इतिहास के झरोखे से / रंजन ज़ैदी
इतिहास के झरोखे से / रंजन ज़ैदी
प्रकाशक : राजेश पुस्तक केंद्र, दिल्ली 110051
ISBN : 9788193255643
मूल्य : रु.81/-
प्रथम संस्करण : 2016
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गतांक से आगे
इतिहास के झरोखे से / रंजन ज़ैदी
इतिहास के झरोखे से / रंजन ज़ैदी
‘Gahe-Gahe baz khwan een qissae-parinah raa’/गाहे-गाहे बाज़ ख्वां ईं क़िस्स-ए-पारीनह रा। (क़िस्सों को कभी-कभी दोहराते रहना चाहिए।)
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि 1857 के विद्रोह के कुचल
दिये जाने के
बाद गठित किये
गये आयोग की
सिफ़ारिशों पर जिन-जिन आन्दोलनकारियों
पर मुकदमे चलाये
गये उन्हें आगे
जाकर बेरहमी से
दंडित किया गया।
परिणाम यह हुआ
कि भय और
आतंक के साये
में मुसलमान मुख्य-धारा से
लगातार अलग होते
चले गए. कालांतर में आर्थिक
रूप से यह पिछड़ापन उनके
जीवन के हर
पहलू पर अपना
असर डालता चला गया ।
यही नहीं
बल्कि अंग्रेज़ी सरकार
ने तत्कालीन परिस्थितवश
अनेक सामाजिक सुधारवादी
आंदोलनों और राहत
की मुहिमों में
हिन्दुओं के मतावलम्बियों, विभिन्न
धड़ों और उनके
प्रतिनिधियों को राजनीतिक
दृष्टिकोण से भी
अपने बहुत करीब
आने का अवसर
दिया जिससे मुसलमानों
को बहुत बड़ा
नुकसान हुआ। अंग्रेज़ों द्वारा हर क्षेत्र में मुसलमानों की उपेक्षा किये जाते रहने से वह
मनोवैज्ञानिक रूप से हीन भावना का शिकार होने लगी. परिणाम यह हुआ कि जो क़ौम कंधे से
कंधा मिलाकर 1857 के
विद्रोह में अंग्रेज़ों
के विरुद्ध आज़ादी
की लड़ाई लड़ी
थी, वह परिस्थितिवश दूर होतीचली गई.
उधर,
कलकत्ता में बंगाल
के विभाजन ने
अनेक नई समस्याएं
खड़ी कर दी
थीं। यह बात
और है कि
बंगाल का विभाजन
अंग्रेज़ी सरकार का एक
प्रशासनिक क़दम था
लेकिन पूर्वी और
पश्चिमी बंगाल में विभाजन
के बाद अनेक
नई समस्याएं उठ खड़ी
हुईं थीं।
कलकत्ता
और उसके इर्द-गिर्द अपराध का
ग्राफ़ ऊंचाइयों तक
पहुंच गया था।
प्रशासन में बंगालियों
का हस्तक्षेप और
प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों के प्रति
उनकी गहरी उदासीनता
से ब्रिटिश प्रशासन
की समस्याएं दिन-प्रतिदिन जटिल होती
जा रही थीं
जिससे राजधानी के
हस्तानांतरण की परिकल्पना
को बल मिला
और दिल्ली को
नई राजधानी के
रूप में अपनाने
और उसपर निरंतर
कार्य करते रहने
का काम स्वतः ही ज़ोर
पकड़ने लगा।
इस
सपने को साकार
करने से पहले
ब्रिटिश-सरकार को अनेक
मोर्चाें पर युद्ध-स्तर पर
कार्य करना पड़ा।
तब, प्रशासन ने
योजनाबद्ध तरीके से शाहजहांबाद
का बाकयदा सैनिक मानचित्र
तैयार करवाया। जैसा की पहले कहा जा चुका है कि उस
समय किले के
सामने और इर्द-गिर्द संभ्रात लोगों
की असंख्य बहुमूल्य
और आलीशान इमारतें
हुआ करती थीं,
जिनमें हवेलियां, महल, बाराहदरी,
मंस्जिदें और बंगले
आदि शामिल थे,
जिन्हें तत्कालीन ब्रिटिश सरकार
ने पूरी तरह से ध्वस्त करा
दिया। जैन मंदिर,
और सुभाष (ऐडवर्ड) पार्क आज
भी उस क्षेत्र
में अवस्थित हैं। (इतिहास के झरोखे से).

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