इराकी विद्रोहियों के साथ युद्ध में अमेरिका के निजी सैनिक...?/रंजन ज़ैदी

 कुर्द नहीं चाहते कि उनकी ज़मीन पर कोई कब्ज़ा करे
भा सरकार के विदेश मंत्रालय की सक्रियता, विदेश नीति और इराक में स्थानीय रेड-क्रिसेंट के साथ संपर्क कर लेने के बाद की कामियाबी  इस बात से लगाई जा सकती है कि उसने अपनी कूटनीति और प्रशासकीय क्षमता के रहते  बड़ी संख्या में इराक के विभिन्न क्षेत्रों के अस्पतालों में काम करने वाली नर्सों और अन्य कंपनियों में काम करने वाले मज़दूरों को इराक के आईएसआईएस के चरमपंथियों के चुंगल से मुक्त करा लिया है. हालाँकि ताज़ा ख़बरों के अनुसार अभी भी आतंकवादियों के कब्ज़े से अनेक कामगारों को मुक्त कराना बाकी है. केरल निवासी भारतीय नर्सों को आतंकवादियों ने इराक़ के शहर मोसुल में बंधक बनाकर रखा हुआ था. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार इराक़ के विभिन्न इलाक़ों में जहाँ लगभग १०,००० भारतीय रह रहे हैं, वहां युद्ध की स्थित नहीं है.
      इराक़ की जंग (गृह-युद्ध) ने १४०० साल बाद  फिर से मुस्लिम गिरोहों को कबीलाई सोच  के कारण
पुनः एक नई  जंग की तरफ घसीट लिया है. खाड़ी युद्ध के बाद अब शिया-सुन्नी समुदायों के परस्पर संघर्षों के कारण भीषण युद्ध के बाद इराक को अब एक और बड़े संकट से जूझना पड़ रहा है. इसमें वर्तमान इराक़ी सरकार की नीतिगत व प्रशासनिक असफलताओं को कम दोषी  नहीं माना जा सकता है. यह बात और है कि रूस और बेलारूस से खरीदे गए सुखोई लड़ाकू जेट विमानों की पहली खेप प्राप्त समाचारों के अनुसार इराक में पहुँचने के बाद परिस्थितियों ने युद्ध को अपने हित में कर लिया है. इराक़ की सेना ने अपनी बढ़त बनाये रखते हुए अब विद्रोहियों के बढ़ते क़दमों को बहुत हद तकबहुत वादा क्षेत्र है आगे बढ़ने से दिया है. अब तक चरमपंथियों ने सीरिया और इराक़ के जिस भूभाग को कब्ज़े में ले लिया है, वह सीरिया की गैस और ऑयल रिफाइनरी का बहुत बड़ा क्षेत्र है, लेबनान से भी बड़ा. साथ ही फौजी हवाई-बेस भी. 
      इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने साफतौर पर कह दिया था कि वह इराक में छिड़े
गृह-युद्ध के कीचड में अपने सैनिक नहीं भेजेगा. लेकिन इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के बेहद खास सलाहकार और समधी को आतंकवादी छूट दे देने से उसके खुफया इरादों पर संदेह किया जाना लाज़मी है. वह जनता है कि आईएसआईएस के खूंखार दरिंदों ने शिया समुदाय के युवाओं का बेरहमी से क़त्ल किया है. उसके रेड-गार्ड्स धड़धड़ाते हुए पूर्वी सीरिया के प्रांत  'देर आज ज़ोर' में घुसकर 'ऑयल फील्ड अल-उमर' पर कब्ज़ा कर  लेते है. जबकि इराक बदलते राजनीतिक संजाल की गिरफ्त में फंसने के संकेत देता महसूस हो रहा है और वह है उसका विभाजन।                 
      यदि अमेरिका, इस्राईल और इंग्लैण्ड का यह गुप्त षड्यंत्र सफल हो जाता है तो इराक़ के टुकड़े होना सुनिश्चित है. हालांकि ईरान अभी इस विषय पर अपने पत्ते नहीं खोलना चाहता क्योंकि वह जानता है कि पश्चिम की सीहूनी ताक़तें उसे नई जंग में घसीटना चाहती हैं ताकि उस पर हमला करने का विकल्प हासिल कर सके. 

     दुखद स्थिति यह है कि पीछे लौटते हुए चरमपंथी गिरोह अबूबक्र-अल-बग़दादी के हुक्म पर शिया युवाओं के समूहों की हत्याएं करते जाते हैं. यही नहीं बल्कि शहरी इलाक़ों में शिया-सुन्नी घरों में घुसकर वे महिलाओं से जबरन निकाह करने के दबाव तक डालने लगते हैं.खबर है कि चरमपंथी संगठन 'दौलते-इस्लामी इराक़ो-शाम' यानि 'दाश' ने उन कब्ज़ाए सीरियाई व इराकी इलाक़ों में हुकूमते-इलाहिया की घोषणा कर खिलाफत के क़ानून लागू कर दिए हैं. उधर अपनी पैठ बनाये रखते हुए अमेरिका चाहता है कि वह अबूबक्र-अल-बग़दादी के इरादों पर नज़र बनाये रखे ताकि इराक़ में अम्न को पुनः लाया जा सके.                                          (जारी ..../-2 )
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