मधुमक्खियों को इसकी खबर तक नहीं होगी./डॉ. ज़ैदी ज़ुहैर अहमद

मधुमक्खियों को इसकी खबर तक नहीं होगी./डॉ. ज़ैदी ज़ुहैर अहमद
      मैंने तीन तलाक़ पर आरएसएस और बीजेपी सरकार को शिद्दत से मुहब्बत करते पहले
कभी नहीं देखा जिसका सर-पैर ही नहीं है.
      सुन्नियों में तीन तलाक़ का मर्ज़ ला-इलाज है जिसका फायदा उठाने का प्रयास खाड़ी पश्चिमी देशों में कार्यरत युवक करते हैं. ऐसा रोग बहरतीय एनआरआई सिखों, पंजाबियों में भी है. दहेज़ के लालची समाज के हर समुदाय में मौजूद हैं. निम्न और मध्य वर्ग की बेटियों को बियाहकर वे विदेशों में इसलिए भी ले जाते हैं ताकि उनसे मेड की भूमिका में  मुफ्त काम  कराया जा सकें. जब भेद खुलता है तो बेटियों को उनके हर तरह से दण्डित प्रताड़ित कर उनके मायके भेज दिया जाता है.
      सुन्नी मुस्लिम समुदाय में तीन तलाक़ का इस्तेमाल अधिकतर इसी तरह के बदमाश परिवारों में अधिक होता है. तलाक़ खुदा की नज़र में एक भयानक गाली और शादीशुदा औरत के लिए बेहद भद्दी बद्दुआ है. क़ुरआन इसकी  पुरज़ोर भर्त्सना करता है. इसके बावजूद निम्न-वर्गों में निरंतर तलाक़ होते रहते हैं क्योंकि उन्हें जमाती मुल्लाओं ने गाँव की मस्जिद में तबलीग़ के दौरान यही बताया है कि तीन बार तलाक़ दे देने से बीवी मुस्लमान के लिए हराम हो जाती है. जबकि पूरा सच उन्हें ठीक से इसलिए नहीं बताया जाता है क्योंकि मदरसे से निकला हुआ अधकचरा कथित मुल्ला ख़ुद उसके सम्बन्ध में पूरी तरह से नहीं जनता है. शुक्र है कि सरकार ने इस रोग के इलाज की ज़िम्मेदारी ख़ुद अपने कन्धों पर उठाली है. यह इसलिए कि दूसरे के फटे में उसे अपनी टांग अड़ाने में अपने एजेंडे के अनुसार मज़ा आता है. 2019 के चुनाव से पहले उसे मुसलमानो का दिल जीतना होगा ताकि बाबरी मस्जिद बनाम राम-जन्म भूमि के निर्माण में किसी तरह की भी बाधा आये और बीजेपी चुनाव जीत सके. निश्चय ही अगला चुनाव बैलेटबॉक्स का होगा, ईवीएम मशीन से नही. देश की जनता अब इसे नकार चुकी है.   
     बीजेपी तब अपनी टांग नहीं अड़ाती है जब मुस्लिम समुदाय का गरीब सरकारी नौकरियों में चपरासी की नौकरी की भीख मांगता है. उसे तब भी शर्म नहीं आती है जब इसी समुदाय के ज़हीन युवाओं को पुलिस और प्रशासनिक सेवाओं के अतिरिक्त विदेशी सेवाओं, बैंकों अन्य सरकारी महकमों-निकायों में नौकरियों की ज़रुरत होती है. उनके पास तो कोटा भी नहीं होता है.
