आम आदमी पार्टी' का उत्साह अब जाड़े की ओस की तरह है/ रंजन ज़ैदी
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| नमो के लक्ष्य अभेद्य, केजरीवाल के अपने ही दुश्मन। |
दु:खद स्थिति यह रही कि 'आम आदमी पार्टी' के रग-रेशे किसी नवजात शिशु की तरह उसके जन्म लेते ही कई तरह के इन्फेक्शंस का शिकार हो गए थे। कहते हैं कि जन्म लेते ही बोलने वाले बच्चे अच्छे संस्कारवान नहीं होते हैं। उम्र से बड़े लगने वाले इस तरह के बच्चे माँ-बाप, पड़ोस और जानकारों को देखकर असभ्य, अशिष्ट और अभद्र भाषा में अपमानित करते रहते हैं। हमारी सभ्यता में इस तरह के बच्चे भी मासूम और अल्लाह के नेक बन्दे समझे जाते हैं.
दुनियाभर में जब बच्चों और औरतों पर बाहरी या घरेलू हिंसा होती है तो सारी दुनिया उसकी निंदा करती है. 'आम आदमी पार्टी' पर जब विपक्षियों और विधान सभा में प्रतिपक्ष ने हमले करने शुरू किये तो दिल्ली और समूचे देश को अच्छा नहीं लगा. इसमें कांग्रेस भी शामिल थी. इसीलिए दिल्ली में जब 'आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाने का मन बनाया तो उसने (शर्तें मानते हुए ही सही) अपना समर्थन दिया।
यह बात और है कि सरकार में कांग्रेस के चंद होशियार नेता इस अवसर का लाभ खोना नहीं चाहते थे बल्कि वे 'आम आदमी पार्टी' के साथ मिलकर अपने धंधे-पानी के श्रोत का दायरा सुनिश्चित कर लेना चाहते थे लेकिन तब अरविन्द केजरीवाल कबूतर के उस नौखेज़ बच्चे की तरह आकाश में पैतरे लेने लगे थे जिसे पता नहीं होता कि खाली दिखने वाला आसमान शिकारी शिकरों से ख़ाली नहीं रहता है, हुआ भी वही. जैसे ही अवसर मिला, प्रतिपक्ष ने ने 'आम आदमी पार्टी' की सरकार गिरा दी. ऐसे में दुखद स्थिति यह है कि अभी भी 'आम आदमी पार्टी' के नेता दिल्ली की सत्ता गंवाने के शोक का मर्सिया बने हुए हैं. आम आदमी पार्टी' का उत्साह अब जाड़े की ओस की तरह चुका है. जमी हुई बर्फ अब आसानी से नहीं पिघलेगी।
अब बीजेपी चाहती है कि दिल्ली में उसकी सरकार बने लेकिन इसके लिए तो उसे चुनाव में जाना होगा, लेकिन चुनाव जीतकर बीजेपी सरकार बना लेगी, दावे से कहा नहीं जा सकता। वह जानती है कि 'आम आदमी पार्टी' के कथित शीर्ष मूल्यहीन हाँकू व बीजेपी समर्थक नेता विधानसभा तक आसानी से नहीं पहुँच पाएंगे। बीजेपी को भी उनकी वफ़ादारी पर संदेह है, इसलिए वह उन्हें अभी तक तोड़ नहीं पाई है. चुनाव के डर ने सभी रोज़गार व बेरोज़गारों को हिलाकर रख दिया है.
दुनियाभर में जब बच्चों और औरतों पर बाहरी या घरेलू हिंसा होती है तो सारी दुनिया उसकी निंदा करती है. 'आम आदमी पार्टी' पर जब विपक्षियों और विधान सभा में प्रतिपक्ष ने हमले करने शुरू किये तो दिल्ली और समूचे देश को अच्छा नहीं लगा. इसमें कांग्रेस भी शामिल थी. इसीलिए दिल्ली में जब 'आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाने का मन बनाया तो उसने (शर्तें मानते हुए ही सही) अपना समर्थन दिया।
यह बात और है कि सरकार में कांग्रेस के चंद होशियार नेता इस अवसर का लाभ खोना नहीं चाहते थे बल्कि वे 'आम आदमी पार्टी' के साथ मिलकर अपने धंधे-पानी के श्रोत का दायरा सुनिश्चित कर लेना चाहते थे लेकिन तब अरविन्द केजरीवाल कबूतर के उस नौखेज़ बच्चे की तरह आकाश में पैतरे लेने लगे थे जिसे पता नहीं होता कि खाली दिखने वाला आसमान शिकारी शिकरों से ख़ाली नहीं रहता है, हुआ भी वही. जैसे ही अवसर मिला, प्रतिपक्ष ने ने 'आम आदमी पार्टी' की सरकार गिरा दी. ऐसे में दुखद स्थिति यह है कि अभी भी 'आम आदमी पार्टी' के नेता दिल्ली की सत्ता गंवाने के शोक का मर्सिया बने हुए हैं. आम आदमी पार्टी' का उत्साह अब जाड़े की ओस की तरह चुका है. जमी हुई बर्फ अब आसानी से नहीं पिघलेगी।
अब बीजेपी चाहती है कि दिल्ली में उसकी सरकार बने लेकिन इसके लिए तो उसे चुनाव में जाना होगा, लेकिन चुनाव जीतकर बीजेपी सरकार बना लेगी, दावे से कहा नहीं जा सकता। वह जानती है कि 'आम आदमी पार्टी' के कथित शीर्ष मूल्यहीन हाँकू व बीजेपी समर्थक नेता विधानसभा तक आसानी से नहीं पहुँच पाएंगे। बीजेपी को भी उनकी वफ़ादारी पर संदेह है, इसलिए वह उन्हें अभी तक तोड़ नहीं पाई है. चुनाव के डर ने सभी रोज़गार व बेरोज़गारों को हिलाकर रख दिया है.
