो खुल्ल्म-खुल्ला गुंडागर्दी कर रहा है.  वह किस और कहाँ की सुन्नी मस्जिद का पेश-इमाम या मोअज़्ज़िन हैं? उसे फ़तवा देने का अधिकार किसने दिया हैं?  देश की ग़ैर खरीदी मीडिया को इसका भी खुलासा करना चाहिए.  
      वैसे तो इंडस्ट्री में किसी भी शरारती की एक धमकी भरे फोन पर मुंबई की पुलिस तुरंत हरकत में आ जाती है, लेकिन इस गुंडे मवाली कथित मौलवी के विरुद्ध पुलिस ने कोई कार्यवाई  नहीं की, क्यों? उसे न करने पर किसने मजबूर किया था? यह एक वीआईपी की सुरक्षा से जुड़ा मामला है. सोनू निगम देश का एक बड़ा लोकप्रिय गायक है, इतनी उपेक्षा किसके कहने पर की गई ? ताज्जुब यह कि सोनू निगम ने कानून का सहारा लेने के बजाये अपना सर ही घुटवा लिया, क्या अब वह गले में जूतों का हार भी डालेंगे......? सवाल यह हैं कि इतनी मजबूरी क्यों हैं? क्या राजनीति में आने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाना शोभा देता हैं? 
      ऐसा लगता हैं मानो सत्ता में आने के लिए देश में दंगे कराने ज़रूरी हैं, मुसलमानो को गावों से निकालना और उनकी हत्या करवाना भी ज़रूरी हैं. गुजरात के दंगों ने देश को बता दिया कि सत्ता के शिखर पर पहुँचने के लिए गुजरात मॉडल के ऑपरेशंस ज़रूरी हैं. यहाँ यह भी सोच प्रबल हो गई कि किसी भी देश की सत्ता का संघर्ष खून के दरियाओं से होकर सिंहासन तक पहुॅचता आया है. कभी यह संघर्ष सत्ता पाने से पहले होता है तो कभी बाद में।                

    एक और खूबसूरत बंगाली गायक है अभिजीत भट्टाचार्य,  जिसने असंख्य कामियाब गीत गाये हैं. जब कामियाबी का सूरज ढलने लगा तो वह संयोग से भाजपाई हो गया, लगा  पाकिस्तान और भारतीय मुसलमान को गालियाँ देने. दरअसल जब कोई चरमपंथी पाकिस्तान के मुसलमानों को गालियाँ देता है तो समझ लेना चाहिए कि वह उनकी आंड में भारतीय मुसलमानों को कोस रहा है. 
      दूसरे विश्व-महायुद्ध के दौरान जब अमेरिका की सेना शत्रुओं के जासूसों और साम्यवादी विचारधारा के लोगों को कैद कर लेती थी तो हुक्म होता था, इन्हें मास्को भेजदो, माने इन्हें शूट करदो. चीन और जापान भी ऐसा ही करते थे, वे जासूसों को 'रेड-कोर्ट' में भेज देने का आदेश दे देते थे. यह एक भयानक और अमानवीय मौत होती थी. कुछ द्वीपों पर लाल चींटियों की असंख्य बांबियां पाई जाती थीं. दण्डित जासूस को शहद से लेपकर बड़े-बड़े दहानों वाली बांबियों में लिटा दिया जाता था जहाँ से वे बाहर  नहीं आ सकते थे और कुछ ही देर में चींटियां उन्हें पिंजर में तब्दील कर दिया करती थीं. 
      इसी तरह की चरमपंथी विचारधारा के धारदार हथियार भारतीय मुसलमानों के विरुद्ध इस्तेमाल किये जाते रहते हैं. इससे उन्हें लगता है कि बीजेपी प्रसन्न होकर सत्ता की कुंजी उनके हवाले कर देगी. लेकिन देखा यह गया है, सबको ऐसा करने पर भी कुछ हासिल नहीं होता है.   
      यह सच है कि बीजेपी एक सियासी पार्टी है. उसमें आ जाने की ख्वाहिश बहुतों में रहती है क्योंकि आज वह सत्ता में है. लेकिन यह भी सच है कि बीजेपी के पास भी ऐसे राई के दाने नहीं हैं जो पत्थर बनकर मुसलमानों को पूरी तरह से हवा में उड़ाकर रख दें. इस पार्टी में भी बहुत अच्छे, संस्कार वाले विद्वान, समझदार सियासतदां
नेता भी हैं जो सबको साथ लेकर चलना भी चाहते हैं लेकिन सत्ता में पहुंचने की ललक कुछ लोगों को इतना एक्साइटेड कर देती है कि वे दंगे तक करा देते हैं मानो बीजेपी यही चाहती है. यही मूर्खता है. सोनू निगम ने ऐसी मूर्खता की होगी, मुझे इसमें कुछ-कुछ संदेह है. 
      सोनू निगम एक संस्कारशील गायक कलाकार है. उसके कितने ही गुरु और उनके घराने उसकी ज़िन्दगी की दौलत हैं, वह सबके पांव छूता है. उसे कैसे मुसलमानो से नफ़रत हो सकती है. उसने जीवन में बहुत संघर्ष किया है. फिल्मों में नाकाम भी हुआ है. गायन के क्षेत्र में इन दिनों भले ही उसे बहुत कामियाबी नहीं मिल रही हो, लेकिन आज भी वह एक बड़ा पार्श्व-गायक है. उसे लेकर मीडिआ को इतना एक्साइटेड या सेंसेशनल नहीं होना चाहिए. 
      सोनू निगम को भी अवाम को बताना चाहिए कि उसकी सोच उस तरह की नहीं है जैसी मिडिया प्रचारित कर रहा है. उसे देश के कानून पर भरोसा होना चाहिए जो उसके साथ है और हमेशा साथ रहेगा. 
                                                                                                                                                                                            -डॉ. ज़ैदी ज़ुहैर अहमद 
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