बीजेपी का दिल्ली-फ़तेह युद्ध शुरू /रंजन ज़ैदी
'आम आदमी पार्टी' निश्चय ही संकट में है. पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल
का राजनीतिक भविष्य दांव
पर लग चुका है.
पार्टी अभी भी अपने आईसीयू से बाहर नहीं निकल पाई है. अपनी पराजय, अपने अपमान और दरकते हुए राजनीतिक आधार का भी अभी तक पार्टी का इलाज होता दिखाई नहीं दिया है. रोग निरंतर बढ़ता जा रहा है. किसी भी समय पार्टी टूटन के कगार को छू सकती है.
मैं जनता हूँ कि 'आप' में अनेक कमियां हैं. उसके कुछ फैसले भी कुछ गैर लोगों के कारण गलत रहे हैं. उसमें गलत लोग हैं भी, कुछ निकल भी गए हैं, कुछ दूसरी पार्टियों में देर-सवेर जाने वाले हैं. कुछ दूसरी पार्टियों के लिए सूचना का स्रोत हैं. कुछ व्यवसायिक भी हैं लेकिन अब भी उसमें बहुत से अच्छे लोग हैं.
अधिकतर लोगों का राजनीतिक पार्टी में आने का एक मतलब ताकत हासिल कर पोलिटिकल-इंडस्ट्री' से खुद को धन-कुबेर बनाना होता है. अच्छे लोग इसी काले नाग की फुंकार से दूर भाग जाते हैं, लेकिन अवसरवादी राजनेता अपने लक्ष्यों को भेदकर अंततः कामियाब हो जाते है.
इसलिए, देश के युवाओं को अब रचनात्मक राजनीति के बीच नई संरचना का भागीदार बनना होगा, नहीं तो देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा।
हर समुद्र के किनारे झाग होते हैं.
हर ठहरे हुए पानी पर काई होती है,
हर बहते हुए पानी में गंदिगी और कचरा होता है, लेकिन फिर भी जीवन हर स्थिति में पनपता रहता है. यही जीवन है.
'आम आदमी पार्टी' का जो राजनीतिक विरोध कर रहे हैं, 'राजनीति' उनका व्यवसाय है. 'व्यवसायी' का उद्देश्य केवल 'लाभ' होता है. व्यवसायी मॉल बेचने के लिए झूठे प्रचार कर सकता है, झूठ भी बोलता रह सकता है लेकिन देश व राष्ट्र के नागरिकों के चरित्र का निर्माण नहीं कर सकता। इसलिए अपने किसी भी प्रतियोगी का चरित्र हनन करना उसके लाभ और साम, दाम, दंड, भेद से जुड़ी रणनीति का ही हिस्सा माना जाना चाहिए।
लोकतंत्र में सभी को आगे बढ़ने का अधिकार है. बीजेपी भी दिल्ली के तख़्त पर बैठना चाहती है. समय उसके लिए अनुकूल है. देश की बड़ी और परिचित विज्ञापन एजेंसियां अपनी तैयारियां शुरू कर चुकी हैं. बड़े औद्योगिक घराने कभी नहीं चाहेंगे कि दिल्ली तख़्त पर 'आप' की सत्ता हो. आप अब अपना जनाधार खो चुकी है. दिल्ली के मुस्लिम मतदाता आप को वोट नहीं देंगे क्योंकि मुस्लिम नेता इस पार्टी में अपना भविष्य नहीं देख पा रहे हैं . वैसे भी दिल्ली के मुस्लिम अवाम अब बीजेपी के साथ हैं क्योंकि केंद्र में उसकी सरकार है और डेढ़ लाख शिया मतदाता कुमार विश्वास से नाखुश हैं क्योंकि उसने कवि सम्मेलन में मुहर्रम और कर्बला का उपहास उड़ाया था. इसी तरह शाज़िया इल्मी को पार्टी छोड़ने पर विवश किया जाना, देश के कई मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकेट से वंचित करना, चंदा उगाहना जैसे आरोप आम आदमी पार्टी' को कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी है.
http://feeds.feedburner.com/Mushayra-2014
zaidi.ranjan20@politics1.blogger.com
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| अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक भविष्य दांव पर |
पार्टी अभी भी अपने आईसीयू से बाहर नहीं निकल पाई है. अपनी पराजय, अपने अपमान और दरकते हुए राजनीतिक आधार का भी अभी तक पार्टी का इलाज होता दिखाई नहीं दिया है. रोग निरंतर बढ़ता जा रहा है. किसी भी समय पार्टी टूटन के कगार को छू सकती है.
