गीत : फिर से हम अतीत की पनाह में चले गए/ -रंजन ज़ैदी



फिर से हम अतीत की पनाह में चले गए. 
फिर वही सवाल,

फिर वही बवाल,
फिर वही उबाल,
फिर वही उछाल,
वियोग और विमोह के विवर में फँस गये.    
फिर से हम अतीत की पनाह में चले गए.
दिग्भ्रमित उड़ान,
छल रहे निशान,
धर्म के वितान,
मौन संविधान,
हर क़दम पे क्या कहें कि हम छले गए.
फिर से हम अतीत की पनाह में चले गए.
फिर धुआं उठा,
कोई घर जला,
धूप ढल गयी,
कोई चल बसा,
अना के करवान वलवले भी साथ ले गए.
अँधेरी रात के सफर में सबके सब चले गए.
-रंजन ज़ैदी   
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