की स्थिति को समझना चाहिए। जिस रूप में उन्होंने विधानसभा में बीजेपी के विधायकों के साथ मिलकर नई सरकार के पंजे उखाड़े, शायद इतिहास उसे कभी माफ़ न करे.क्योंकि हाउस के इस लाइवनाटक को मिडिया के रास्ते सारे देश ने अपनी आँखों से देखा और जाना है.
दुखद स्थिति यह है कि कांग्रेस भी अब मूल्यहीन हो चुकी है. अब वह मर्यादित कांग्रेस नहीं रही है जिसके पूर्वजों ने आज़ादी के बाद भी अँगरेज़ समर्थक अफसरशाही का सामना और मुक़ाबला किया है. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने देश के ऐतिहासिक उथल-पुथल को अपनी आँखों से देखा है, उसने अपने भीतर बैठे और बाहर संकुचित सोच में जीने वाली बीजेपी व आरएसएस की असंख्य स्वयं-भू सेनाओं की उदंडता का सामना भी किया है.
दिल्ली कांग्रेस के युवा नेताओं को आगे की विषम
राजनीति का सामना करते रहना होगा लेकिन आत्ममंथन के बगैर नहीं। उन्हें
याद रखना चाहिए कि चोर और डींगें मारने वाले भ्रष्ट प्रोफेशनल
पॉलिटिशियन्स उसके अपने भीतर भी हैं, सांप्रदायिक भी हैं,
वाईट-कॉलर-क्रिमिनल्स भी हैं लेकिन सब भ्रष्ट और ख़राब भी नहीं हैं। शायद
अच्छे कांग्रेसियों के कारण ही आज भी कांग्रेस ज़िंदा है. लेकिन यह भी गलत नहीं है कि कांग्रेस की आज की स्थिति अच्छी नहीं है.
संयोग से कांग्रेस के लिए दिल्ली फिर करीब आ गई है. मोनी बाबा और उनके चेले-चपाटों से अजाने में अबतक जो भी बड़े नुकसान हो चुके हैं, उसकी भरपाई तो शायद न हो पाये, लेकिन दिल्ली के तख़्त पर अब भी कांग्रेस अपना परचम लहरा सकती है.
दुखद स्थिति यह है कि कांग्रेस भी अब मूल्यहीन हो चुकी है. अब वह मर्यादित कांग्रेस नहीं रही है जिसके पूर्वजों ने आज़ादी के बाद भी अँगरेज़ समर्थक अफसरशाही का सामना और मुक़ाबला किया है. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने देश के ऐतिहासिक उथल-पुथल को अपनी आँखों से देखा है, उसने अपने भीतर बैठे और बाहर संकुचित सोच में जीने वाली बीजेपी व आरएसएस की असंख्य स्वयं-भू सेनाओं की उदंडता का सामना भी किया है.
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| शीला दीक्षित दिल्ली कांग्रेस में फिर सक्रिय होंगी। |
संयोग से कांग्रेस के लिए दिल्ली फिर करीब आ गई है. मोनी बाबा और उनके चेले-चपाटों से अजाने में अबतक जो भी बड़े नुकसान हो चुके हैं, उसकी भरपाई तो शायद न हो पाये, लेकिन दिल्ली के तख़्त पर अब भी कांग्रेस अपना परचम लहरा सकती है.
बीजेपी अपनी हालिया व भावी पराजय और अमित शाह के अध्यक्ष बनने से भी भयभीत है. मोदीमय बीजेपी का नमो-मंत्र राज्यों के उप-चुनावों के नतीजों से ज़ाहिर है. नरेंद्र मोदी अब बहुत आगे निकल चुके हैं. उन्हें अब अपने पैरोकारों व प्रमोटरों की ज़रुरत नहीं है. उनके अभेद्य-लक्ष्य बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह जानते हैं. वह यह भी जानते हैं कि व वित्त रक्षा मंत्री कानूनविद अरुण जेटली का इस्तेमाल कब तक किया जाना है. तमाम हाली-मवालियों को कानूनी पचड़ों से कबतक मुक्त करा लेना ज़रूरी है. अपनी आँखों में दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने का स्वप्न पाले जगदीश मुखी के बनाये जा रहे दबावों से किस तरह निपटना ज़रूरी है। वह यह भी जानते है कि राज्यों में चंद सीटें ले आना बहुत बड़ी बात नहीं है.
देश एक बेहद नाज़ुक दौर में प्रवेश कर चुका है और लोकतंत्र को अनेक जाने-अनजाने खतरों ने घेर लिया है. लोकतंत्र हमारी विरासत और मिलीजुली संस्कृति के बीच जीने की निर्भीक शैली है. हमें इसकी हर हाल में हिफाज़त करनी होगी। लोकतंत्र न रहा तो शायद हम भी न रह पाएं क्योंकि आने वाले समय में राम मंदिर का मुद्दा फिर से ग़िलाफ़ से बाहर निकलने वाला है. आज़ादी के तुरंत बाद भी यही हुआ था, अप्रशिक्षित नेता शासक बन गये और लोकतंत्र को अपने हित के अनुरूप परिभाषित करने लगे. नतीजा यह हुआ कि नौकरशाही ने
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| फिर से राम मंदिर की दुदुंभी बजाई जाएगी। |
लोकतंत्र हमारी विरासत और मिलीजुली संस्कृति के बीच जीने की
निर्भीक शैली है. हमें इसकी हर हाल में हिफाज़त करनी होगी। लोकतंत्र न रहा
तो शायद।...........



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