मैं जनता हूँ कि 'आप' में अनेक कमियां हैं. उसके कुछ फैसले भी कुछ गैर लोगों के कारण गलत रहे हैं. उसमें गलत लोग हैं भी, कुछ निकल भी गए हैं, कुछ दूसरी पार्टियों में देर-सवेर जाने वाले हैं. कुछ दूसरी पार्टियों के लिए सूचना का स्रोत हैं. कुछ व्यवसायिक भी हैं लेकिन अब भी उसमें बहुत से अच्छे लोग हैं.
अधिकतर लोगों का राजनीतिक पार्टी में आने का एक मतलब ताकत हासिल कर पोलिटिकल-इंडस्ट्री' से खुद को धन-कुबेर बनाना होता है. अच्छे लोग इसी काले नाग की फुंकार से दूर भाग जाते हैं, लेकिन अवसरवादी राजनेता अपने लक्ष्यों को भेदकर अंततः कामियाब हो जाते है.
इसलिए, देश के युवाओं को अब रचनात्मक राजनीति के बीच नई संरचना का भागीदार बनना होगा, नहीं तो देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा।
हर समुद्र के किनारे झाग होते हैं.
हर ठहरे हुए पानी पर काई होती है,
हर बहते हुए पानी में गंदिगी और कचरा होता है, लेकिन फिर भी जीवन हर स्थिति में पनपता रहता है. यही जीवन है.
'आम आदमी पार्टी' का जो राजनीतिक विरोध कर रहे हैं, 'राजनीति' उनका व्यवसाय है. 'व्यवसायी' का उद्देश्य केवल 'लाभ' होता है. व्यवसायी मॉल बेचने के लिए झूठे प्रचार कर सकता है, झूठ भी बोलता रह सकता है लेकिन देश व राष्ट्र के नागरिकों के चरित्र का निर्माण नहीं कर सकता। इसलिए अपने किसी भी प्रतियोगी का चरित्र हनन करना उसके लाभ और साम, दाम, दंड, भेद से जुड़ी रणनीति का ही हिस्सा माना जाना चाहिए।
लोकतंत्र में सभी को आगे बढ़ने का अधिकार है. बीजेपी भी दिल्ली के तख़्त पर बैठना चाहती है. समय उसके लिए अनुकूल है. देश की बड़ी और परिचित विज्ञापन एजेंसियां अपनी तैयारियां शुरू कर चुकी हैं. बड़े औद्योगिक घराने कभी नहीं चाहेंगे कि दिल्ली तख़्त पर 'आप' की सत्ता हो. आप अब अपना जनाधार खो चुकी है. दिल्ली के मुस्लिम मतदाता आप को वोट नहीं देंगे क्योंकि मुस्लिम नेता इस पार्टी में अपना भविष्य नहीं देख पा रहे हैं . वैसे भी दिल्ली के मुस्लिम अवाम अब बीजेपी के साथ हैं क्योंकि केंद्र में उसकी सरकार है और डेढ़ लाख शिया मतदाता कुमार विश्वास से नाखुश हैं क्योंकि उसने कवि सम्मेलन में मुहर्रम और कर्बला का उपहास उड़ाया था. इसी तरह शाज़िया इल्मी को पार्टी छोड़ने पर विवश किया जाना, देश के कई मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकेट से वंचित करना, चंदा उगाहना जैसे आरोप आम आदमी पार्टी' को कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी है.
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