      देश के २० करोड़ मुसलमानों के लिए अपने ही देश में नौकरियां नहीं है लेकिन उनकी शादियों, बच्चों और उनके तलाक़ों के लिए आरएसएस और बीजेपी बहुत दुखी है. उसे इस बात का ग़म है कि देश में ग़रीब बच्चे मदरसों में ही सही, पढ़ क्यों रहे हैं? उसे लगता है कि मदरसे आतंकवाद को जन्म देते हैं. मुझे याद है नाना जी देशमुख तब श्रीमती मृदुला सिन्हा (केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की तब की अध्यक्ष अब की गोवा की  राज्यपाल) की स्वयंसेवी संस्था के वार्षिक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेने आये थे. तभी उनसे मेरी अनौचारिक
मुलाक़ात हुई थी. उसी के दौरान बातचीत के बीच उन्होँने कहा था कि तुमलोग लाख योजनाएं चलाओ मगर जबतक ग़रीब और पिछड़ों के अंतिम आदमी तक योजनाओं का पैसा और कार्यक्रम नहीं पहुंचेगा, तब तकदेश तरक़्क़ी नहीं कर पर पाएंगे. मैंने कहा, इसमें मुस्लमान भी शामिल है? उन्होँने कहा, 'वो अलग थे ही कब. उन्हें हमारे नज़दीक आने ही कब दिया जाता है. देखो ज़ैदी, संवाद करोगे तो भ्रांतियों के शीशे टूटेंगे. दोनों समुदायों को क़रीब आना होगा. तुम आये हो, हमारा विचार जान रहे हो, नहीं आते तो हम वही कहेंगे जिससे हमारा कोई नुकसान हो.' मैंने इतनी साफगोई से वानखेड़े गुरु जी के अतिरिक्त किसी को बात करते नहीं पाया था. नानां जी ने कहा था, 'उनकी संस्था नेपाल बार्डर पर एक पिछड़े समुदाय को सूअर-पालन का रोज़गार दे रही है और इस योजना से वे आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं. ऐसे ही हम मुस्लिम समुदायों में भी काम करना चाहते हैं. लेकिन वे हमारे पास दिल से आना नहीं चाहते. जो आते है, वे लाभ उठाते हैं.'
      मुस्लिम समुदाय के एक बड़े धड़े में मुल्लावाद की जड़ें गहरी हैं. पढ़ा-लिखा मुल्ला-वर्ग केंद्रीय सत्ता में भागीदारी चाहता है लेकिन वह मुस्लिम समुदाय के विकास के लिए नहीं, अपने विकास के लिए कार्य करना चाहता है. संघवाद और बीजेपी की ढपली बजाने वाले एम् जे अकबर और मुख़्तार अब्बास नक़वी जैसे मुस्लिम नेताओं से पूछा जा सकता है कि उन्होँने अबतक कितने मुसलमानों का विकास किया है? यह पब्लिक डोमेन में आना चाहिए.  
      शिया समुदाय में ऐसे नेताओं की ज़रुरत भी नहीं है. ही उनमें तीन तलाक़ जैसी कोई बीमारी है. हकीकत यह है कि मूलतः यह बीमारी 'इंफेक्शन' की तरह है. आप गंदे रहेंगे तो इंफेक्शन के खतरे भी बने रहेंगे. यानि आप अशिक्षित रहेंगे तो ठग मुल्लावाद और नेता आपको गंडे-तावीज़ों से ठगता और आतंकवाद या सांप्रदायिक दंगों के काग़ज़ी सांप दिखाकर डराते हुए आपके वोट को कैश करता-कराता रहेगा. राजनीति इस जेहालत से फ़ायदे उठाने का हुनर जानती है . इस राजनीति का नेता कोई भी मुल्ला या पंडित हो सकता है. इसमें संदेह नहीं किया जाना चाहिए
      सुन्नी-शिया मुस्लिम युवाओं को संगठित होकर समाज में जड़ें जमाई इन सामाजिक कुरीतियों को विरुद्ध मिलकर अपनी आवाज़ बुलंद करनी होगी जिससे अवाम अब बेदार हो सके नहीं तो शहद की हर बूँद को चीटियां चट करती जायँगी और मधुमक्खियों को इसकी खबर तक भी नहीं हो पायेगी.
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