रोम जलता रहा, अखिलेश बंसी बजाते रहे/रंजन जैदी
हिंसाग्रस्त मुज़फ्फरनगर इलाक़ों से अब करफ़्यु हटाया जा चुका है लेकिन सीआरपीएफ़ की लगभग ७८ कम्पनियां अब भी वहां तैनात
हैं. दंगे की बारिश के बाद खिली बदराई धूप के मौसम में काले झंडों के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्य-मंत्री ने हिंसाग्रस्त इलाकों का दौरा किया।
शामली व मुज़फ्फरनगर में (रिपोर्ट लिखे जाने तक) अब भी लगभग ४२ हज़ार दंगापीड़ित लोग इलाकों में घिरे हुए हैं. उनका देर तक घिरे रहना २०१४ के चुनाव पर अपना बुरा असर डाल सकता है. इस नाते केंद्र-सरकार और कांग्रेस की चिंता को जायज़ ठहराया जा सकता है.
इसीलिए पार् टी-प्रेसीडेंट श्रीमती सोनिया गाँधी, उपाध्यक्ष राहुल गाँधी तथा भारत सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी दंगाग्रस्त इलाकों में शाहपुर और गाँव बस्सीकला के कैम्पों में रह रहे पीड़ितों की स्थिति की जा नकारी
के उद्देश्य से वहां का दौरा किया।
इस क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम समस्या नहीं थी । बटवारे के
दिनों में भी इस क्षेत्र की महापंचायत ने मुसलमानों को अपनी जड़ों से उखाड़ने का
प्रयास नहीं किया था. जिन लोगों ने महापंचायत की वे दंगे की गरज से अपने घरों से
नहीं निकले थे. दंगे की कल्पना किसी ने की भी नहीं थी. ये
कहा जाये कि इलाके में दंगा बीजेपी ने आरएसएस की मदद से करवाया, नाइंसाफ़ी
होगी। ये सच है
कि चंद नेता इस तरह का मैदान तैयार करने में मसरूफ रहे थे
जिसकी शुरुआत गत २२ अगस्त से ही हो गई थी.
इलाके के कवाल
गाँव की गलियों में मुसलमानों को आवारा युवक शराब पीकर गालियाँ देना शुरू कर चुके थे, मंदिरों के परिसरों में कहीं-कहीं गोश्त भी पाया जाने लगा था. घटना ने हिंसात्मक रूप तब लिया जब २७ अगस्त को सड़क के
३ मजनू किस्म के कुरैशी बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले मुस्लिम लड़कों ने १६ और १७ साल की दो हिन्दू लड़कियों से छेडछाड की. यही
नहीं बल्कि बाद के हुए पारस्परिक हिंसात्मक संघर्ष में जहाँ छेड़छाड़ करने वाला युवक
शाहनवाज़ कुरैशी हमलावरों द्वारा मारा गया वहीं
पीड़ित लड़की का भाई गौरव और उसका मित्र सचिन भी हिंसा का शिकार बन गया. .इसके बाद शुरू हुआ दंगों का तांडव।
१० साल पहले हुए गुजरात के दंगे ज़ख्मों के निशान की तरह आज भी जिंदा हैं.
नरेन्द्र मोदी आज तक गरियाये जाते हैं, मैं
विदेश में था तो वहां भी लोग उन्हें गरियाते ही मिले। उत्तर प्रदेश की
अखिलेश सरकार ने भी वही गेम खेला और अपने-आप चित हो गये। सोने में सुहागा यह कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव आज़म् खां को
ही हडकाते नज़र आये.
बढ़ता कद जी का जंजाल बन सकता है, अमर
सिंह का उदहारण सामने है. आज़म खां अलग मिटटी के नेता हैं, मीटिंग
में नहीं आये. हो सकता है इसमें मुलायसिंह यादव द्वारा दिए जाने वाले
कुछ लोगों के लिए कूटनीतिक सन्देश हों, जिन्हें
रामगोपाल यादव के माध्यम से प्रसारित किया गया हो. मुलायम सिंह यादव ये बात समझते हैं. इसीलिए अखिलेश यादव आज़म
खान से मिलने उनके घर गए और बात रफा-दफा हो गई.
पीछे मुड़कर देखे तो हादसों की कहानी आसानी से समझ में आजायेगी. जहाँ तक घटना का ताल्लुक था, उसे
उक्त हादसों के बाद समाप्त हो जाना चाहिए था. लेकिन तत्कालीन
प्रशासन ने उसे गंभीरता से नहीं लिया, मुज़फ्फर
नगर के पूर्व एसएसपी सुभाष दुबे की भूमिका को लेकर इसीलिए जांच की मांग की जा रही
है. कहा जा रहा है कि यदि प्रशासन चाहता तो महापंचायत का आयोजन कभी न हो पाता
क्योंकि इस आयोजन के बाद से ही जिले के गाँव तक में हिंसा की आग भड़की और बड़े पैमाने पर लोगों की जानें
गयीं। विनाश के इस अंधड़ में जो तबाही देखी गई, वह
समाजवादी पार्टी की सरकार के लिए किसी आत्महत्या से कम के बराबर नहीं आंकी जाएगी।
इस
क्षेत्र में हुए सांप्रदायिक दंगों से एक बात तय हो गई कि समाजवादी पार्टी ने १९१४ के चुनाव में
भारती जनता पार्टी को आज़ादी के साथ जीतने का अवसर उपलब्ध करा दिया है. अजीत सिंह
को नीचा दिखाने और वोटों का ध्रुवीकरण कराने में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी के हाथ
मज़बूत तो कर दिए है लेकिन साथ ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी भी मार ली है.
२०१४ के चुनाव में यदि बहुजन समाजवादी
पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव-मैदान में उतरती है तो समाजवादी पार्टी की
हालिया-दूरंदेशी खाक में मिल जाएगी।
कारण यह है कि मुस्लिम वोट अब कभी
मुलायम के खाते में नहीं आयेगा और विकल्प न होने के कारण उत्तर प्रदेश का मुस्लिम
वोट इसबार बहुजन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में बट जायेगा। इसका लाभ बीजेपी को
भी हो सकता है.
यदि मुलायम सिंह यादव अपनी पार्टी को २० सीटें दिला सके तो ये भी उस समय की एक बड़ी बात
होगी। कारण यह है कि मुस्लिम जमातों को अब लग चुका है कि मुलायम सरकार ने भी मुसलमानों को इस्तेमाल
किया है. दरअसल वो भी बीजेपी की शैली में मुसलमानों को डराकर वोटों का ध्रुवीकरण
करने में दिलचस्पी रखती है. यह एक खतरनाक नजरिया है. मुस्लिम संगठनों की परस्पर बढती जा रही एकता कालांतर की राजनीती को नयी दिशा दे सकती है. बीते दिनों में जो भी हुआ, वह बेहद दुखदाई रहा है. मैं नहीं समझ सकता कि अखिलेश यादव राजनीती की इतनी बड़ी बिसात बिछाकर बीजेपी के लिए २०१४ के चुनाव की जीत का छींका सौंप सकते हैं. ये तो रोम में आग लगाकर बंसी बजाने जैसा है. --Release by News feature and press media alliance.
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